कैमरा और AI से लैस चश्मे बना सकते हैं लोगों की रिकॉर्डिंग आसान, विशेषज्ञों की चिंता बढ़ी, तकनीक पर रोक नहीं बल्कि नए नियमों की जरूरत
स्मार्टफोन के बाद अब स्मार्ट ग्लास तकनीक की दुनिया में तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। देखने में ये चश्मे बिल्कुल सामान्य लगते हैं, लेकिन इनमें कैमरा, माइक्रोफोन, स्पीकर और AI जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इनके जरिए कॉल और मैसेज का जवाब देने से लेकर फोटो और वीडियो रिकॉर्ड करने तक का काम किया जा सकता है। समस्या यह है कि सामने खड़े व्यक्ति को कई बार पता ही नहीं चलता कि उसकी तस्वीर या आवाज रिकॉर्ड हो रही है। यही वजह है कि स्मार्ट ग्लास ने निजता और कानून से जुड़ी नई चिंता पैदा कर दी है।
आम चश्मे जैसा दिखना सबसे बड़ी चुनौती
स्मार्ट ग्लास की सबसे बड़ी खासियत ही अब इसकी सबसे बड़ी परेशानी बन रही है। इनमें तकनीक इस तरह लगाई जाती है कि बाहर से ये सामान्य चश्मे जैसे दिखाई देते हैं। छोटे कैमरे और माइक्रोफोन आसानी से नजर नहीं आते। रिकॉर्डिंग के दौरान दिखने वाली लाइट भी इतनी छोटी हो सकती है कि आसपास मौजूद व्यक्ति उसे नोटिस न करे।
कुछ मामलों में रिकॉर्डिंग संकेत को ढकने या उसके काम करने के तरीके को प्रभावित करने की कोशिशों को लेकर भी चिंता सामने आई है। इसका सीधा मतलब है कि किसी व्यक्ति को यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि वह कैमरे के सामने है या नहीं।
AI ने खतरा और बढ़ाया
पहले कैमरे से सिर्फ फोटो या वीडियो बनता था। AI वाले स्मार्ट ग्लास इससे कहीं आगे जा सकते हैं। वे आसपास की चीजों को समझने, जानकारी देने और भविष्य में लोगों की पहचान करने जैसी सुविधाओं से जुड़ सकते हैं। विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा चिंता चेहरे की पहचान और बायोमेट्रिक जानकारी के इस्तेमाल को लेकर है।
ऐसी तकनीक के जरिए किसी अनजान व्यक्ति के बारे में बिना उसकी अनुमति के काफी जानकारी जुटाना संभव हो सकता है। सार्वजनिक जगह पर मौजूद व्यक्ति के पास न तो रिकॉर्डिंग रोकने का तरीका होता है और न ही यह जानने का आसान साधन कि उसकी जानकारी कहां और किस काम में इस्तेमाल की जा रही है।
भारत में भी कानून को लेकर सवाल
भारत में निजता को मौलिक अधिकार माना गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के के.एस. पुट्टस्वामी मामले में निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़ा था। इसके बाद डिजिटल निजी डेटा की सुरक्षा के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 भी बनाया गया।
लेकिन स्मार्ट ग्लास जैसी नई तकनीक कई पुराने कानूनी ढांचे के सामने मुश्किल खड़ी कर रही है। खासकर सार्वजनिक जगहों पर किसी व्यक्ति की रिकॉर्डिंग और उसके बाद उस जानकारी के इस्तेमाल को लेकर कई सवाल उठते हैं। मौजूदा कानूनों में हर ऐसी स्थिति के लिए स्पष्ट नियम नहीं हैं।
महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा भी चिंता
इस तकनीक का गलत इस्तेमाल महिलाओं और बच्चों के लिए ज्यादा गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। बिना जानकारी के फोटो या वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर डालना पहले से ही एक बड़ी समस्या है। स्मार्ट ग्लास ऐसी रिकॉर्डिंग को और आसान बना सकते हैं, क्योंकि कैमरा फोन की तरह हाथ में दिखाई नहीं देता।
इसी वजह से कई देशों में स्मार्ट ग्लास को लेकर बहस तेज हो गई है। ब्रिटेन में कुछ सिनेमाघरों ने कैमरा वाले स्मार्ट ग्लास के इस्तेमाल पर रोक या कड़े नियम लागू किए हैं। जर्मनी में भी Meta के AI स्मार्ट ग्लास को लेकर कानूनी शिकायत दर्ज की गई है।
महाराष्ट्र ने भी उठाया कदम
भारत में भी इस मुद्दे पर सरकारों का ध्यान गया है। महाराष्ट्र सरकार ने AI आधारित स्मार्ट ग्लास, स्मार्ट गॉगल्स और दूसरे पहनने वाले उपकरणों के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके लिए एक समिति बनाई गई है, जो इनके इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों और सुरक्षा उपायों पर सुझाव देगी।
रोक नहीं, समझदारी से कानून बनाने की जरूरत
स्मार्ट ग्लास को पूरी तरह प्रतिबंधित करना आसान समाधान नहीं माना जा रहा है। तकनीक लगातार बदल रही है और आने वाले समय में ऐसे उपकरण और ज्यादा सामान्य हो सकते हैं। इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें तकनीक का फायदा भी मिले और लोगों की निजता भी सुरक्षित रहे।
इसके लिए रिकॉर्डिंग का साफ संकेत, संवेदनशील जगहों पर इस्तेमाल के नियम, बिना अनुमति रिकॉर्डिंग पर कड़ी कार्रवाई और AI के जरिए चेहरे या दूसरी निजी जानकारी की पहचान पर स्पष्ट नियम बनाए जा सकते हैं। असली चुनौती स्मार्ट ग्लास नहीं, बल्कि कानून की उस रफ्तार को बनाए रखना है जो तकनीक के साथ कदम मिला सके।