भारतीय क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज की भूमिका केवल रन बनाने तक सीमित नहीं होती। नई गेंद का सामना करना, शुरुआती दबाव झेलना और दूसरे छोर पर खड़े बल्लेबाज को पारी बनाने का अवसर देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिव सुंदर दास ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में इसी जिम्मेदारी को निभाने की कोशिश की। दाएं हाथ के इस पूर्व भारतीय सलामी बल्लेबाज ने 2000 से 2002 के बीच 23 टेस्ट मैच खेले और दो शतक सहित 1,326 रन बनाए। उनका नाम उन खिलाड़ियों में शामिल है जिन्होंने घरेलू क्रिकेट में लंबा और प्रभावशाली प्रदर्शन करके भारतीय टेस्ट टीम तक जगह बनाई।
शिव सुंदर दास का जन्म 5 नवंबर 1977 को ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में हुआ था। उनका क्रिकेट करियर ओडिशा की घरेलू टीम से आगे बढ़ा। बाद के वर्षों में वे विदर्भ की ओर से भी खेले। इसलिए उनके क्रिकेट सफर को झारखंड के घरेलू क्रिकेट से जोड़ना सही नहीं होगा। उनकी पहचान मुख्य रूप से ओडिशा क्रिकेट और भारतीय टेस्ट टीम के सलामी बल्लेबाज के रूप में रही।
भुवनेश्वर में शुरुआत और क्रिकेट की राह
भुवनेश्वर में जन्मे शिव सुंदर दास ने कम उम्र में ही क्रिकेट को गंभीरता से अपनाया। उनके शुरुआती प्रशिक्षण में कोच किशोर मानिया का योगदान बताया जाता है। वे दाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे और जरूरत पड़ने पर दाएं हाथ से मध्यम गति की गेंदबाजी भी कर सकते थे। उनकी बल्लेबाजी की शैली आक्रामकता से अधिक धैर्य, तकनीक और पारी को संभालने पर आधारित थी।
उन्होंने 1993-94 सत्र में ओडिशा की ओर से प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया। उस समय घरेलू क्रिकेट किसी भी खिलाड़ी के लिए राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता था। लगातार रन बनाना, कठिन परिस्थितियों में टिकना और मजबूत गेंदबाजी आक्रमण के सामने प्रदर्शन करना चयनकर्ताओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए जरूरी था। दास ने घरेलू स्तर पर निरंतरता दिखाकर अपनी जगह बनाई।

घरेलू क्रिकेट में बड़ा रिकॉर्ड
शिव सुंदर दास का प्रथम श्रेणी करियर उनकी क्षमता का सबसे मजबूत प्रमाण है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने 1993 से 2013 के बीच प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 180 मैच खेले और 10,908 रन बनाए। उनका बल्लेबाजी औसत 38.68 रहा। इस प्रारूप में उन्होंने 24 शतक और 52 अर्धशतक लगाए। वे ओडिशा की टीम की कप्तानी भी कर चुके हैं।
उनकी सबसे यादगार पारियों में 2006-07 रणजी ट्रॉफी सत्र में जम्मू-कश्मीर के खिलाफ बनाया गया 300 रन नाबाद का स्कोर शामिल है। यह पारी उनकी लंबी अवधि तक एकाग्रता बनाए रखने और बड़ी पारी खेलने की क्षमता का उदाहरण बनी। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 10 हजार से अधिक रन बनाना किसी भी बल्लेबाज के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि है।
ओडिशा के लिए उनके प्रदर्शन ने टीम को घरेलू क्रिकेट में प्रतिस्पर्धी बनाने में योगदान दिया। 2000-01 रणजी ट्रॉफी सत्र में ओडिशा के सेमीफाइनल तक पहुंचने के अभियान में भी दास की बल्लेबाजी महत्वपूर्ण रही। बीसीसीआई के विवरण के मुताबिक, उस सत्र में उन्होंने 330 रन बनाए थे। घरेलू क्रिकेट में इस तरह का प्रदर्शन ही उन्हें राष्ट्रीय चयन के दायरे में लेकर आया।
2000 में टेस्ट पदार्पण
शिव सुंदर दास ने 10 नवंबर 2000 को ढाका में बांग्लादेश के खिलाफ टेस्ट पदार्पण किया। उस समय भारतीय टीम में सलामी बल्लेबाजी के लिए स्थिर विकल्प तलाशे जा रहे थे। दास को नई गेंद का सामना करने और पारी की शुरुआत में टीम को मजबूत आधार देने की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने अपने शुरुआती टेस्ट मैचों में धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी से प्रभावित किया।

