विशेष लेख | 7 नवंबर | इतिहास के पन्नों से | विश्व राजनीति
7 नवंबर 1944 को अमेरिका के मतदाताओं ने ऐसा फैसला सुनाया, जिसने देश के राष्ट्रपति चुनावों के इतिहास में एक अनोखा अध्याय जोड़ दिया। द्वितीय विश्व युद्ध की उथल-पुथल के बीच तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट (Franklin D. Roosevelt) चौथी बार राष्ट्रपति चुने गए। वे अमेरिका के एकमात्र राष्ट्रपति हैं जिन्हें चार बार इस पद के लिए चुना गया। यह जीत केवल एक लोकप्रिय नेता की चुनावी सफलता नहीं थी; इसने युद्धकालीन नेतृत्व, लोकतांत्रिक निरंतरता, राष्ट्रपति पद की परंपरा और संवैधानिक सीमाओं पर व्यापक बहस को भी जन्म दिया।
7 नवंबर 1944: चुनाव का ऐतिहासिक परिणाम
1944 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव 7 नवंबर को हुआ। डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैरी एस. ट्रूमैन मैदान में थे। रिपब्लिकन पार्टी ने न्यूयॉर्क के गवर्नर थॉमस ई. डेवी को राष्ट्रपति पद और ओहायो के गवर्नर जॉन डब्ल्यू. ब्रिकर को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था।
रूजवेल्ट-ट्रूमैन की जोड़ी ने 531 सदस्यीय इलेक्टोरल कॉलेज में 432 वोट हासिल किए, जबकि डेवी-ब्रिकर को 99 वोट मिले। लोकप्रिय मतों में रूजवेल्ट को लगभग 53.4 प्रतिशत और डेवी को 45.9 प्रतिशत वोट मिले। इस प्रकार इलेक्टोरल कॉलेज में जीत का अंतर बड़ा था, लेकिन लोकप्रिय मतों में मुकाबला अपेक्षाकृत अधिक करीबी रहा।

युद्ध के बीच चौथे कार्यकाल का फैसला
1944 में अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में सक्रिय रूप से शामिल था। यूरोप में मित्र राष्ट्रों की सेनाएं जर्मनी के विरुद्ध आगे बढ़ रही थीं और प्रशांत क्षेत्र में जापान के साथ युद्ध जारी था। ऐसे समय में राष्ट्रपति का चुनाव केवल घरेलू नीतियों का मूल्यांकन नहीं था; मतदाताओं के सामने युद्ध को निर्णायक जीत तक पहुंचाने, सैनिकों और सहयोगी देशों के साथ प्रतिबद्धता बनाए रखने तथा युद्धोत्तर विश्व व्यवस्था की दिशा तय करने का प्रश्न भी था।
रूजवेल्ट ने 1933 में महामंदी के दौर में राष्ट्रपति पद संभाला था। न्यू डील कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने आर्थिक संकट से निपटने के लिए संघीय सरकार की भूमिका का विस्तार किया। 1940 में वे तीसरी बार चुने गए थे—यह अमेरिकी इतिहास में पहले से चली आ रही दो कार्यकाल की परंपरा से अलग कदम था। 1944 में चौथी बार चुनाव लड़ने का उनका निर्णय इसी असाधारण राजनीतिक पृष्ठभूमि में आया।
रूजवेल्ट की पार्टी में भी उनके स्वास्थ्य और चौथे कार्यकाल को लेकर चर्चा थी। फिर भी डेमोक्रेटिक नेतृत्व के बड़े हिस्से ने युद्ध के बीच नेतृत्व में निरंतरता को प्राथमिकता दी। रिपब्लिकन उम्मीदवार थॉमस डेवी ने प्रशासन की नीतियों, सरकारी अक्षमता और राष्ट्रपति के स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को उठाया, लेकिन मतदाताओं ने अंततः रूजवेल्ट के नेतृत्व पर भरोसा जताया।
हैरी ट्रूमैन उपराष्ट्रपति उम्मीदवार कैसे बने?
1944 के चुनाव में उपराष्ट्रपति पद का चयन भी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम था। रूजवेल्ट के मौजूदा उपराष्ट्रपति हेनरी ए. वालेस उदारवादी विचारों के लिए जाने जाते थे। डेमोक्रेटिक पार्टी के कई प्रभावशाली नेताओं और दक्षिणी राज्यों के रूढ़िवादी प्रतिनिधियों को आशंका थी कि वालेस के साथ चुनाव लड़ने से पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ सकते हैं। इसलिए पार्टी सम्मेलन में मिसौरी के सीनेटर हैरी एस. ट्रूमैन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया।

