विशेष लेख | 7 नवंबर | इतिहास विशेष | भारतीय राजनीति एवं संसदीय इतिहास
भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में 7 नवंबर 1990 एक निर्णायक दिन के रूप में दर्ज है। इस दिन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी. पी. सिंह) ने लोकसभा में विश्वास मत का सामना किया, लेकिन उनकी राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी। लोकसभा के आधिकारिक कार्यवाही-विवरण के अनुसार विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 142 और विरोध में 346 मत पड़े। प्रस्ताव अस्वीकृत होते ही सरकार का पतन तय हो गया और वी. पी. सिंह ने राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण को अपना तथा मंत्रिपरिषद का इस्तीफा सौंप दिया।
1989 का जनादेश और राष्ट्रीय मोर्चा सरकार का गठन
1980 के दशक के अंतिम वर्षों में भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार, शासन और राजनीतिक जवाबदेही के प्रश्न प्रमुख हो गए थे। बोफोर्स विवाद ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की छवि को गंभीर चुनौती दी। 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। राष्ट्रीय मोर्चा के नेता वी. पी. सिंह ने जनता दल और सहयोगी दलों के समर्थन से सरकार बनाई। भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दलों ने सरकार को बाहर से समर्थन दिया।
प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक पूर्व प्रधानमंत्रियों की सूची के अनुसार वी. पी. सिंह ने 2 दिसंबर 1989 से 10 नवंबर 1990 तक प्रधानमंत्री पद संभाला। उनकी सरकार गठबंधन और बाहरी समर्थन पर निर्भर थी। इस तरह सरकार का अस्तित्व संसद में विभिन्न दलों के समर्थन और राजनीतिक सहमति पर टिका था।

मंडल आयोग की सिफारिशें और सामाजिक न्याय की राजनीति
वी. पी. सिंह सरकार के सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसलों में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा शामिल थी। 7 अगस्त 1990 को सरकार ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की दिशा में कदम उठाया। यह निर्णय सामाजिक प्रतिनिधित्व और अवसरों में समानता की बहस के केंद्र में आ गया। इसके समर्थन और विरोध में देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन हुए। विशेषकर कुछ छात्र समूहों ने आरक्षण के खिलाफ आंदोलन किया, जबकि पिछड़े वर्गों के संगठनों ने इसे लंबे समय से लंबित सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
मंडल आयोग का मुद्दा वी. पी. सिंह सरकार के राजनीतिक आधार को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल था। हालांकि सरकार के पतन को केवल मंडल निर्णय का परिणाम मानना ऐतिहासिक घटनाक्रम को अधूरा समझना होगा। गठबंधन के भीतर मतभेद, अयोध्या आंदोलन और भाजपा के समर्थन-वापसी के बीच सीधा संसदीय टकराव भी निर्णायक रहा।
राम जन्मभूमि आंदोलन, रथयात्रा और भाजपा का समर्थन वापस लेना
1990 में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद ने राष्ट्रीय राजनीति को तीव्र रूप से प्रभावित किया। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की। बिहार में समस्तीपुर के पास 23 अक्टूबर 1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद भाजपा ने वी. पी. सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस लेने का फैसला किया।
लोकसभा के 7 नवंबर 1990 के आधिकारिक वाद-विवाद में इस मुद्दे पर हुई बहस दर्ज है। बहस के दौरान आडवाणी ने राम जन्मभूमि और रथयात्रा को समर्थन-वापसी से जुड़ा कारण बताया। संसद में अन्य सदस्यों ने भी सरकार और भाजपा के बीच हुए घटनाक्रम पर सवाल उठाए। इस प्रकार, भाजपा का समर्थन वापस लेना सरकार के बहुमत संकट का तत्काल राजनीतिक कारण बना।

