कोलकाता। पश्चिम बंगाल की प्रस्तावित नई औद्योगिक नीति में जमीन, निवेश और रोजगार को एक साथ जोड़कर औद्योगिक विकास को नई दिशा देने की तैयारी दिखाई दे रही है। पांच नवंबर को प्रस्तावित नीति में उद्योगों के लिए जमीन उपलब्ध कराने के साथ उसके समयबद्ध इस्तेमाल पर जोर देने, बड़े निवेश को तेज मंजूरी देने और रोजगार पैदा करने वाली परियोजनाओं को प्राथमिकता देने की योजना बताई गई है। प्रस्तावित प्रावधानों के मुताबिक जमीन आवंटित होने के तीन साल के भीतर उत्पादन शुरू करना होगा, अन्यथा आवंटन रद्द किया जा सकता है।
नई नीति का एक प्रमुख उद्देश्य राज्य में औद्योगिक परियोजनाओं के सामने आने वाली जमीन की समस्या को कम करना है। इसके लिए सीधे जमीन खरीदने के विकल्प के साथ लैंड पूलिंग और सरकारी विभागों के पास मौजूद अनुपयोगी औद्योगिक जमीन को दोबारा इस्तेमाल में लाने की व्यवस्था प्रस्तावित है। सरकार की सोच है कि निवेशकों को जमीन उपलब्ध कराने के बाद परियोजनाओं को लंबे समय तक लंबित रखने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगाई जाए।
जमीन की उपलब्धता को औद्योगिक नीति के केंद्र में रखा गया
पश्चिम बंगाल में औद्योगिक निवेश के संदर्भ में जमीन का सवाल लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। बड़े प्रोजेक्ट के लिए एकमुश्त जमीन उपलब्ध कराने और भूमि अधिग्रहण को लेकर विवादों ने राज्य में औद्योगिक परियोजनाओं की राह कठिन बनाई है। सिंगूर में टाटा की नैनो परियोजना का राज्य से बाहर जाना इस बहस का प्रमुख उदाहरण रहा है।
प्रस्तावित नीति में कंपनियों को सीधे जमीन खरीदने की सुविधा के साथ लैंड पूलिंग का विकल्प देने की बात कही गई है। छोटे-छोटे भूखंडों को एक साथ जोड़कर बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए भूमि तैयार करने की व्यवस्था से निवेशकों को मदद मिल सकती है। इसके अलावा सरकारी विभागों के पास पड़ी अनुपयोगी औद्योगिक जमीन की पहचान कर उसे नए निवेश के लिए उपलब्ध कराने पर भी जोर है।

तीन साल में उत्पादन शुरू नहीं तो आवंटन रद्द करने का प्रस्ताव
नीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू जमीन के उपयोग को लेकर प्रस्तावित सख्ती है। औद्योगिक परियोजना के लिए जमीन लेने वाली कंपनी को निर्धारित अवधि के भीतर उत्पादन शुरू करना होगा। तीन साल में उत्पादन शुरू नहीं होने पर जमीन का आवंटन रद्द करने का प्रावधान प्रस्तावित है। इसके साथ आवंटित जमीन का उपयोग निर्धारित औद्योगिक उद्देश्य के अलावा किसी अन्य काम में नहीं करने देने की व्यवस्था भी रखी गई है।
सरकार नियमित निगरानी के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहती है कि आवंटित भूमि वास्तव में परियोजना के लिए इस्तेमाल हो। इससे उन मामलों पर रोक लगाने की कोशिश होगी, जहां उद्योग लगाने के नाम पर जमीन लेकर उसे लंबे समय तक खाली रखा जाता है।
निवेश के साथ रोजगार को भी मिलेगी प्राथमिकता
नई औद्योगिक नीति का फोकस केवल निवेश की रकम बढ़ाने पर नहीं, बल्कि रोजगार सृजन पर भी है। प्रस्तावित व्यवस्था में सरकारी सहायता और प्रोत्साहन तय करते समय परियोजना से पैदा होने वाले रोजगार को भी महत्वपूर्ण आधार बनाने की योजना है। अधिक लोगों को रोजगार देने वाली कंपनियों को तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
स्थानीय युवाओं को उद्योगों में अवसर दिलाने के लिए कौशल विकास और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी इससे जोड़ा जा सकता है। सरकार का उद्देश्य निवेश घोषणाओं को वास्तविक उत्पादन और रोजगार में बदलना है। हालांकि रोजगार के आधार पर आर्थिक सहायता देने का अंतिम फार्मूला प्रस्तावित नीति के अंतिम रूप में ही स्पष्ट होगा।

