विशेष लेख | 7 नवंबर | पुण्यतिथि विशेष | विश्व इतिहास एवं मानवाधिकार
बीसवीं सदी के सार्वजनिक जीवन में एलेनोर रूजवेल्ट (Anna Eleanor Roosevelt) का स्थान असाधारण है। वे अमेरिका की प्रथम महिला (First Lady) रहीं, लेकिन उनकी पहचान राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट की पत्नी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सामाजिक न्याय, नस्लीय समानता, महिलाओं के अधिकार, शरणार्थियों और वंचित समुदायों के लिए लगातार आवाज उठाई। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की पहली अध्यक्ष के रूप में उन्होंने मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights—UDHR) को आकार देने और उसे स्वीकार कराने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। 7 नवंबर 1962 को उनका निधन हुआ।
न्यूयॉर्क में जन्म और शुरुआती जीवन
एलेनोर रूजवेल्ट का जन्म 11 अक्टूबर 1884 को न्यूयॉर्क शहर में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनका बचपन आसान नहीं था। कम उम्र में ही उन्होंने अपनी मां और पिता दोनों को खो दिया और उनका पालन-पोषण मुख्यतः नानी के संरक्षण में हुआ। किशोरावस्था में उन्हें इंग्लैंड के एलेंसवुड स्कूल भेजा गया। वहां की प्रधानाचार्य मैरी सॉवेस्ट्रे ने उनमें आत्मविश्वास, स्वतंत्र सोच और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को प्रोत्साहित किया।
1902 में अमेरिका लौटने के बाद एलेनोर ने न्यूयॉर्क के सामाजिक सेवा कार्यों में भाग लेना शुरू किया। वे सेटलमेंट हाउस से जुड़ीं और गरीब तथा प्रवासी परिवारों की परिस्थितियों को करीब से समझा। इस अनुभव ने उनके भीतर सामाजिक असमानता के प्रति संवेदनशीलता और सार्वजनिक सेवा की प्रतिबद्धता विकसित की। 17 मार्च 1905 को उनका विवाह अपने दूर के रिश्तेदार फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट से हुआ। दंपती के छह बच्चे हुए, जिनमें से एक का शैशवावस्था में निधन हो गया।

प्रथम महिला की भूमिका को नया अर्थ
4 मार्च 1933 को फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ ली और एलेनोर देश की प्रथम महिला बनीं। उन्होंने इस पद को केवल औपचारिक सामाजिक आयोजनों तक सीमित नहीं रखा। वे देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा करतीं, कारखानों, स्कूलों, अस्पतालों, खदानों और राहत शिविरों का दौरा करतीं तथा आम लोगों की समस्याओं को राष्ट्रपति प्रशासन और जनता के सामने रखतीं।
1933 में उन्होंने महिला पत्रकारों के लिए नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू कीं। इन बैठकों में पुरुष पत्रकारों को शामिल नहीं किया जाता था, जिससे समाचार संस्थानों को महिला संवाददाताओं को नियुक्त करने के लिए प्रोत्साहन मिला। यह कदम उस समय के मीडिया जगत में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ाने वाला साबित हुआ। 1935 से उन्होंने अपना सिंडिकेटेड अखबारी कॉलम My Day लिखना शुरू किया। इसमें वे रोजमर्रा के अनुभवों के साथ श्रम, शिक्षा, नस्लीय भेदभाव, लोकतंत्र और सार्वजनिक नीति जैसे मुद्दों पर विचार रखती थीं। यह कॉलम उनकी मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले तक जारी रहा।
एलेनोर ने नागरिक अधिकारों के प्रश्न पर भी कई बार अपने ही राजनीतिक सहयोगियों और दक्षिणी राज्यों के प्रभावशाली नेताओं से मतभेद मोल लिए। 1939 में अश्वेत ओपेरा गायिका मैरियन एंडरसन को वॉशिंगटन के कॉन्स्टिट्यूशन हॉल में प्रस्तुति देने से रोके जाने के बाद एलेनोर ने डॉटर्स ऑफ द अमेरिकन रिवोल्यूशन की सदस्यता छोड़ दी। उन्होंने एंडरसन के समर्थन में लिंकन मेमोरियल के सामने खुले आयोजन को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई। यह घटना नस्लीय अलगाव के खिलाफ सार्वजनिक विरोध का प्रतीक बनी।
युद्धकालीन सेवा और सामाजिक सरोकार
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एलेनोर ने अमेरिकी सैनिकों का मनोबल बढ़ाने और युद्ध से प्रभावित लोगों की स्थिति समझने के लिए यात्राएं कीं। 1941 से 1942 तक उन्होंने Office of Civilian Defense में सहायक निदेशक के रूप में काम किया। उन्होंने सैनिक शिविरों, अस्पतालों और अन्य संस्थानों का दौरा किया। साथ ही वे श्रमिकों, महिलाओं, बच्चों, अल्पसंख्यकों और विस्थापित लोगों की समस्याओं को सार्वजनिक विमर्श में लाती रहीं।

