5 नवंबर 1605 की सुबह इंग्लैंड में एक ऐसी साजिश का पर्दाफाश हुआ, जिसने ब्रिटिश इतिहास और वहां की राजनीतिक-सामाजिक स्मृति पर गहरी छाप छोड़ी। गाय फॉक्स (Guy Fawkes) को लंदन स्थित संसद भवन के नीचे बने तहखाने में बारूद के 36 पीपों के साथ गिरफ्तार किया गया। योजना थी कि संसद के औपचारिक उद्घाटन के समय राजा जेम्स प्रथम, शाही परिवार, मंत्रियों और संसद के सदस्यों को विस्फोट में मार दिया जाए। यह घटना इतिहास में ‘गनपाउडर प्लॉट’ के नाम से दर्ज हुई। इसकी विफलता की याद में हर साल 5 नवंबर को ब्रिटेन में बोनफायर नाइट या गाय फॉक्स नाइट मनाई जाती है।
गनपाउडर प्लॉट की पृष्ठभूमि
17वीं सदी के शुरुआती वर्षों में इंग्लैंड धार्मिक और राजनीतिक तनाव से गुजर रहा था। इंग्लैंड में रोमन कैथोलिक समुदाय पर कई कानूनी पाबंदियां थीं। कैथोलिकों को सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों, पदों और शासन व्यवस्था में भागीदारी को लेकर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। 1603 में महारानी एलिजाबेथ प्रथम की मृत्यु के बाद स्कॉटलैंड के राजा जेम्स षष्ठम इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम बने। कुछ कैथोलिकों को उम्मीद थी कि नए राजा के शासन में उनके प्रति नीतियां नरम होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इसी असंतोष और धार्मिक ध्रुवीकरण के बीच रॉबर्ट केट्सबी के नेतृत्व में कुछ कैथोलिक षड्यंत्रकारियों ने संसद को विस्फोट से उड़ाने की योजना बनाई। उनका उद्देश्य केवल संसद भवन को नुकसान पहुंचाना नहीं था; वे राजा और शासन के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर सत्ता में बड़ा बदलाव लाना चाहते थे। योजना के बाद मिडलैंड्स में विद्रोह भड़काने और राजकुमारी एलिजाबेथ को अपने नियंत्रण में लेने की भी कल्पना की गई थी। हालांकि, इस योजना के आगे के राजनीतिक परिणाम स्पष्ट रूप से तय नहीं थे।
कौन थे गाय फॉक्स?
गाय फॉक्स का जन्म 1570 में यॉर्क, इंग्लैंड में हुआ था। वह कैथोलिक पृष्ठभूमि से थे और बाद में यूरोप में स्पेनिश सेना के साथ सेवा करते हुए सैन्य अनुभव प्राप्त किया। बारूद और विस्फोटक सामग्री के इस्तेमाल का उनका अनुभव षड्यंत्रकारियों के लिए उपयोगी था। इसी कारण उन्हें संसद के नीचे रखे बारूद की निगरानी और विस्फोट को अंजाम देने की जिम्मेदारी दी गई।

गनपाउडर प्लॉट में रॉबर्ट केट्सबी प्रमुख योजनाकार थे। थॉमस विंटर, थॉमस पर्सी, जॉन राइट और गाय फॉक्स शुरुआती समूह में शामिल थे। बाद में इस षड्यंत्र में कई अन्य लोग भी जुड़े। इसलिए इस घटना को केवल गाय फॉक्स की व्यक्तिगत साजिश कहना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा; वह एक बड़े समूह की योजना का महत्वपूर्ण सदस्य था।
संसद को उड़ाने की योजना कैसे बनी?
षड्यंत्रकारियों ने 1604 में संसद के उद्घाटन के अवसर पर राजा और सांसदों को निशाना बनाने की योजना बनाई। शुरुआत में उन्होंने संसद भवन के पास एक मकान किराये पर लेकर सुरंग खोदने की कोशिश की, लेकिन यह काम कठिन साबित हुआ। बाद में मार्च 1605 में उन्हें हाउस ऑफ लॉर्ड्स के नीचे स्थित एक तहखानेनुमा स्थान किराये पर लेने का अवसर मिला। वहां धीरे-धीरे बारूद के पीपे पहुंचाए गए।
संसद का औपचारिक उद्घाटन कई बार टलने के बाद 5 नवंबर 1605 के लिए निर्धारित हुआ। उस समय तक तहखाने में 36 पीपे बारूद रखे जा चुके थे। गाय फॉक्स को ‘जॉन जॉनसन’ नाम से वहां तैनात किया गया था, ताकि वह बारूद की निगरानी कर सके और निर्धारित समय पर उसे आग लगा सके।
मॉन्टीगल का पत्र और साजिश का खुलासा
26 अक्टूबर 1605 को लॉर्ड मॉन्टीगल को एक गुमनाम पत्र मिला। उसमें उन्हें संसद के उद्घाटन में शामिल न होने की चेतावनी दी गई थी और संकेत दिया गया था कि संसद को एक बड़ा झटका लग सकता है। पत्र की भाषा से खतरे का अंदेशा हुआ। मॉन्टीगल ने इसे अधिकारियों तक पहुंचाया और अंततः यह सूचना राजा जेम्स प्रथम तथा उनके सलाहकारों तक पहुंची।