100 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश को फास्ट ट्रैक मंजूरी
बड़े निवेशकों के लिए 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक के निवेश वाली परियोजनाओं को तेज मंजूरी देने का प्रस्ताव है। इसके साथ सिंगल विंडो व्यवस्था को प्रभावी बनाने की योजना है, ताकि उद्योग लगाने वालों को अलग-अलग सरकारी विभागों की प्रक्रियाओं में कम समय लगे। मंजूरी की प्रक्रिया को तय समयसीमा में पूरा करने पर भी जोर दिया जाएगा।
सरकार की रणनीति में प्रशासनिक देरी को कम करना अहम है। जमीन, बिजली, पानी, अनुमति और अन्य औपचारिकताओं से जुड़ी प्रक्रियाओं को एकीकृत तरीके से आगे बढ़ाने से निवेशकों के लिए परियोजना शुरू करना आसान हो सकता है।
एमएसएमई और नई तकनीक वाले उद्योगों पर फोकस
रोजगार के बड़े स्रोत माने जाने वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज का प्रस्ताव है। आसान ऋण, आधुनिक तकनीक अपनाने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में सहायता देने के साथ छोटे उद्यमियों के उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था पर भी विचार किया जा रहा है। पहले से चल रहे उद्योगों के विस्तार को प्रोत्साहन देने की योजना भी इसमें शामिल है।
इसके साथ नई तकनीक आधारित क्षेत्रों को भी नीति में जगह देने की तैयारी है। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, ग्रीन हाइड्रोजन, रक्षा उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दिए जाने की संभावना है। इससे राज्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को पारंपरिक क्षेत्रों से आगे ले जाने का प्रयास दिखाई देता है।

उत्तर बंगाल और जंगलमहल में निवेश बढ़ाने की कोशिश
औद्योगिक विकास को कोलकाता और आसपास के क्षेत्रों तक सीमित न रखने के लिए उत्तर बंगाल और जंगलमहल में निवेश को बढ़ावा देने की योजना भी प्रस्तावित है। आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में परियोजनाएं लगाने वाली कंपनियों को अतिरिक्त सुविधाएं देने और नए औद्योगिक पार्क विकसित करने पर जोर दिया जा सकता है।
पुराने उद्योगों को पुनर्जीवित करने की दिशा में भी नीति में प्रावधान रखे जाने की बात सामने आई है। जूट, चाय और वस्त्र जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में आधुनिकीकरण और नए निवेश के साथ बंद या संकटग्रस्त कारखानों को फिर से चालू करने की संभावनाएं तलाशने पर जोर रहेगा।
निर्यात और लॉजिस्टिक्स को भी नीति से जोड़ने की तैयारी
औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने के साथ उसके बाजार तक पहुंचने की व्यवस्था पर भी ध्यान दिया जाएगा। निर्यात आधारित उद्योगों के लिए प्रोत्साहन, बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, बेहतर सड़क संपर्क, लॉजिस्टिक्स हब और औद्योगिक पार्कों के विकास को नीति का हिस्सा बनाने की तैयारी है। निर्बाध बिजली और पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण होगी।
कुल मिलाकर प्रस्तावित नीति जमीन की उपलब्धता, निवेश, रोजगार, तकनीक और निर्यात को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। हालांकि ये प्रावधान फिलहाल प्रस्तावित नीति से जुड़े हैं और पांच नवंबर को सामने आने वाली अंतिम नीति में बदलाव संभव है। असली चुनौती इसके क्रियान्वयन की होगी। यदि जमीन समय पर उपलब्ध होती है, मंजूरियां तेजी से मिलती हैं और निवेश उत्पादन व रोजगार में बदलता है, तभी नीति के घोषित उद्देश्यों का वास्तविक असर दिखाई देगा।

