विशेष लेख | 7 नवंबर | जयंती विशेष | साहित्य एवं संस्कृति
हिंदी कविता में कुछ कवि ऐसे हैं जिनकी रचनाएँ केवल अपने समय का बयान नहीं करतीं, बल्कि समाज के भीतर छिपे अन्याय, असमानता और मानवीय पीड़ा को पहचानने की दृष्टि भी देती हैं। चंद्रकांत देवताले ऐसे ही कवि थे। उनकी कविता में आम आदमी का संघर्ष, स्त्री का अनुभव, आदिवासी और वंचित समुदायों का जीवन, सत्ता की हिंसा तथा मनुष्य की जिजीविषा एक साथ उपस्थित होते हैं। उनकी भाषा में संवेदना की गर्मी और प्रतिरोध की बेचैनी थी। 7 नवंबर 1936 को मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के जौलखेड़ा गाँव में जन्मे देवताले ने हिंदी कविता को एक विशिष्ट सामाजिक और राजनीतिक स्वर दिया।
जौलखेड़ा से साहित्यिक दुनिया तक
चंद्रकांत देवताले का जन्म 7 नवंबर 1936 को जौलखेड़ा, जिला बैतूल, मध्य प्रदेश में हुआ। उनका बचपन और शुरुआती जीवन ग्रामीण परिवेश से जुड़ा रहा। बाद में उनकी शिक्षा इंदौर में हुई। उन्होंने होलकर कॉलेज से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की और सागर विश्वविद्यालय से प्रख्यात कवि गजानन माधव मुक्तिबोध पर शोध करके पीएचडी की। मुक्तिबोध की कविता और वैचारिक दृष्टि का अध्ययन उनके आलोचनात्मक विवेक के निर्माण में महत्वपूर्ण रहा, हालांकि देवताले की अपनी काव्य-भाषा और संवेदना ने अलग पहचान बनाई।
उन्होंने मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग में अध्यापन किया और लंबे समय तक महाविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई। अध्यापन के साथ उनका साहित्यिक लेखन लगातार जारी रहा। उनकी पहली कविता 1950 के दशक में प्रकाशित हुई और 1960 के दशक से वे साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से पहचाने जाने लगे।

नई कविता में अलग पहचान
देवताले का पहला कविता-संग्रह ‘हड्डियों में छिपा ज्वर’ 1973 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह ने हिंदी कविता में उनकी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराई। इसके बाद ‘दीवारों पर खून से’ (1975), ‘लकड़बग्घा हँस रहा है’ (1980), ‘रोशनी के मैदान की तरफ’ (1982), ‘भूखंड तप रहा है’ (1982) और ‘आग हर चीज़ में बताई गई थी’ (1987) जैसी पुस्तकों ने उनके रचनात्मक संसार को विस्तार दिया। आगे चलकर ‘बदला बेहद महँगा सौदा’, ‘पत्थर की बैंच’, ‘इतनी पत्थर रोशनी’, ‘उजाड़ में संग्रहालय’, ‘जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा’ और ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ जैसे संग्रह प्रकाशित हुए।
उनकी कविता का संसार किसी एक विचार या विषय तक सीमित नहीं था। वे जीवन की छोटी और साधारण लगने वाली घटनाओं में भी बड़े सामाजिक अर्थ खोजते थे। घर, परिवार, श्रम, भूख, भय, हिंसा, प्रेम, स्मृति और उम्मीद उनकी कविता में बार-बार लौटते हैं। उनकी भाषा में बोलचाल की सहजता, बिंबों की तीव्रता और व्यंग्य की धार मिलती है। वे अनुभव को सजावटी शब्दों में ढकने के बजाय उसकी असुविधाजनक सच्चाई पाठक के सामने रखते थे।
स्त्री, वंचित और आदिवासी जीवन की आवाज
देवताले की कविता का एक उल्लेखनीय पक्ष स्त्री जीवन की गहरी समझ है। उन्होंने स्त्री को केवल पारिवारिक संबंधों या भावुक प्रतीक के रूप में नहीं देखा, बल्कि श्रम करती, संघर्ष करती, अपने अकेलेपन और स्वतंत्रता से जूझती हुई संपूर्ण मनुष्य के रूप में चित्रित किया। घरेलू काम, सामाजिक अपेक्षाएँ, हिंसा और स्त्री की आत्मनिर्णय की आकांक्षा उनकी कविताओं में संवेदनशीलता के साथ आती है।
उनकी रचनाओं में दलितों, आदिवासियों, गरीबों और अन्य वंचित समुदायों का जीवन भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ग्रामीण समाज और हाशिये के लोगों के अनुभवों से उनका निकट संबंध उनकी कविता को सामाजिक यथार्थ से जोड़ता है। वे शोषण को केवल अमूर्त राजनीतिक शब्दावली में नहीं रखते; उसके मानवीय परिणामों—भूख, अपमान, असुरक्षा और असमान अवसरों—को दृश्य बनाते हैं। इसी कारण उनकी कविता में प्रतिरोध के साथ करुणा और मानवीय गरिमा की आकांक्षा भी मौजूद रहती है।

‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ और साहित्य अकादेमी सम्मान
चंद्रकांत देवताले को उनके कविता-संग्रह ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ के लिए वर्ष 2012 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रदान किया गया। यह संग्रह उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के उस पक्ष को सामने लाता है जिसमें कविता अन्याय और जड़ता के विरुद्ध सवाल उठाने का माध्यम बनती है। शीर्षक में मौजूद ‘पत्थर’ को केवल आक्रोश का प्रतीक मानना पर्याप्त नहीं; यह उस निष्क्रियता को तोड़ने की बेचैनी का संकेत भी है जो समाज को अन्याय के प्रति संवेदनहीन बना देती है।
साहित्य अकादेमी सम्मान ने उनके लंबे साहित्यिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी। उन्हें इससे पहले भी कई साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित किया गया था, जिनमें मुक्तिबोध फेलोशिप, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान और अन्य साहित्यिक पुरस्कार शामिल हैं। वे साहित्यिक संस्थाओं और पत्र-पत्रिकाओं से भी जुड़े रहे।
कवि के साथ आलोचक और अनुवादक
देवताले का योगदान केवल कविता-संग्रहों तक सीमित नहीं था। उन्होंने ‘मुक्तिबोध: कविता और जीवन विवेक’ जैसी आलोचनात्मक पुस्तक लिखी, जिसमें मुक्तिबोध की रचना-दृष्टि और जीवन-विवेक पर विचार किया। उन्होंने साहित्यिक संकलनों का संपादन भी किया। मराठी साहित्य से उनका गहरा संबंध था और उन्होंने दिलीप चित्रे की कविताओं का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया। उनकी रुचि भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक संवाद को बढ़ाने में भी थी।
उनका लेखन हिंदी की सीमाओं में बंद नहीं रहा। उनकी कविताओं के अनुवाद विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में प्रकाशित हुए। इससे उनके काव्य-संसार की सामाजिक संवेदना और प्रतिरोध की आवाज व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँची।

निधन और साहित्यिक विरासत
चंद्रकांत देवताले का निधन 14 अगस्त 2017 को इंदौर में हुआ। उनके जाने से हिंदी कविता ने ऐसा कवि खोया जिसकी रचनाओं में अपने समय के सामाजिक तनावों को दर्ज करने का साहस था। वे कविता को केवल सौंदर्य या निजी भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं मानते थे; उनके लिए कविता मनुष्य और समाज के बीच आलोचनात्मक संवाद का माध्यम भी थी।
आज जब असमानता, सामाजिक विभाजन, हिंसा, पर्यावरणीय संकट और हाशिये के समुदायों के सवाल सार्वजनिक जीवन में लगातार उपस्थित हैं, देवताले की कविताएँ नए अर्थों में पढ़ी जा सकती हैं। उनकी रचनाएँ पाठक को यह देखने के लिए प्रेरित करती हैं कि किसी समाज की वास्तविक स्थिति का आकलन उसके सबसे कमजोर और उपेक्षित लोगों के जीवन से भी किया जाना चाहिए।
7 नवंबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस काव्य-दृष्टि को फिर से समझना है जो मनुष्य की गरिमा, न्याय और प्रतिरोध के पक्ष में खड़ी रही। चंद्रकांत देवताले की कविता इसी अर्थ में हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर है।