नागपुर में जिम्बाब्वे के खिलाफ 2000-01 सत्र में उन्होंने 110 रन की पारी खेलकर अपना पहला टेस्ट शतक बनाया। यह उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ था। बाद में 2002 में जिम्बाब्वे के खिलाफ ही उन्होंने दूसरा टेस्ट शतक लगाया। बीसीसीआई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, उनके दोनों टेस्ट शतक नागपुर में जिम्बाब्वे के विरुद्ध आए थे।
दास ने भारत के लिए कुल 23 टेस्ट मैच खेले। इनकी 40 पारियों में उन्होंने 1,326 रन बनाए, उनका औसत 34.89 रहा और सर्वोच्च स्कोर 110 था। उनके खाते में दो शतक और नौ अर्धशतक दर्ज हैं। टेस्ट क्रिकेट में 34.89 का औसत एक ऐसे बल्लेबाज के लिए सम्मानजनक है जिसकी प्रमुख भूमिका नई गेंद के सामने पारी की शुरुआत करना थी।
वनडे क्रिकेट में सीमित अवसर
टेस्ट क्रिकेट में पहचान बनाने के बाद दास को एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भी मौका मिला। उन्होंने 5 अक्टूबर 2001 को जोहानिसबर्ग में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वनडे पदार्पण किया। उनका वनडे करियर हालांकि बहुत लंबा नहीं रहा। उन्होंने भारत के लिए केवल चार एकदिवसीय मैच खेले और कुल 39 रन बनाए। उनका सर्वोच्च स्कोर 30 रन रहा। उनका आखिरी वनडे मुकाबला 26 दिसंबर 2002 को न्यूजीलैंड के खिलाफ ऑकलैंड में था।
टेस्ट और वनडे क्रिकेट में उनके आंकड़ों के बीच अंतर इस बात को दिखाता है कि हर प्रारूप की मांग अलग होती है। दास की बल्लेबाजी का स्वभाव टेस्ट क्रिकेट की लंबी अवधि और धैर्यपूर्ण पारी के अनुकूल था। सीमित ओवरों के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्हें लगातार अवसर नहीं मिल सके।

अंतरराष्ट्रीय करियर का अंत और घरेलू क्रिकेट
दास का आखिरी टेस्ट मैच मई 2002 में वेस्टइंडीज के खिलाफ किंग्सटन में हुआ। इसके बाद वे भारतीय टेस्ट टीम में नियमित जगह नहीं बना सके। अंतरराष्ट्रीय करियर छोटा रहने के बावजूद उन्होंने घरेलू क्रिकेट खेलना जारी रखा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनका लंबा सफर 2010 के दशक तक चला। ओडिशा के अलावा उन्होंने विदर्भ का प्रतिनिधित्व भी किया।
किसी खिलाड़ी के करियर का मूल्यांकन केवल अंतरराष्ट्रीय मैचों की संख्या से नहीं किया जा सकता। दास के मामले में घरेलू क्रिकेट के आंकड़े उनकी निरंतरता और तकनीकी क्षमता को सामने रखते हैं। 180 प्रथम श्रेणी मैचों में 10,908 रन और 300 नाबाद का सर्वोच्च स्कोर उनके लंबे घरेलू योगदान को रेखांकित करता है।
खिलाड़ी से कोच तक का सफर
क्रिकेट से दूरी बनाने के बजाय शिव सुंदर दास ने खेल से अपना जुड़ाव कोचिंग के माध्यम से बनाए रखा। वे राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) से जुड़े और बल्लेबाजी कोच के रूप में काम किया। उन्होंने ईस्ट जोन की टीम के साथ दलीप ट्रॉफी में कोचिंग की तथा ओडिशा की घरेलू टीम और राज्य क्रिकेट अकादमी में भी जिम्मेदारी निभाई। 2017 में उन्हें ओडिशा क्रिकेट टीम का कोच नियुक्त किए जाने की खबर आई थी।
2018 में मणिपुर क्रिकेट संघ ने उन्हें अपनी पुरुष टीम का कोच नियुक्त किया। इससे उनके कोचिंग अनुभव का दायरा पूर्वोत्तर भारत तक बढ़ा। मई 2021 में बीसीसीआई ने उन्हें इंग्लैंड दौरे पर जाने वाली भारतीय महिला क्रिकेट टीम का बल्लेबाजी कोच नियुक्त किया। इस भूमिका में उनका काम बल्लेबाजों की तकनीक, तैयारी और मैच परिस्थितियों के अनुरूप प्रदर्शन को बेहतर बनाने में सहयोग देना था। एनसीए में उनके अनुभव और राहुल द्रविड़ के मार्गदर्शन में किए गए काम का भी उस समय उल्लेख हुआ।

एक पूर्व सलामी बल्लेबाज के रूप में दास के पास नई गेंद का सामना करने, शुरुआती ओवरों में धैर्य रखने और तकनीकी कमियों को समझने का व्यावहारिक अनुभव था। कोचिंग में यही अनुभव युवा खिलाड़ियों के लिए उपयोगी हो सकता है। खिलाड़ी से कोच बनने का उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि अंतरराष्ट्रीय करियर समाप्त होने के बाद भी क्रिकेट में योगदान के कई रास्ते खुले रहते हैं।
सम्मान और क्रिकेट में योगदान
ओडिशा में उनके शुरुआती प्रदर्शन को पहचान मिली। उन्हें 1995 में एकलव्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान राज्य में खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाता है। उनके करियर की खास उपलब्धियों में भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलना, जिम्बाब्वे के खिलाफ दो शतक लगाना, घरेलू क्रिकेट में 10 हजार से अधिक रन बनाना और 300 रन नाबाद की पारी खेलना शामिल है।
शिव सुंदर दास का अंतरराष्ट्रीय करियर 2000 से 2002 के बीच सीमित रहा, लेकिन उनके घरेलू आंकड़े और बाद की कोचिंग भूमिका उनके क्रिकेट जीवन की व्यापक तस्वीर पेश करते हैं। वे भुवनेश्वर से निकलकर भारतीय टेस्ट टीम तक पहुंचे, ओडिशा के लिए लंबे समय तक खेले और फिर कोच के रूप में अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों के साथ काम किया। 5 नवंबर को उनकी जयंती पर उनका सफर भारतीय क्रिकेट में घरेलू ढांचे, धैर्यपूर्ण टेस्ट बल्लेबाजी और खेल के प्रति लंबे जुड़ाव की याद दिलाता है।
