विशेष लेख | 7 नवंबर | आज का इतिहास | विश्व राजनीति एवं महिला अधिकार
अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास में 7 नवंबर 1916 एक ऐसी तारीख है, जिसने राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का नया अध्याय खोला। मोंटाना की जेनेट पिकरिंग रैंकिन (Jeannette Pickering Rankin) अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी जाने वाली पहली महिला बनीं। यह उपलब्धि इसलिए भी ऐतिहासिक थी, क्योंकि उस समय अमेरिका में महिलाओं को मतदान का समान राष्ट्रीय संवैधानिक अधिकार अभी नहीं मिला था। रैंकिन ने न केवल कांग्रेस तक पहुँचने की बाधा तोड़ी, बल्कि अपने स्वतंत्र विचारों, महिला मताधिकार के समर्थन और युद्ध-विरोधी रुख से अमेरिकी राजनीति में अलग पहचान बनाई।
7 नवंबर 1916: चुनावी प्रमाणपत्र में दर्ज ऐतिहासिक तारीख
अमेरिकी राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives) में सुरक्षित रैंकिन के चुनाव प्रमाणपत्र के अनुसार, उन्हें 7 नवंबर 1916 को मोंटाना से प्रतिनिधि सभा के लिए निर्वाचित घोषित किया गया था। वह मोंटाना की दो At-Large सीटों में से एक पर रिपब्लिकन उम्मीदवार के रूप में विजयी हुईं। इस चुनाव के बारे में कुछ अमेरिकी संसदीय संदर्भों में 9 नवंबर की तारीख भी दी गई है; इसलिए ऐतिहासिक अभिलेखों में तारीख का यह अंतर ध्यान देने योग्य है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का इतिहास विभाग उन्हें नवंबर 1916 में निर्वाचित पहली महिला सांसद के रूप में दर्ज करता है।
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“मैं कांग्रेस की पहली महिला सदस्य हो सकती हूँ, लेकिन आखिरी नहीं होऊँगी।” — जेनेट रैंकिन से जुड़ा ऐतिहासिक कथन
कौन थीं जेनेट रैंकिन?
जेनेट रैंकिन का जन्म 11 जून 1880 को मोंटाना के मिसौला के निकट हुआ था। उनका परिवार खेती और निर्माण कार्य से जुड़ा था। उन्होंने 1902 में मोंटाना विश्वविद्यालय से जीवविज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद सामाजिक कार्य में रुचि के कारण उन्होंने न्यूयॉर्क के School of Philanthropy में अध्ययन किया और 1909 में अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने वॉशिंगटन राज्य में सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम किया और बच्चों तथा जरूरतमंद परिवारों की समस्याओं को करीब से समझा।
सामाजिक कार्य के दौरान रैंकिन का ध्यान महिलाओं के अधिकारों और मतदान के अधिकार की ओर गया। उन्होंने वॉशिंगटन, कैलिफोर्निया और अपने गृह राज्य मोंटाना में महिला मताधिकार के लिए अभियान चलाया। 1911 में वह मोंटाना की विधायिका को संबोधित करने वाली पहली महिला बनीं और महिला मताधिकार के पक्ष में आवाज उठाई। उनके संगठनात्मक प्रयासों और अन्य कार्यकर्ताओं के संघर्ष के बाद 1914 में मोंटाना की महिलाओं को राज्य स्तर पर मतदान का अधिकार मिला।
महिला मताधिकार आंदोलन से अमेरिकी कांग्रेस तक
1916 में रैंकिन ने मोंटाना की दो प्रतिनिधि सभा सीटों में से एक के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया। उनका अभियान महिला मताधिकार, बाल कल्याण, सामाजिक सुधार और श्रमिकों की स्थिति जैसे मुद्दों पर केंद्रित था। उन्होंने बड़े राजनीतिक मंचों के साथ-साथ छोटे समूहों और व्यक्तिगत मुलाकातों के जरिए मतदाताओं से संवाद किया। मोंटाना में महिलाओं को पहले से मतदान का अधिकार मिल चुका था, जिससे महिला मतदाताओं की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण बनी।
चुनाव परिणाम तत्काल स्पष्ट नहीं हुए। मोंटाना का विशाल भौगोलिक क्षेत्र और कम आबादी के कारण मतगणना की खबरें कई दिनों तक आती रहीं। अंततः रैंकिन की जीत ने उन्हें अमेरिकी इतिहास में संघीय कांग्रेस के लिए चुनी जाने वाली पहली महिला बना दिया। वह 65वीं कांग्रेस के लिए निर्वाचित हुईं, जिसका कार्यकाल 1917 से 1919 तक था।

