विशेष लेख | 7 नवंबर | जयंती विशेष | इतिहास एवं किसान आंदोलन
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल राजनीतिक नेताओं, आंदोलनों और सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है; यह उन करोड़ों किसानों की आवाज भी है, जिनके श्रम पर देश की अर्थव्यवस्था टिकी थी। इस आवाज को संगठित करने और किसानों के सवालों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने वाले प्रमुख नेताओं में आचार्य एन. जी. रंगा का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है। किसान परिवार में जन्मे रंगा ने अपना सार्वजनिक जीवन ग्रामीण समाज, खेतिहर मजदूरों और कृषक समुदाय के अधिकारों के लिए समर्पित किया। वे स्वतंत्रता सेनानी, अर्थशास्त्री, किसान संगठनकर्ता और लंबे समय तक संसद में सक्रिय रहे जनप्रतिनिधि थे।
निडुब्रोलु में जन्म और शिक्षा
गोगिनेनी रंगा नायाकुलु, जिन्हें देश एन. जी. रंगा या आचार्य रंगा के नाम से जानता है, का जन्म 7 नवंबर 1900 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के गुंटूर जिले के निडुब्रोलु गांव में हुआ था। संसद के आधिकारिक सदस्य-परिचय में उनके पिता का नाम नागय्या दर्ज है। ग्रामीण और कृषक परिवेश से निकले रंगा ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड का रुख किया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड में अध्ययन किया और अर्थशास्त्र में बी. लिट. की उपाधि प्राप्त की।
भारत लौटने के बाद उन्होंने मद्रास के पचैयप्पा कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में काम किया। अध्यापन और आर्थिक अध्ययन ने उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि उत्पादन, किसानों की आय और सामाजिक असमानताओं को समझने का आधार दिया। लेकिन उनका झुकाव धीरे-धीरे अकादमिक जीवन से आगे बढ़कर सार्वजनिक कार्य और किसान संगठन की ओर हो गया।

किसानों को संगठित करने की पहल
1920 और 1930 के दशक में औपनिवेशिक भारत का किसान अनेक स्तरों पर संकट झेल रहा था। भूमि-राजस्व, लगान, कर्ज, बिचौलियों और जमींदारी व्यवस्था के दबाव के साथ-साथ वैश्विक आर्थिक मंदी ने ग्रामीण जीवन को और कठिन बना दिया था। रंगा ने महसूस किया कि किसानों की समस्याओं का समाधान केवल व्यक्तिगत याचिकाओं से संभव नहीं; इसके लिए उन्हें संगठित होकर अपनी मांगें उठानी होंगी।
1923 से उन्होंने आंध्र क्षेत्र में किसानों और कृषि मजदूरों के संगठन बनाने का काम शुरू किया। किसान सभाओं, सम्मेलनों और ग्रामीण कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के जरिए उन्होंने गांवों में राजनीतिक चेतना विकसित करने का प्रयास किया। निडुब्रोलु में किसान कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने वाली संस्था और किसान संगठनों के निर्माण की पहल उनके काम का अहम हिस्सा बनी। 1933 में आंध्र में किसानों के आंदोलनों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने कृषक समुदाय की आर्थिक स्वतंत्रता और सम्मान को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाया।
उनकी दृष्टि में किसान केवल कृषि उत्पादन करने वाला व्यक्ति नहीं था, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र का महत्वपूर्ण नागरिक था। वे चाहते थे कि किसान अपने अधिकारों, नीतियों और राजनीतिक फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता हासिल करें। यही सोच उनके किसान आंदोलन की वैचारिक आधारशिला बनी।
अखिल भारतीय किसान सभा और राष्ट्रीय किसान आंदोलन
किसान संगठनों को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की आवश्यकता 1930 के दशक में अधिक स्पष्ट हुई। जनवरी 1936 में मेरठ में किसान संगठन के निर्माण की तैयारी के लिए हुई बैठकों में एन. जी. रंगा और जयप्रकाश नारायण को प्रस्तावित अखिल भारतीय किसान कांग्रेस की तैयारी से जुड़ी जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में विभिन्न प्रांतीय किसान संगठनों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हुआ, जिसमें अखिल भारतीय किसान कांग्रेस की स्थापना की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यही संगठन आगे चलकर अखिल भारतीय किसान सभा के नाम से जाना गया।

