बिहार में छठ महापर्व की कल्पना शारदा सिन्हा की आवाज के बिना अधूरी-सी लगती है। घाटों पर उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बीच जब उनके गाए गीत गूंजते हैं, तो उनमें केवल भक्ति नहीं, बल्कि लोकजीवन, परिवार, प्रकृति और पीढ़ियों की सांस्कृतिक स्मृतियां भी सुनाई देती हैं। मैथिली, भोजपुरी और मगही लोकगीतों को अपनी विशिष्ट आवाज से नई पहचान देने वाली शारदा सिन्हा को इसी वजह से ‘बिहार कोकिला’ कहा गया। 5 नवंबर 2024 को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उनके निधन से भारतीय लोकसंगीत ने एक ऐसी कलाकार को खो दिया, जिसकी आवाज छठ और बिहार की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी थी।
शारदा सिन्हा का महत्व केवल लोकप्रिय गायिका होने में नहीं था। उन्होंने लोकगीतों को मंच, रेडियो, रिकॉर्डिंग और फिल्मों के माध्यम से व्यापक श्रोतावर्ग तक पहुंचाया। शास्त्रीय संगीत की तालीम और लोकधुनों की सहजता का मेल उनकी गायकी की खास पहचान बना। उनके गीत बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों में बसे भारतीय समुदायों तक पहुंचे।
सुपौल के हुलास गांव से संगीत की दुनिया तक
शारदा सिन्हा का जन्म बिहार के सुपौल जिले के हुलास गांव में हुआ था। भारत सरकार के 2025 के पद्म पुरस्कार परिचय में उनकी जन्मतिथि 1 नवंबर 1952 दर्ज है। हालांकि कुछ समाचार और प्रसारण स्रोतों में जन्मतिथि के रूप में 1 अक्टूबर 1952 भी प्रकाशित हुई है। इस अंतर को देखते हुए उनके जन्मस्थान और वर्ष का उल्लेख निर्विवाद रूप से किया जा सकता है, जबकि तारीख के लिए सरकारी पद्म परिचय को प्राथमिकता दी गई है।
उनकी संगीत शिक्षा की शुरुआत पंडित रघु झा के मार्गदर्शन में हुई, जो पंचगछिया घराने के खयाल गायक थे। आगे उन्होंने पंडित सीताराम हरि दांडेकर और ठुमरी-दादरा गायिका पन्ना देवी से भी संगीत की बारीकियां सीखीं। शारदा सिन्हा ने भारतीय शास्त्रीय गायन में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की और पीएचडी भी की। वे मणिपुरी नृत्य में ‘नृत्य विशारद’ भी थीं। इस औपचारिक प्रशिक्षण ने उनकी लोकगायकी को सुर, लय और अभिव्यक्ति की गहराई दी।

लोकगीतों को सम्मान और व्यापक मंच
शारदा सिन्हा ने अपने करियर में मैथिली, भोजपुरी, मगही, हिंदी और संस्कृत में गीत गाए। उनकी गायकी में लोकपरंपरा की सहजता के साथ शास्त्रीय संगीत की अनुशासित तैयारी दिखाई देती थी। उन्होंने विवाह गीत, ऋतु गीत, पर्व-त्योहारों के गीत, भक्ति रचनाएं और सामाजिक जीवन से जुड़े लोकगीतों को स्वर दिया। उनके गीतों में गांव की बोली, रिश्तों की आत्मीयता, स्त्रियों के अनुभव और सामुदायिक उत्सवों की जीवंतता सुनाई देती है।
उनके शुरुआती मैथिली गीतों में ‘दुलरुआ भइया’ का उल्लेख किया जाता है। इसके बाद उन्होंने भोजपुरी और मैथिली संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। ‘काहे तो से सजना’, ‘बाबुल’ और ‘तार बिजली’ जैसे फिल्मी गीतों ने उन्हें उन श्रोताओं तक भी पहुंचाया जो पारंपरिक लोकसंगीत से नियमित रूप से परिचित नहीं थे। फिल्मी गीतों में भी उनकी आवाज की लोक-गंध और भावनात्मक सहजता बनी रही।
आकाशवाणी के कार्यक्रमों और देशभर के सांस्कृतिक समारोहों में उनकी प्रस्तुतियों ने क्षेत्रीय भाषाओं के गीतों को राष्ट्रीय मंच दिया। उन्हें आकाशवाणी की ‘टॉप ग्रेड’ कलाकार के रूप में भी पहचान मिली। वे समस्तीपुर स्थित महिला महाविद्यालय के संगीत विभाग से चार दशकों से अधिक समय तक जुड़ी रहीं। इस तरह उनका योगदान मंचीय गायन के साथ संगीत शिक्षा और अगली पीढ़ी को प्रशिक्षण देने तक फैला हुआ था।
छठ गीतों ने बनाया जन-जन की आवाज
शारदा सिन्हा की लोकप्रियता का सबसे मजबूत आधार छठ गीत रहे। ‘पहिले-पहिल छठी मैया’, ‘केलवा के पात पर’, ‘उग हो सुरुज देव’, ‘हो दीनानाथ’ और ‘सुपवा ना मिले मइया’ जैसे गीत छठ पर्व के सामूहिक सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बन गए। उनके गीतों में छठ की पूजा-विधि, प्रकृति के प्रति सम्मान, परिवार की मंगलकामना और लोकभाषा की आत्मीयता एक साथ मिलती है।

