30 अक्टूबर को GSLV-F18 से लॉन्च हुआ था उपग्रह, ISRO ने चारों कक्षा-परिवर्तन सफल बताए; स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक और नए L1 सिग्नल से नेविगेशन सेवाओं को मिलेगी मजबूती
नई दिल्ली। रास्ता खोजने, किसी जगह की सटीक लोकेशन जानने या वाहनों की निगरानी के लिए अब तक GPS का नाम सबसे पहले याद आता है। लेकिन भारत भी अपना क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम विकसित कर रहा है। इसे NavIC (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन) कहा जाता है। इसी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 30 अक्टूबर 2026 को NVS-03 उपग्रह लॉन्च किया था। अब इस मिशन ने एक और अहम पड़ाव पार कर लिया है।
ISRO के अनुसार, NVS-03 की कक्षा बदलने के चारों चरण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए गए हैं। 4 नवंबर को जारी जानकारी में अंतरिक्ष एजेंसी ने बताया कि उपग्रह अब भू-समकालिक कक्षा में पहुंच चुका है और उसकी स्थिति सामान्य है। यह भारत की स्वदेशी नेविगेशन व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
30 अक्टूबर को GSLV-F18 से हुआ था प्रक्षेपण
NVS-03 को 30 अक्टूबर 2026 की रात 11 बजकर 51 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था। इसे GSLV-F18 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया। यह भारत के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल की 20वीं उड़ान थी।
लॉन्च के बाद उपग्रह को सीधे उसकी अंतिम कक्षा में नहीं पहुंचाया गया। पहले उसे एक निर्धारित स्थानांतरण कक्षा में स्थापित किया गया। इसके बाद उसके इंजन की मदद से कक्षा को धीरे-धीरे बदला गया। ISRO ने 4 नवंबर को बताया कि इस प्रक्रिया के तहत चार सफल कक्षा-परिवर्तन किए गए। इन दौरान लिक्विड अपोजी मोटर कुल 6,164 सेकंड तक चलाई गई।

इसके बाद उपग्रह 35,765 किलोमीटर × 36,196 किलोमीटर की भू-समकालिक कक्षा में पहुंच गया। ISRO ने उसकी स्थिति सामान्य बताई है।
क्या है NavIC और GPS से कितना अलग?
NavIC भारत का अपना क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है। इसे ISRO ने विकसित किया है। पहले इसे भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम यानी IRNSS के नाम से जाना जाता था।
आसान भाषा में समझें तो GPS की तरह NavIC भी उपग्रहों के संकेतों की मदद से किसी स्थान की स्थिति, दिशा और समय की जानकारी देता है। हालांकि, GPS अमेरिका की प्रणाली है, जबकि NavIC भारत की अपनी व्यवस्था है। इसका उद्देश्य भारत और आसपास के क्षेत्र में भरोसेमंद नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराना है।
सरकारी जानकारी के मुताबिक, NavIC की कवरेज भारतीय भूभाग के साथ देश की सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र में है। इसका इस्तेमाल नागरिक और रणनीतिक, दोनों तरह की जरूरतों के लिए किया जा सकता है।

स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक और L1 सिग्नल से क्या होगा फायदा?
NVS-03 की खासियतों में इसका स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक भी शामिल है। एटॉमिक क्लॉक बेहद सटीक समय बताने वाली घड़ी होती है। सैटेलाइट नेविगेशन में समय की सटीकता बहुत जरूरी है, क्योंकि उपग्रह से भेजे गए संकेत को धरती तक पहुंचने में लगे समय के आधार पर ही डिवाइस अपनी लोकेशन का पता लगाते हैं।
इस उपग्रह में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक के साथ दूसरे एटॉमिक क्लॉक भी लगाए गए हैं। इसमें L1 सिग्नल के अलावा L5 और S बैंड के सिग्नल भी मौजूद हैं। L1 सिग्नल जुड़ने से NavIC की तकनीकी क्षमता और अलग-अलग तरह के उपकरणों के साथ इसकी उपयोगिता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
सरकार के मुताबिक, अगली पीढ़ी के NavIC उपग्रहों में L1 सिग्नल शामिल करने का उद्देश्य नेविगेशन सेवाओं की निरंतरता, उपलब्धता और विश्वसनीयता को बेहतर बनाना है।
ट्रेन से लेकर विमान और जहाजों की निगरानी तक होगा इस्तेमाल
NavIC का उपयोग केवल मोबाइल पर लोकेशन देखने तक सीमित नहीं है। इससे परिवहन, समुद्री गतिविधियों, विमानन, आपदा प्रबंधन और खेती जैसे क्षेत्रों को भी मदद मिल सकती है। ट्रेन, विमान और जहाजों की स्थिति जानने तथा उनकी निगरानी में भी सैटेलाइट नेविगेशन उपयोगी है।

इसके अलावा, आपदा के समय राहत और बचाव दलों को प्रभावित इलाकों तक पहुंचने, समुद्र में जहाजों की स्थिति जानने और खेती में सटीक स्थान संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में भी ऐसी व्यवस्था की भूमिका हो सकती है।
NavIC में नागरिकों के लिए खुली नेविगेशन सेवा उपलब्ध है। इसके अलावा रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड यानी सुरक्षित और सीमित पहुंच वाली सेवा भी है।
NVS-03 अगली पीढ़ी के पांच उपग्रहों की श्रृंखला का हिस्सा
NVS-03 भारत की अगली पीढ़ी के पांच नेविगेशन उपग्रहों की श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है। इससे पहले NVS-01 को 29 मई 2023 और NVS-02 को 29 जनवरी 2025 को लॉन्च किया गया था। NVS-02 को लॉन्च के बाद कक्षा में ऊपर उठाने की प्रक्रिया में तकनीकी समस्या आई थी, जिसके कारण वह अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच सका।
अब NVS-03 के सफल प्रक्षेपण और कक्षा-परिवर्तन से NavIC व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिशों को आगे बढ़ाया गया है। इस श्रृंखला के NVS-04 और NVS-05 उपग्रह भी योजना का हिस्सा हैं।

फिलहाल NVS-03 की कक्षा में पहुंचने और उसकी स्थिति सामान्य होने की पुष्टि हुई है। इसके नेविगेशन सेवाओं में पूरी तरह शामिल होने की घोषणा अलग से होनी बाकी है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आम नागरिकों और विभिन्न क्षेत्रों को इसकी सेवाओं का लाभ कब से मिलने लगेगा।
