कोलकाता। तकनीक के तेजी से बदलते दौर में मनुष्य की संवेदना, स्मृति और आत्मीयता किस तरह सुरक्षित रह सकती है—इसी सवाल को केंद्र में रखकर कोलकाता में डॉ. सुनील कुमार शर्मा के नवीन काव्य-संग्रह ‘सिलिकॉन की शिराओं में शब्द’ पर पुस्तक परिचर्चा आयोजित की गई। भारतीय भाषा परिषद और साहित्यिक संस्था परिवेश के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने संग्रह की कविताओं के माध्यम से तकनीक, मनुष्यता और समकालीन जीवन के आपसी संबंधों पर विचार रखे।
कार्यक्रम की शुरुआत कवि डॉ. सुनील कुमार शर्मा के कविता-पाठ से हुई। उन्होंने अपने नए संग्रह से कुछ कविताएं सुनाईं। इसके बाद सुषमा कुमारी ने स्वागत वक्तव्य देते हुए उपस्थित साहित्यकारों और अतिथियों का अभिनंदन किया। उन्होंने नए काव्य-संग्रह के प्रकाशन पर कवि को बधाई दी। परिचर्चा में अलग-अलग वक्ताओं ने संग्रह की विषयवस्तु और उसकी रचनात्मक दृष्टि पर अपने विचार रखे।
तकनीक के बीच मनुष्यता की तलाश
डॉ. मधु सिंह ने कहा कि यह पुस्तक सिलिकॉन के समय में मनुष्यता की तलाश करती है। उनके अनुसार, तकनीक से निर्मित होती दुनिया के बीच कविता-संग्रह मनुष्य होने के अर्थ और उसकी संवेदनात्मक पहचान को रेखांकित करता है। इस टिप्पणी में संग्रह के केंद्रीय प्रश्न की ओर ध्यान दिलाया गया—तकनीकी बदलाव के बीच मनुष्य की अनुभूति और मानवीय संबंधों का महत्व किस तरह बना रहे।
डॉ. संजय राय ने कवि की रचनात्मक यात्रा पर बात करते हुए कहा कि सुनील कुमार शर्मा की कविताएं ‘रिदम से एल्गोरिदम’ तक की यात्रा करती हैं। इस कथन के जरिए उन्होंने कविता की पारंपरिक लय और आज के डिजिटल तथा तकनीकी परिवेश के बीच संबंध को सामने रखा। संग्रह का शीर्षक भी इसी द्वंद्व की ओर संकेत करता है, जहां सिलिकॉन आधुनिक तकनीकी सभ्यता का प्रतीक है और शब्द मानवीय अभिव्यक्ति का माध्यम हैं।

मशीनों के प्रभाव के बीच संवेदना बचाने का आग्रह
डॉ. कमल कुमार ने संग्रह को मनुष्यता के अस्तित्व का जीवंत दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि यह कृति तकनीक का विरोध नहीं करती, बल्कि मशीनों के बढ़ते प्रभाव के बीच मनुष्य के भीतर की संवेदनाओं, स्मृतियों और आत्मीयता को बचाए रखने का आह्वान करती है। इस दृष्टि से पुस्तक तकनीकी विकास को एकतरफा खारिज करने के बजाय उसके साथ मनुष्य के संबंधों पर विचार करने का अवसर देती है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुरलीधर शर्मा ‘तालिब’ ने कहा कि यह कविता-संग्रह हिंदी कविता में एक नई लीक बनाता है। उनका मानना था कि आने वाले समय में अन्य कवि भी इस परंपरा का अनुसरण कर सकते हैं। उनके वक्तव्य में संग्रह की विषयगत नवीनता और हिंदी कविता में उसके संभावित प्रभाव को रेखांकित किया गया।
एआई और मनुष्य के बीच बुनियादी अंतर पर चर्चा
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मनुष्य के बीच अंतर पर विचार रखा। उन्होंने कहा कि एआई के पास नकार की शक्ति नहीं होती और यही मनुष्य तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बीच एक बुनियादी अंतर है। उन्होंने संग्रह को तकनीक और उससे प्रभावित होती मानवीय संवेदना का प्रभावशाली दस्तावेज बताते हुए ऐसी कृति का स्वागत किया।
डॉ. शंभुनाथ की टिप्पणी ने परिचर्चा को व्यापक वैचारिक संदर्भ दिया। तकनीक के उपयोग और उसके प्रभाव पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य की आलोचनात्मक क्षमता, असहमति और संवेदना साहित्य की महत्वपूर्ण जमीन हैं। संग्रह की कविताओं को इसी संदर्भ में पढ़ा गया।

साहित्यिक संवाद और पुस्तक की रचनात्मक यात्रा
कार्यक्रम का संयोजन और संचालन डॉ. आदित्य विक्रम सिंह ने किया। उन्होंने संग्रह को हिंदी कविता की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। अंत में आकांक्षा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। आयोजन में कवि के पाठ, स्वागत वक्तव्य और आलोचनात्मक टिप्पणियों के जरिए पुस्तक के विभिन्न पक्षों पर संवाद हुआ।
‘सिलिकॉन की शिराओं में शब्द’ पर हुई परिचर्चा का महत्व केवल एक नए कविता-संग्रह की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। इसमें समकालीन साहित्य के सामने मौजूद एक अहम प्रश्न पर बात हुई—जब जीवन के अधिकाधिक हिस्से में तकनीक और एल्गोरिदम की भूमिका बढ़ रही है, तब कविता मनुष्य की आंतरिक दुनिया, उसकी स्मृतियों और संवेदनाओं को किस तरह अभिव्यक्त करती है। वक्ताओं ने संग्रह को इसी प्रश्न से संवाद करती कृति के रूप में देखा।
हिंदी कविता में नए विषयों की संभावना
परिचर्चा में व्यक्त विचारों से स्पष्ट हुआ कि संग्रह तकनीकी शब्दावली और मानवीय अनुभवों को आमने-सामने रखकर पढ़े जाने की गुंजाइश पैदा करता है। वक्ताओं ने इसे तकनीक-विरोधी रचना के बजाय मनुष्य-केंद्रित दृष्टि से देखने पर बल दिया। इस आयोजन ने कोलकाता के साहित्यिक परिवेश में समकालीन हिंदी कविता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानवीय मूल्यों पर विचार-विमर्श का अवसर उपलब्ध कराया।