छठ गीतों को लेकर उनकी एक खास परंपरा थी। वे हर वर्ष पर्व के आसपास नया गीत प्रस्तुत करने का प्रयास करती थीं। बीमारी और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के बीच भी 2024 में उनका अंतिम छठ एल्बम ‘अरघ’ श्रोताओं तक पहुंचा। बिहार भवन के एक स्मृति लेख के अनुसार, उन्होंने अपने करियर में नौ एल्बमों में 62 छठ गीत गाए। यह संख्या उनके छठ संगीत से गहरे और दीर्घकालिक जुड़ाव को दर्शाती है।
उनकी आवाज बिहार से बाहर बसे लोगों के लिए अपने घर, गांव और परिवार की याद से भी जुड़ गई। दिल्ली, मुंबई या विदेश में रहने वाले बिहार और पूर्वांचल के अनेक परिवारों के लिए छठ के अवसर पर उनके गीत सुनना परंपरा का हिस्सा बन गया। इस तरह शारदा सिन्हा ने लोकगीतों को केवल मनोरंजन नहीं रहने दिया, बल्कि प्रवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम बनाया।
लोकधुनों से हिंदी सिनेमा तक
शारदा सिन्हा की गायकी का दायरा लोकपर्वों तक सीमित नहीं था। उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी यादगार गीत गाए। ‘मैंने प्यार किया’ का ‘कहे तोसे सजना’, ‘हम आपके हैं कौन’ का ‘बाबुल’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर-2’ का ‘तार बिजली’ उनकी चर्चित फिल्मी प्रस्तुतियों में शामिल हैं। इन गीतों ने व्यापक हिंदी फिल्म दर्शकों को उनकी आवाज से परिचित कराया।
फिल्मों में उनकी मौजूदगी इस बात का उदाहरण थी कि लोकसंगीत और लोकप्रिय सिनेमा के बीच संवाद संभव है। उनकी आवाज में क्षेत्रीय संगीत की मिट्टी और भावनाओं की सहजता थी, जिसे फिल्मी धुनों में भी पहचाना जा सकता था। उन्होंने लोकगीतों की विशिष्टता को छोड़े बिना बड़े मंचों और अलग-अलग माध्यमों में अपनी जगह बनाई।

सम्मान: पद्मश्री से पद्म विभूषण तक
शारदा सिन्हा को संगीत और लोकसंस्कृति में योगदान के लिए अनेक सम्मान मिले। उन्हें 1991 में पद्मश्री और 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2018 में उन्हें कला के क्षेत्र में पद्म भूषण प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें राष्ट्रीय देवी अहिल्या सम्मान, बिहार कला पुरस्कार, बिहार गौरव, बिहार रत्न, भिखारी ठाकुर सम्मान, भोजपुरी रत्न और मिथिला विभूति सम्मान जैसे पुरस्कारों से भी नवाजा गया।
उनके निधन के बाद भारत सरकार ने 2025 में उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित करने की घोषणा की। यह देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। पद्म विभूषण के आधिकारिक परिचय में उनके लोकसंगीत, विशेषकर छठ गीतों के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक जीवन में योगदान को रेखांकित किया गया। इस सम्मान ने उनके जीवनकाल की उपलब्धियों और निधन के बाद भी बनी सांस्कृतिक उपस्थिति को राष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक मान्यता दी।
बीमारी और 5 नवंबर 2024 को निधन
शारदा सिन्हा मल्टीपल मायलोमा नामक रक्त कैंसर से जूझ रही थीं। उनका इलाज दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में चल रहा था। स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और उन्हें वेंटिलेटर पर भी रखा गया। 5 नवंबर 2024 की रात उन्होंने अंतिम सांस ली। उस समय उनकी उम्र 72 वर्ष थी। उनके निधन की खबर से बिहार सहित देशभर के संगीत प्रेमियों में शोक फैल गया।
उनका निधन छठ पर्व के दिनों में हुआ। यह संयोग उनके संगीत और पर्व के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंध को और अधिक स्मरणीय बना गया। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अनेक कलाकारों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। 7 नवंबर 2024 को पटना में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

शारदा सिन्हा की विरासत: लोकभाषा, लोकसंगीत और सांस्कृतिक स्मृति
शारदा सिन्हा की विरासत को केवल लोकप्रिय गीतों या पुरस्कारों की सूची से नहीं समझा जा सकता। उन्होंने मैथिली, भोजपुरी और मगही जैसी भाषाओं के गीतों को ऐसा मंच दिया जहां क्षेत्रीय संस्कृति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं तक पहुंची। उन्होंने लोकगायन को सम्मानजनक पेशेवर पहचान दिलाने में योगदान किया और यह दिखाया कि लोकसंगीत भी उच्च कलात्मक अनुशासन, प्रशिक्षण और व्यापक लोकप्रियता के साथ आगे बढ़ सकता है।
उनकी गायकी में स्त्रियों के जीवन, विवाह और पारिवारिक रिश्तों, ऋतुओं, खेती-किसानी, आस्था और सामाजिक उत्सवों की झलक मिलती है। छठ के गीतों में सूर्य, जल, प्रकृति और परिवार के प्रति सामूहिक कृतज्ञता का भाव है। शारदा सिन्हा ने इन भावनाओं को अपनी आवाज में इस तरह पिरोया कि गीत पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक पुल बन गए।
5 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना बिहार की लोकसांस्कृतिक विरासत और क्षेत्रीय भाषाओं के संगीत को सम्मान देना भी है। उनकी आवाज अब मंच पर प्रत्यक्ष नहीं सुनाई देती, लेकिन छठ घाटों, घरों, रेडियो, डिजिटल माध्यमों और प्रवासी परिवारों की स्मृतियों में उनके गीत लगातार गूंजते हैं। यही किसी लोक कलाकार की सबसे बड़ी विरासत है—उसकी कला समय के साथ लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाए।