उनका दृष्टिकोण यह था कि लोकतंत्र की कसौटी केवल चुनाव या संवैधानिक संस्थाएं नहीं, बल्कि यह भी है कि समाज अपने कमजोर और वंचित सदस्यों के साथ कैसा व्यवहार करता है। इसी सोच ने उन्हें नागरिक अधिकार आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रयासों के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु बनाया।
संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार आयोग का नेतृत्व
12 अप्रैल 1945 को राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट का निधन हुआ। व्हाइट हाउस छोड़ने के बाद भी एलेनोर सार्वजनिक जीवन से अलग नहीं हुईं। राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने 1945 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का सदस्य नियुक्त किया। 1946 में वे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की पहली अध्यक्ष बनीं। यह वह समय था जब द्वितीय विश्वयुद्ध की भयावहता और नरसंहार के बाद दुनिया मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता के लिए साझा अंतरराष्ट्रीय मानकों की आवश्यकता महसूस कर रही थी।
आयोग के अध्यक्ष के रूप में एलेनोर ने विभिन्न देशों, राजनीतिक व्यवस्थाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतिनिधियों के बीच संवाद बनाए रखने का प्रयास किया। फरवरी 1947 में प्रारंभिक मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में उनके साथ चीन के पेंग-चुन चांग और लेबनान के चार्ल्स मलिक जैसे प्रतिनिधि प्रमुख रूप से जुड़े। संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के जॉन हम्फ्री ने प्रारंभिक मसौदा तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई; फ्रांस के रेने कैसां सहित अनेक विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने पाठ को विकसित किया। इसलिए घोषणा किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं, बल्कि बहुपक्षीय विचार-विमर्श और सहयोग का परिणाम थी।
एलेनोर की विशेष उपलब्धि यह थी कि उन्होंने वैचारिक मतभेदों और शीतयुद्ध के बढ़ते तनाव के बीच वार्ता को आगे बढ़ाया। 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पेरिस में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकार किया। इसमें जीवन, स्वतंत्रता, समानता, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा, काम और सामाजिक सुरक्षा सहित मानव गरिमा से जुड़े अधिकारों का व्यापक खाका प्रस्तुत किया गया। घोषणा अपने आप में संधि नहीं थी, लेकिन उसने आगे के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों और संस्थाओं के लिए एक प्रभावशाली आधार तैयार किया।

मानवाधिकारों में महिलाओं की आवाज और भारत का योगदान
घोषणा के निर्माण में एलेनोर की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी, लेकिन इसके पाठ और दृष्टि को आकार देने में दुनिया के अनेक प्रतिनिधियों का योगदान रहा। भारत की प्रतिनिधि हंसा मेहता ने लैंगिक समानता के प्रश्न पर उल्लेखनीय हस्तक्षेप किया। उन्हें व्यापक रूप से अनुच्छेद 1 की भाषा को अधिक समावेशी बनाने में योगदान का श्रेय दिया जाता है—“All men are born free and equal” के स्थान पर “All human beings are born free and equal” की अभिव्यक्ति को आगे बढ़ाने के लिए। यह उदाहरण बताता है कि सार्वभौम घोषणा का निर्माण विभिन्न देशों की महिला प्रतिनिधियों और मानवाधिकार समर्थकों के साझा प्रयासों से हुआ।
एलेनोर ने मानवाधिकारों को केवल कूटनीतिक दस्तावेज तक सीमित नहीं माना। वे उन्हें प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन से जोड़ती थीं—घर, स्कूल, कार्यस्थल और समुदाय में सम्मान तथा अवसर की समानता से। बाद में उन्होंने मानवाधिकारों की इसी व्यावहारिक समझ को अपने भाषणों और लेखन में लगातार दोहराया।
अंतिम वर्ष, सम्मान और विरासत
1953 में एलेनोर ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से इस्तीफा दे दिया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मानवाधिकारों के पक्ष में काम जारी रखा। 1961 में राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने उन्हें फिर संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधिमंडल में नियुक्त किया और राष्ट्रपति के महिला स्थिति आयोग (President’s Commission on the Status of Women) की अध्यक्षता सौंपी। इस आयोग ने अमेरिका में महिलाओं की कानूनी और आर्थिक स्थिति, रोजगार में अवसर तथा समानता से जुड़े प्रश्नों की समीक्षा की।
एलेनोर ने अनेक पुस्तकें लिखीं और My Day कॉलम के माध्यम से दशकों तक सार्वजनिक जीवन पर टिप्पणी की। 1962 में 7 नवंबर को न्यूयॉर्क शहर में 78 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। 1968 में उन्हें मरणोपरांत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

एलेनोर रूजवेल्ट की विरासत इस बात में निहित है कि उन्होंने प्रभावशाली पद को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उन्होंने प्रथम महिला की पारंपरिक भूमिका को सक्रिय सार्वजनिक नेतृत्व में बदला, नस्लीय भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने में योगदान दिया। मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा आज भी दुनिया भर में न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की चर्चा का एक महत्त्वपूर्ण आधार है। इस ऐतिहासिक दस्तावेज के निर्माण में एलेनोर रूजवेल्ट का नेतृत्व उन्हें आधुनिक विश्व इतिहास की सबसे प्रभावशाली मानवाधिकार हस्तियों में स्थान दिलाता है।