सरकार ने पहले पत्र की गंभीरता पर विचार किया और फिर संसद भवन के आसपास तलाशी कराने का निर्णय लिया। 4 नवंबर की शाम और रात में अधिकारियों ने परिसर की जांच की। शुरुआती तलाशी में गाय फॉक्स लकड़ी और कोयले के ढेर के पास मिला, लेकिन बाद की अधिक गहन जांच में लकड़ी के नीचे छिपे बारूद के 36 पीपे सामने आए। सर थॉमस नाइवेट और उनके साथियों ने उसे पकड़ लिया। इस तरह गिरफ्तारी की कार्रवाई 4 नवंबर की रात शुरू हुई और 5 नवंबर की सुबह तक वह षड्यंत्रकारी के रूप में हिरासत में था।
गिरफ्तारी, पूछताछ और षड्यंत्रकारियों का अंत
गिरफ्तारी के समय गाय फॉक्स ने अपना नाम जॉन जॉनसन बताया। पूछताछ के दौरान उसने शुरुआत में अपने साथियों के बारे में बहुत कम जानकारी दी। राजा के आदेश से 6 नवंबर के बाद उस पर यातना का इस्तेमाल किया गया, जो उस समय राजद्रोह के मामलों में अपनाई जाने वाली दमनकारी सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा थी। बाद में उसके बयानों से अन्य षड्यंत्रकारियों की पहचान और योजना के विवरण सामने आए।
साजिश का पर्दाफाश होने के बाद कई षड्यंत्रकारी लंदन से भागकर मिडलैंड्स पहुंचे। 8 नवंबर को होलबेच हाउस में सरकारी बलों के साथ मुठभेड़ में रॉबर्ट केट्सबी, थॉमस पर्सी और कुछ अन्य साथी मारे गए। बाकी बचे षड्यंत्रकारियों को गिरफ्तार किया गया। जनवरी 1606 में गाय फॉक्स और अन्य जीवित आरोपियों पर वेस्टमिंस्टर हॉल में राजद्रोह का मुकदमा चला। उन्हें दोषी ठहराया गया। फॉक्स को 31 जनवरी 1606 को फांसी, आंतरिक अंग निकालने और शरीर के टुकड़े किए जाने वाली उस समय की क्रूर सजा दी गई।
बॉनफायर नाइट की परंपरा कैसे शुरू हुई?
साजिश विफल होने के बाद संसद ने 1606 में एक कानून पारित किया, जिसके तहत 5 नवंबर को हर साल ‘डिलिवरेंस’ यानी राजा और संसद के बच जाने के लिए धन्यवाद के दिन के रूप में मनाया जाना था। इस अवसर पर चर्चों में विशेष प्रार्थनाएं और उपदेश आयोजित किए जाते थे। समय के साथ घंटियां बजाने, अलाव जलाने और आतिशबाजी करने की परंपरा विकसित हुई। बाद के दौर में अलाव पर गाय फॉक्स के पुतले जलाने का चलन भी लोकप्रिय हुआ।

यह कानून 1859 तक लागू रहा, लेकिन 5 नवंबर की सांस्कृतिक परंपरा जारी रही। आज इसे बोनफायर नाइट, फायरवर्क नाइट या गाय फॉक्स नाइट कहा जाता है। ब्रिटेन के अनेक शहरों और कस्बों में सार्वजनिक आतिशबाजी, अलाव और सामुदायिक आयोजन होते हैं। कुछ स्थानों पर बच्चे और परिवार गाय फॉक्स के पुतले भी बनाते हैं। हालांकि आयोजन का स्वरूप क्षेत्र और स्थानीय परंपरा के अनुसार बदलता है।
इतिहास की जटिल विरासत
गनपाउडर प्लॉट को केवल एक असफल विस्फोट योजना या आतिशबाजी के त्योहार की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह उस समय के धार्मिक तनाव, राजनीतिक असंतोष, राज्य की दमनकारी नीतियों और हिंसक सत्ता परिवर्तन की कोशिशों से जुड़ी घटना थी। संसद और राजा को निशाना बनाने की योजना में बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की जान जा सकती थी। दूसरी ओर, इसके बाद कैथोलिक समुदाय के प्रति संदेह और कठोरता भी बढ़ी, जिसका प्रभाव लंबे समय तक रहा।
इतिहासकारों ने इस साजिश की परिस्थितियों, सरकारी खुफिया तंत्र की भूमिका और कुछ षड्यंत्रकारियों की मंशा पर अलग-अलग व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं। ब्रिटिश संसद का आधिकारिक ऐतिहासिक विवरण भी स्वीकार करता है कि षड्यंत्र की उत्पत्ति और कुछ पहलुओं को लेकर सभी प्रश्नों के निश्चित उत्तर उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी इतना स्पष्ट है कि 5 नवंबर 1605 को बारूद के पीपों की बरामदगी ने इंग्लैंड की राजनीति और सार्वजनिक स्मृति में स्थायी स्थान बना लिया।
आज बोनफायर नाइट पर होने वाली आतिशबाजी और अलाव इस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाते हैं। यह अवसर इतिहास के उस सबक पर भी विचार करने का है कि धार्मिक या राजनीतिक मतभेदों का समाधान हिंसा और सामूहिक हत्या की साजिशों में नहीं, बल्कि संवाद, सहिष्णुता और संवैधानिक प्रक्रियाओं में खोजा जाना चाहिए।