इस ऐतिहासिक पहल में स्वामी सहजानंद सरस्वती, एन. जी. रंगा, इंदुलाल याज्ञिक, जयप्रकाश नारायण और अनेक किसान व राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका रही। स्वामी सहजानंद इसके प्रथम अध्यक्ष बने और रंगा संगठन के निर्माण तथा विस्तार में महत्वपूर्ण सहयोगी रहे। इसलिए किसान आंदोलन के इतिहास में रंगा को स्वामी सहजानंद के साथ उसके प्रमुख अग्रदूतों में गिना जाता है।
किसान सभा का उद्देश्य कृषक समुदाय को आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाना और किसानों-मजदूरों को आर्थिक तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए संगठित करना था। इस मंच ने लगान, कर्ज, जमींदारी शोषण और ग्रामीण असमानता जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा। रंगा की संगठन क्षमता और ग्रामीण समाज की समझ ने इस प्रक्रिया को मजबूती दी।
स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी
महात्मा गांधी के आह्वान से प्रेरित होकर रंगा 1930 में स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े। उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया। बाद के वर्षों में व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उनकी भागीदारी रही। किसान समुदाय को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ना उनके राजनीतिक काम का महत्वपूर्ण पक्ष था। उनके लिए राजनीतिक आजादी और किसानों की आर्थिक मुक्ति परस्पर जुड़ी हुई थीं।
किसानों के बीच संगठन और राजनीतिक जागरूकता फैलाने के कारण उन्हें औपनिवेशिक शासन के दौरान जेल भी जाना पड़ा। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका का महत्व इस बात में था कि उन्होंने ग्रामीण भारत की समस्याओं को राष्ट्रीय आंदोलन के एजेंडे से जोड़ने का प्रयास किया।

संसदीय जीवन और राजनीतिक विचार
रंगा का संसदीय जीवन स्वतंत्रता से पहले शुरू हुआ। वे 1930 में केंद्रीय विधान सभा के सदस्य बने और बाद में संविधान सभा तथा अस्थायी संसद से भी जुड़े। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने राज्यसभा और लोकसभा, दोनों सदनों में प्रतिनिधित्व किया। संसद के सदस्य-परिचय के अनुसार वे 1952 से 1956 तक राज्यसभा में रहे; बाद में 1957 से 1970 तक लोकसभा के सदस्य रहे और 1977 से 1979 के बीच फिर राज्यसभा पहुंचे। 1980 से 1991 तक उन्होंने लोकसभा में गुंटूर का प्रतिनिधित्व किया।
वे कांग्रेस संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। बाद में कृषि नीति, सहकारी खेती और किसानों के हितों से जुड़े प्रश्नों पर मतभेद के चलते उन्होंने अलग राजनीतिक राह अपनाई। 1951 में उन्होंने कृषिकार लोक पार्टी बनाई। 1959 में सी. राजगोपालाचारी और अन्य नेताओं के साथ स्वतंत्र पार्टी के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे 1959 से 1969 तक इस पार्टी के अध्यक्ष रहे। उनके राजनीतिक विचारों में किसान की आर्थिक स्वतंत्रता, निजी पहल, लोकतांत्रिक अधिकार और राज्य की नीतियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि प्रमुख थीं।
संसद में रंगा की पहचान स्पष्ट वक्ता और किसानों के सवालों को लगातार उठाने वाले सदस्य की थी। वे सत्ता पक्ष में हों या विपक्ष में, कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उत्पादक समुदायों से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखते थे। संसद के अभिलेखों में उनके लंबे सार्वजनिक जीवन, विभिन्न समितियों में भागीदारी और अनेक पुस्तकों के लेखन का उल्लेख मिलता है।
सम्मान, लेखन और विरासत
रंगा ने किसान आंदोलन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राजनीति पर कई पुस्तकें लिखीं। संसद के आधिकारिक परिचय में उनकी अंग्रेजी की 65 पुस्तकों का उल्लेख है। वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे, बल्कि किसान प्रश्नों पर विचार और विमर्श को व्यवस्थित करने वाले लेखक तथा शिक्षक भी थे।

कृषक समुदाय के लिए उनके योगदान को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने 1991 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 9 जून 1995 को उनका निधन हुआ। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक सेवा और संसदीय कार्य में बीता।
किसान आंदोलन के इतिहास में एन. जी. रंगा का महत्व
एन. जी. रंगा को भारतीय किसान आंदोलन का जनक कहे जाने का आशय यह नहीं कि किसान संगठित होने की प्रक्रिया में उनसे पहले कोई प्रयास नहीं हुआ था। भारत के अलग-अलग हिस्सों में किसान प्रतिरोध और संगठन की अपनी परंपराएं थीं। रंगा का ऐतिहासिक योगदान इन क्षेत्रीय पहलों को व्यापक राजनीतिक चेतना और अखिल भारतीय संगठनात्मक प्रयास से जोड़ने में था। उन्होंने किसानों को अपने अधिकारों के लिए बोलने, संगठित होने और लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपनी जगह बनाने की प्रेरणा दी।
आज कृषि संकट, किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार, भूमि अधिकार और कृषि नीति पर होने वाली बहसों के बीच रंगा की विरासत प्रासंगिक बनी हुई है। उनका जीवन याद दिलाता है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब खेतों में काम करने वाले लोगों की आवाज नीति-निर्माण और संसद तक पहुंचे। 7 नवंबर को उनकी जयंती केवल एक नेता को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि भारतीय किसान आंदोलन के उस लंबे संघर्ष को समझने का दिन भी है, जिसने ग्रामीण भारत को राष्ट्रीय विमर्श में मजबूत स्थान दिलाने की कोशिश की।