राष्ट्रपति की सलाह और विश्वास मत की चुनौती
भाजपा के समर्थन वापस लेने के बाद राष्ट्रीय मोर्चा सरकार लोकसभा में अल्पमत में आ गई। राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण ने प्रधानमंत्री को सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कहा। लोकसभा सचिवालय के संसदीय अध्ययन के अनुसार राष्ट्रपति ने 7 नवंबर 1990 तक बहुमत सिद्ध करने की सलाह दी। वी. पी. सिंह ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया, जिस पर 7 नवंबर को लंबी बहस हुई।
लोकसभा की कार्यवाही लगभग 11 घंटे चली और 23 सदस्यों ने चर्चा में भाग लिया। बहस में सरकार की नीतियों, सामाजिक तनाव, मंडल आयोग, अयोध्या आंदोलन, राष्ट्रीय एकता और गठबंधन राजनीति पर तीखी दलीलें सामने आईं। यह बहस केवल एक सरकार के पक्ष-विपक्ष का प्रश्न नहीं थी; इसमें उस दौर के भारत की वैचारिक और सामाजिक खींचतान भी प्रतिबिंबित हुई।
7 नवंबर 1990: लोकसभा में विश्वास मत का परिणाम
मत-विभाजन में विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 142 और विरोध में 346 मत पड़े। लोकसभा अध्यक्ष ने प्रस्ताव को अस्वीकृत घोषित किया। यह आंकड़ा संसद की आधिकारिक कार्यवाही में दर्ज है। इस परिणाम के साथ वी. पी. सिंह सरकार ने सदन का विश्वास खो दिया।
मतदान के बाद वी. पी. सिंह ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपने और मंत्रिपरिषद के इस्तीफे की पेशकश की। समकालीन समाचार अभिलेखों में भी 7 नवंबर को राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपे जाने की पुष्टि मिलती है। इस घटना को स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी केंद्र सरकार के विश्वास प्रस्ताव पराजित होने के कारण गिरने के रूप में याद किया जाता है।

इस्तीफे के बाद: चंद्रशेखर सरकार का गठन
वी. पी. सिंह सरकार के पतन के बाद जनता दल में विभाजन हुआ। चंद्रशेखर के नेतृत्व में जनता दल (समाजवादी) का गठन हुआ और कांग्रेस ने उसे बाहर से समर्थन देने का निर्णय किया। राष्ट्रपति ने चंद्रशेखर को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने 10 नवंबर 1990 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और लोकसभा में बहुमत साबित करने की प्रक्रिया शुरू की।
यहां एक महत्वपूर्ण तारीख-संबंधी अंतर समझना जरूरी है: वी. पी. सिंह ने 7 नवंबर को विश्वास मत हारने के बाद इस्तीफा सौंपा था, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक सूची में उनका कार्यकाल 10 नवंबर 1990 तक दर्ज है—यानी चंद्रशेखर के शपथ ग्रहण तक। इसलिए 7 नवंबर को इस्तीफा सौंपने और 10 नवंबर को प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल समाप्त होने, दोनों तथ्यों को अलग-अलग समझना चाहिए।
वी. पी. सिंह की राजनीतिक विरासत
वी. पी. सिंह का प्रधानमंत्री कार्यकाल लगभग 11 महीने का रहा, लेकिन इस अवधि में लिए गए निर्णयों ने भारतीय राजनीति की दिशा पर दीर्घकालीन प्रभाव डाला। मंडल आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन ने सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और आरक्षण पर राष्ट्रीय विमर्श को नया आयाम दिया। दूसरी ओर, अयोध्या आंदोलन और रथयात्रा के दौर में बढ़े राजनीतिक तथा सामाजिक तनाव ने गठबंधन सरकार की स्थिरता को चुनौती दी।
उनकी सरकार का पतन यह भी दिखाता है कि संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का पद केवल चुनावी दावे से सुरक्षित नहीं रहता; सरकार को लोकसभा का विश्वास बनाए रखना होता है। गठबंधन युग में समर्थन देने वाले दलों की राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलने पर सरकार का बहुमत भी बदल सकता है।

भारतीय संसदीय इतिहास में 7 नवंबर का महत्व
7 नवंबर 1990 की घटना भारतीय लोकतंत्र में विश्वास मत की संवैधानिक और राजनीतिक भूमिका का उल्लेखनीय उदाहरण है। लोकसभा में 142 के मुकाबले 346 मतों से प्रस्ताव का गिरना केवल संख्यात्मक पराजय नहीं थी, बल्कि उस समय के राजनीतिक गठबंधनों, सामाजिक न्याय की बहस और राष्ट्रीय मुद्दों के टकराव का परिणाम था।
वी. पी. सिंह का इस्तीफा भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों की नाजुकता और संसद की सर्वोच्चता—दोनों की याद दिलाता है। यह तारीख बताती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का अधिकार सदन के विश्वास से आता है और जब वह विश्वास समाप्त हो जाता है, तो सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
