विशेष लेख | 7 नवंबर | इतिहास विशेष | श्रमिक आंदोलन एवं सामाजिक न्याय
भारत के श्रमिक आंदोलन के इतिहास में 7 नवंबर 1938 की बंबई (अब मुंबई) की एकदिवसीय हड़ताल महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह आंदोलन तत्कालीन बंबई प्रेसीडेंसी की सरकार द्वारा लाए गए औद्योगिक विवाद विधेयक के विरोध में आयोजित किया गया था। डॉ. भीमराव आंबेडकर, उनकी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (Independent Labour Party—ILP), विभिन्न ट्रेड यूनियनों और अन्य श्रमिक नेताओं ने इस विरोध को व्यापक जन-आंदोलन का रूप देने में भूमिका निभाई। इस संघर्ष का केंद्रीय प्रश्न था—क्या मजदूरों को अपनी मांगों और काम की शर्तों के लिए सामूहिक रूप से काम रोकने और हड़ताल करने का अधिकार होना चाहिए?
1930 के दशक की बंबई: मिलें, मजदूर और औद्योगिक तनाव
1930 के दशक में बंबई भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में था। कपड़ा मिलों, बंदरगाहों, रेलवे और अन्य उद्योगों में बड़ी संख्या में श्रमिक काम करते थे। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों से आए प्रवासी मजदूरों के साथ दलित और वंचित समुदायों के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल थे। लंबे काम के घंटे, कम मजदूरी, असुरक्षित परिस्थितियां और नौकरी की अनिश्चितता श्रमिक जीवन की बड़ी चुनौतियां थीं। मजदूर संगठनों के बीच भी प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर मतभेद मौजूद थे।
डॉ. आंबेडकर ने श्रमिक प्रश्न को केवल वेतन या काम के घंटे तक सीमित नहीं रखा। उनके लिए जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता, आर्थिक शोषण और श्रमिकों की राजनीतिक आवाज परस्पर जुड़े मुद्दे थे। 15 अगस्त 1936 को स्थापित इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने खेतिहर मजदूरों, औद्योगिक श्रमिकों, गरीब किसानों और वंचित वर्गों के हितों को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया। इसने वर्गीय शोषण के साथ जातिगत अन्याय के विरुद्ध भी संघर्ष किया।

औद्योगिक विवाद विधेयक क्या था?
बंबई की कांग्रेस सरकार ने 2 सितंबर 1938 को बंबई विधानमंडल में Trade Disputes Bill, जिसे समकालीन बहस में Industrial Disputes Bill भी कहा गया, पेश किया। विधेयक का घोषित उद्देश्य औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए सुलह और मध्यस्थता की व्यवस्था बनाना था। लेकिन इसके प्रावधानों में अनिवार्य सुलह प्रक्रिया, हड़ताल पर कुछ परिस्थितियों में प्रतिबंध और कथित अवैध हड़ताल में शामिल होने या उसे प्रोत्साहित करने पर दंड का प्रावधान था।
डॉ. आंबेडकर ने 15 सितंबर 1938 को बंबई विधानमंडल में विधेयक के प्रथम वाचन के दौरान इसका विस्तार से विरोध किया। उनका तर्क था कि प्रस्तावित व्यवस्था श्रमिकों को लंबे समय तक सुलह प्रक्रिया में बांध सकती है और उनके सामूहिक दबाव बनाने के अधिकार को प्रभावहीन कर सकती है। विधेयक में कुछ परिस्थितियों में हड़ताल करने वाले कर्मचारी को छह महीने तक कारावास या जुर्माने का सामना करना पड़ सकता था। आंबेडकर ने यह भी सवाल उठाया कि जब नियोक्ता और श्रमिक आर्थिक शक्ति तथा संगठन के मामले में बराबर नहीं हैं, तो कानून उन्हें समान स्थिति में मानकर कैसे न्याय कर सकता है?