कांग्रेस में पहला कदम और महिला अधिकारों की पैरवी
रैंकिन ने 2 अप्रैल 1917 को प्रतिनिधि सभा में शपथ ली। उस समय अमेरिकी कांग्रेस में वह अकेली महिला थीं। उनके पहले दिन को महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व के इतिहास में एक प्रतीकात्मक क्षण माना जाता है। सदन में प्रवेश के बाद उन्होंने महिलाओं को संवैधानिक मतदान अधिकार देने वाले Susan B. Anthony Amendment के समर्थन में विधेयक पेश किया। उन्होंने यह तर्क रखा कि लोकतंत्र का दावा तभी पूरा हो सकता है, जब महिलाओं को भी राजनीतिक अधिकारों में बराबरी मिले।
उनकी संसदीय भूमिका केवल महिला मताधिकार तक सीमित नहीं रही। उन्होंने कामकाजी महिलाओं की स्थिति, श्रमिक सुरक्षा, बाल कल्याण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर भी काम किया। वॉशिंगटन स्थित Bureau of Engraving and Printing में महिला कर्मचारियों की लंबी कार्य-अवधि और खराब परिस्थितियों पर उन्होंने जांच कराई। उनके हस्तक्षेप के बाद वहां आठ घंटे के कार्यदिवस की व्यवस्था लागू करने की दिशा में कार्रवाई हुई।
पहला विश्वयुद्ध: सिद्धांतों के साथ खड़ी सांसद
रैंकिन जीवनभर शांतिवादी रहीं। अप्रैल 1917 में जब अमेरिकी कांग्रेस ने प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में शामिल होने के प्रस्ताव पर मतदान किया, तब रैंकिन ने इसके खिलाफ वोट दिया। प्रतिनिधि सभा में युद्ध प्रस्ताव 373 मतों से पारित हुआ, जबकि 50 सदस्य इसके विरोध में थे। रैंकिन का विरोध उनके राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित निर्णय बना। उनके रुख की आलोचना भी हुई और महिला अधिकार आंदोलन के कुछ साथियों को आशंका थी कि इससे मताधिकार अभियान पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
1918 में उन्होंने प्रतिनिधि सभा के लिए दोबारा चुनाव लड़ने के बजाय अमेरिकी सीनेट का चुनाव लड़ने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद भी उन्होंने सामाजिक कल्याण, शांति और महिला अधिकारों के लिए अभियान जारी रखा। 1921 में पारित Sheppard–Towner Act जैसे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संबंधी कानून के समर्थन में उनकी पैरवी उल्लेखनीय रही।

1940 में वापसी और द्वितीय विश्वयुद्ध पर ऐतिहासिक वोट
1940 में रैंकिन एक बार फिर मोंटाना से प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी गईं और 1941 से 1943 तक दूसरी बार सांसद रहीं। इस बार कांग्रेस में अन्य महिला सदस्य भी थीं। लेकिन दिसंबर 1941 में जापान के पर्ल हार्बर पर हमले के बाद अमेरिका के युद्ध में प्रवेश का सवाल उठा, तो रैंकिन ने फिर अपने शांतिवादी सिद्धांतों के अनुसार मतदान किया। 8 दिसंबर 1941 को जापान के खिलाफ युद्ध घोषणा के प्रस्ताव पर उन्होंने अकेले विरोध में वोट दिया। प्रतिनिधि सभा में प्रस्ताव 388 मतों से पारित हुआ और रैंकिन का वोट एकमात्र ‘नहीं’ था। बाद में जर्मनी और इटली के खिलाफ युद्ध प्रस्ताव पर उन्होंने मतदान से परहेज किया।
इस प्रकार रैंकिन अमेरिकी कांग्रेस की ऐसी एकमात्र सदस्य बनीं जिन्होंने दोनों विश्वयुद्धों में अमेरिका की भागीदारी के खिलाफ मतदान किया—पहले विश्वयुद्ध में विरोधी मतों में शामिल होकर और दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के खिलाफ युद्ध घोषणा के विरुद्ध अकेले वोट देकर।
अमेरिका में महिलाओं के मताधिकार का व्यापक संदर्भ
रैंकिन का 1916 में निर्वाचित होना उस दौर में हुआ, जब अमेरिका के कई पश्चिमी राज्यों में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिल चुका था, लेकिन पूरे देश में महिलाओं के मताधिकार की संवैधानिक गारंटी नहीं थी। अमेरिकी संविधान का 19वाँ संशोधन 1920 में अनुमोदित हुआ और इसने लिंग के आधार पर मतदान का अधिकार नकारने पर रोक लगाई। इसलिए रैंकिन की जीत राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के संवैधानिक मताधिकार से चार वर्ष पहले हुई राजनीतिक उपलब्धि थी। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अश्वेत महिलाओं और अन्य वंचित समूहों को मतदान के अधिकार का वास्तविक उपयोग करने में इसके बाद भी लंबे समय तक भेदभाव और कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ा।
शांति और समानता की विरासत
कांग्रेस से बाहर आने के बाद रैंकिन ने शांति और महिला अधिकारों के पक्ष में काम जारी रखा। वह Women’s International League for Peace and Freedom तथा अन्य शांति संगठनों से जुड़ी रहीं। वियतनाम युद्ध के दौर में जनवरी 1968 में उन्होंने Jeannette Rankin Brigade के नेतृत्व में वॉशिंगटन में युद्ध-विरोधी प्रदर्शन किया। 1972 में National Organization for Women ने उन्हें “World’s outstanding living feminist” के रूप में सम्मानित किया। 18 मई 1973 को कैलिफोर्निया के कार्मेल में उनका निधन हुआ।

ऐतिहासिक महत्त्व: एक चुनाव से आगे की कहानी
जेनेट रैंकिन की 1916 की जीत केवल किसी महिला उम्मीदवार की चुनावी सफलता नहीं थी। इसने अमेरिकी राजनीति में महिलाओं की प्रतिनिधित्व क्षमता को प्रत्यक्ष रूप से स्थापित किया। उन्होंने दिखाया कि निर्वाचित प्रतिनिधि की भूमिका केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि नीतिगत बहस, विधायी पहल और अपने विवेक के आधार पर कठिन निर्णय लेना भी है। महिला मताधिकार, श्रमिक अधिकार, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और युद्ध-विरोधी राजनीति के प्रश्नों पर उनका काम आज भी लोकतंत्र, समानता और राजनीतिक नैतिकता की बहसों में प्रासंगिक है।
7 नवंबर 1916 से जुड़ी उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि ने अमेरिकी कांग्रेस के दरवाजे महिलाओं के लिए खोले। रैंकिन का कथन—“मैं पहली हो सकती हूँ, आखिरी नहीं”—आने वाली पीढ़ियों की महिला सांसदों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रेरक संदेश बन गया।