ट्रूमैन का चयन आगे चलकर ऐतिहासिक रूप से निर्णायक साबित हुआ। 20 जनवरी 1945 को रूजवेल्ट ने चौथे कार्यकाल की शपथ ली और ट्रूमैन उपराष्ट्रपति बने। 12 अप्रैल 1945 को रूजवेल्ट का निधन हो गया। इसके बाद ट्रूमैन ने राष्ट्रपति पद संभाला और युद्ध के अंतिम चरण तथा युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़े कठिन फैसलों का नेतृत्व किया।
रूजवेल्ट की राजनीतिक यात्रा: 1932 से 1944 तक
फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट का जन्म 30 जनवरी 1882 को न्यूयॉर्क राज्य के हाइड पार्क में हुआ था। वे डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता थे और 1932 के चुनाव में महामंदी के बीच राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने 1933, 1937 और 1941 में राष्ट्रपति पद की शपथ ली तथा 1944 में चौथी बार निर्वाचित हुए। उनके चार चुनावी कार्यकालों में अमेरिका ने महामंदी, द्वितीय विश्व युद्ध और वैश्विक शक्ति-संतुलन में बड़े बदलावों का सामना किया।
रूजवेल्ट की लोकप्रियता का आधार केवल युद्धकालीन नेतृत्व नहीं था। न्यू डील के अंतर्गत बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था में सुधार, रोजगार कार्यक्रम, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक नियमन से जुड़े कदमों ने संघीय सरकार और नागरिकों के संबंध को नया रूप दिया। उनके समर्थकों के लिए वे संकट के समय निर्णायक नेतृत्व का प्रतीक थे; आलोचकों ने उनकी नीतियों में संघीय सत्ता के अत्यधिक विस्तार और प्रशासनिक हस्तक्षेप पर सवाल उठाए।
दो कार्यकाल की परंपरा और 22वां संवैधानिक संशोधन
अमेरिकी संविधान में शुरू से राष्ट्रपति के लिए दो निर्वाचित कार्यकाल की स्पष्ट सीमा नहीं थी। हालांकि जॉर्ज वॉशिंगटन ने दो कार्यकाल के बाद पद छोड़कर एक राजनीतिक परंपरा स्थापित की, जिसे बाद के अधिकांश राष्ट्रपतियों ने अपनाया। रूजवेल्ट ने 1940 में तीसरी और 1944 में चौथी बार चुनाव जीतकर इस परंपरा को तोड़ा।

उनकी चौथी जीत के बाद राष्ट्रपति के कार्यकाल की सीमा को संविधान में स्पष्ट रूप से तय करने की मांग को राजनीतिक समर्थन मिला। कांग्रेस ने 1947 में 22वां संशोधन राज्यों के अनुमोदन के लिए भेजा और 27 फरवरी 1951 को इसे आवश्यक राज्यों की मंजूरी मिल गई। इस संशोधन के तहत सामान्यतः कोई व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति निर्वाचित नहीं हो सकता। इस तरह रूजवेल्ट की चार चुनावी जीत अमेरिकी इतिहास में एक अद्वितीय अपवाद बनकर रह गईं।
चौथा कार्यकाल: शपथ, युद्ध और अधूरा नेतृत्व
रूजवेल्ट ने 20 जनवरी 1945 को चौथे कार्यकाल की शपथ ली। युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ था। यूरोप में जर्मनी की पराजय निकट थी, लेकिन प्रशांत क्षेत्र में लड़ाई जारी थी। रूजवेल्ट ने युद्ध जीतने के साथ-साथ ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की बात की, जो भविष्य में बड़े युद्धों की आशंका कम कर सके। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की दिशा में चल रही कूटनीतिक प्रक्रिया भी इसी व्यापक युद्धोत्तर सोच का हिस्सा थी।
लेकिन उनका चौथा कार्यकाल बहुत छोटा रहा। 12 अप्रैल 1945 को जॉर्जिया के वार्म स्प्रिंग्स में उनका निधन हो गया। उपराष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने उसी दिन राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभाली। इस प्रकार 1944 में मतदाताओं द्वारा दिए गए चौथे जनादेश को रूजवेल्ट स्वयं पूरा नहीं कर सके।
इतिहास में 7 नवंबर 1944 का महत्व
7 नवंबर 1944 का चुनाव कई कारणों से याद किया जाता है। पहला, इसने युद्ध के बीच अमेरिकी मतदाताओं की ओर से मौजूदा नेतृत्व को निरंतरता देने का फैसला दर्ज किया। दूसरा, इसने फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट को चार बार निर्वाचित होने वाला अमेरिका का पहला और अब तक का एकमात्र राष्ट्रपति बनाया। तीसरा, इसने राष्ट्रपति पद की अवधि और सत्ता के लोकतांत्रिक संतुलन पर बहस को तेज किया, जिसका संवैधानिक परिणाम 22वें संशोधन के रूप में सामने आया।

रूजवेल्ट की विरासत पर इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच मतभेद हो सकते हैं—उनकी आर्थिक नीतियों, युद्धकालीन निर्णयों और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े कुछ फैसलों की आलोचना भी होती रही है। फिर भी यह निर्विवाद है कि उनका राष्ट्रपति काल अमेरिकी इतिहास के सबसे निर्णायक दौरों में से एक था। 7 नवंबर 1944 की जीत इसी असाधारण दौर का महत्वपूर्ण पड़ाव थी।
निष्कर्ष
फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट की 7 नवंबर 1944 की चौथी चुनावी जीत अमेरिकी लोकतंत्र, युद्धकालीन राजनीति और संवैधानिक इतिहास का विशिष्ट अध्याय है। उन्होंने उस समय चौथा जनादेश हासिल किया जब दुनिया का बड़ा हिस्सा युद्ध की आग में झुलस रहा था। उनकी मृत्यु के बाद 22वें संशोधन ने राष्ट्रपति के लिए दो निर्वाचित कार्यकाल की सीमा तय कर दी। इसलिए रूजवेल्ट की चार बार की चुनावी सफलता केवल एक व्यक्ति का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के विकास में निर्णायक मोड़ भी है।