विधानमंडल में आंबेडकर का ऐतिहासिक तर्क
आंबेडकर ने अपने भाषण में हड़ताल को केवल अनुबंध तोड़ने की घटना नहीं माना। उन्होंने इसे श्रमिक की स्वतंत्रता और अपनी सेवाएं किन शर्तों पर देनी हैं, यह तय करने की क्षमता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि हड़ताल के अधिकार को दंडित करना श्रमिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए बाध्य करने जैसा हो सकता है। उनके शब्दों में, “the right to strike is simply another name for the right to freedom”—अर्थात हड़ताल का अधिकार स्वतंत्रता के अधिकार का ही एक रूप है।
उन्होंने विधेयक को “The Workers’ Civil Liberties Suspension Act” यानी “श्रमिकों की नागरिक स्वतंत्रताओं को निलंबित करने वाला कानून” कहकर आलोचना की। उनका तर्क था कि प्रस्तावित सुलह प्रक्रिया इतनी लंबी और प्रतिबंधात्मक हो सकती है कि मजदूर अपनी शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी सामूहिक कार्रवाई करने की स्थिति में ही न रहें। उन्होंने ट्रेड यूनियनों की स्वतंत्रता और श्रमिकों के वास्तविक प्रतिनिधित्व पर भी प्रश्न उठाए।

यह भाषण डॉ. आंबेडकर के श्रम-विचार का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह उनके सरकारी संकलन Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, Volume 2 में शामिल है, जिसे भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन ने प्रकाशित किया है।
हड़ताल की तैयारी और श्रमिक एकजुटता
विधेयक के विरोध में ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों ने संयुक्त लामबंदी शुरू की। इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के साथ कम्युनिस्ट संगठनों और अन्य श्रमिक नेताओं ने भी विरोध में भाग लिया। 16 अक्टूबर 1938 को परेल के कामगार मैदान में यूनाइटेड फ्रंट की एक बड़ी श्रमिक सभा हुई, जहां 7 नवंबर को एकदिवसीय हड़ताल का आह्वान किया गया। सभा में हजारों मजदूर जुटे और अलग-अलग औद्योगिक इलाकों में प्रचार अभियान चलाया गया।
मिलों के फाटकों, रेलवे स्टेशनों, मजदूर बस्तियों और औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों से हड़ताल में शामिल होने की अपील की गई। इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने स्थानीय समूहों और सांस्कृतिक मंडलियों के माध्यम से भी संपर्क बनाया। 6 नवंबर की शाम कामगार मैदान में एक और विशाल सभा हुई। विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों में इस सभा में शामिल लोगों की संख्या अलग-अलग बताई गई है; कुछ अकादमिक विवरण इसे लगभग एक लाख तक बताते हैं।
7 नवंबर 1938: बंबई में एकदिवसीय हड़ताल
7 नवंबर 1938 को बंबई के औद्योगिक इलाकों में श्रमिकों ने एकदिवसीय हड़ताल की। डॉ. आंबेडकर और अन्य श्रमिक नेता मजदूर क्षेत्रों में पहुंचे और लोगों से आंदोलन में भाग लेने की अपील की। इस कार्रवाई में कपड़ा मिलों के मजदूरों के साथ नगर सेवाओं, दुकानों और छोटे कारोबारों से जुड़े कुछ श्रमिकों की भागीदारी भी दर्ज की गई। हड़ताल का प्रभाव मुख्य रूप से बंबई के औद्योगिक और कपड़ा मिल क्षेत्रों में दिखाई दिया।

हड़ताल के पैमाने और उसके परिणामों के बारे में समकालीन सरकारी प्रशासनिक रिपोर्टों और बाद के अकादमिक अध्ययनों में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कुछ रिपोर्टों में अनेक मिलों के खुले रहने और कई स्थानों पर झड़पों का उल्लेख है, जबकि श्रमिक आंदोलन पर केंद्रित अध्ययनों में बड़े पैमाने पर भागीदारी तथा पुलिस कार्रवाई में हताहतों का विवरण मिलता है। इसलिए इस दिन को न तो हर उद्योग के पूर्ण बंद होने के रूप में बताना उचित है और न ही घटनाओं को एक ही पक्ष के विवरण से समझना। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार, आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी और हिंसा में लोगों की मृत्यु तथा अनेक श्रमिकों के घायल होने की घटनाएं भी हुईं।
विधेयक का पारित होना और आंदोलन का राजनीतिक महत्व
इस विरोध के बावजूद विधेयक 5 नवंबर 1938 को बंबई विधानमंडल से पारित हो गया था। इसलिए 7 नवंबर की हड़ताल को विधेयक पारित होने से पहले उसे रोकने के लिए हुई कार्रवाई के बजाय, उसके पारित होने के विरोध और श्रमिक अधिकारों की रक्षा के लिए आयोजित एकदिवसीय प्रतिरोध के रूप में समझना अधिक सटीक है। इस घटनाक्रम ने श्रमिक संगठनों और सरकार के बीच तनाव को उजागर किया।
हड़ताल ने डॉ. आंबेडकर की छवि को केवल दलित अधिकारों के नेता तक सीमित न रखकर एक प्रभावशाली श्रमिक नेता के रूप में भी व्यापक पहचान दी। उन्होंने जाति और वर्ग के प्रश्नों को अलग-अलग खांचों में देखने से इनकार किया। उनका मानना था कि श्रमिक वर्ग के भीतर जातिगत भेदभाव बना रहेगा तो वास्तविक एकता और समान अधिकारों की लड़ाई कमजोर होगी। इसीलिए उनका श्रमिक आंदोलन सामाजिक लोकतंत्र और आर्थिक न्याय की व्यापक दृष्टि से जुड़ा था।
श्रमिक अधिकारों की बहस में इस घटना की विरासत
7 नवंबर 1938 की हड़ताल आज भी कई कारणों से याद किए जाने योग्य है। पहला, इसने औद्योगिक कानून और श्रमिकों के सामूहिक अधिकारों के बीच तनाव को सार्वजनिक बहस का विषय बनाया। दूसरा, इसने विभिन्न राजनीतिक धाराओं और ट्रेड यूनियनों के बीच साझा मुद्दे पर सहयोग की संभावना दिखाई। तीसरा, इसने यह रेखांकित किया कि श्रमिक अधिकारों की चर्चा में जाति, वर्ग, प्रतिनिधित्व और आर्थिक शक्ति के असमान संबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

डॉ. आंबेडकर का तर्क था कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रह सकता; उसे कार्यस्थल और आर्थिक जीवन में भी स्वतंत्रता तथा समानता सुनिश्चित करनी चाहिए। श्रमिक को अपनी आवाज उठाने, संगठन बनाने और बेहतर कामकाजी शर्तों के लिए सामूहिक रूप से बातचीत करने का अवसर मिलना चाहिए। हड़ताल के अधिकार पर उनकी बहस इसी व्यापक लोकतांत्रिक दृष्टि का हिस्सा थी।
इतिहास में 7 नवंबर का महत्व
आज जब श्रम कानून, ट्रेड यूनियन की भूमिका, औद्योगिक विवादों का समाधान और कामगारों की सामाजिक सुरक्षा पर चर्चा होती है, तब 1938 की बंबई हड़ताल का स्मरण उपयोगी है। यह घटना बताती है कि श्रमिक अधिकार केवल आर्थिक मांगों का विषय नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, संगठन की आजादी और लोकतांत्रिक भागीदारी से भी जुड़े हैं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व और विभिन्न श्रमिक संगठनों की भागीदारी से जुड़ी यह हड़ताल भारतीय श्रम इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी। 7 नवंबर 1938 का यह संघर्ष याद दिलाता है कि न्यायपूर्ण समाज का निर्माण तभी संभव है जब श्रम करने वाले लोगों को सम्मान, सुरक्षा और अपनी सामूहिक आवाज उठाने का वास्तविक अधिकार मिले।
