विज्ञान के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने एक विषय की सीमाओं से आगे बढ़कर कई क्षेत्रों को नई दिशा दी। जॉन बर्डन सैंडरसन हाल्डेन (John Burdon Sanderson Haldane), जिन्हें दुनिया जे. बी. एस. हाल्डेन या संक्षेप में ‘जेबीएस’ के नाम से जानती है, ऐसे ही बहुआयामी वैज्ञानिक थे। वे आनुवंशिकीविद्, विकासवादी जीवविज्ञानी, शरीरक्रियाविज्ञानी, जैव-रसायनशास्त्री और गणितीय जीवविज्ञान के अग्रणी अध्येता थे। आधुनिक जनसंख्या आनुवंशिकी की नींव रखने वाले प्रमुख वैज्ञानिकों में उनका नाम रोनाल्ड फिशर और सीवल राइट के साथ लिया जाता है।
हाल्डेन का जन्म 5 नवंबर 1892 को इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड में हुआ था। वे ब्रिटिश मूल के थे, लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में भारत को अपना घर बनाया। वर्ष 1957 में भारत आने के बाद उन्होंने यहां वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशिक्षण में योगदान दिया तथा 1961 में भारतीय नागरिकता ग्रहण की। इसलिए उनकी जयंती भारत के वैज्ञानिक इतिहास और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग की एक महत्वपूर्ण कहानी को याद करने का अवसर भी है।
वैज्ञानिक परिवार में बचपन और शिक्षा
हाल्डेन के पिता जॉन स्कॉट हाल्डेन ऑक्सफोर्ड के प्रसिद्ध शरीरक्रिया विज्ञानी थे। घर का वातावरण प्रयोगों, वैज्ञानिक चर्चाओं और जिज्ञासा से भरा रहता था। बचपन से ही जेबीएस को अपने पिता के प्रयोगों को देखने और उनमें सहायता करने का अवसर मिला। शरीर में ऑक्सीजन, रक्त और श्वसन से जुड़े वैज्ञानिक शब्दों से उनका परिचय बहुत कम उम्र में हो गया था। गणित और विज्ञान में उनकी असाधारण रुचि के साथ साहित्य तथा शास्त्रीय भाषाओं में भी गहरी दिलचस्पी थी।
उन्होंने ईटन कॉलेज और ऑक्सफोर्ड में शिक्षा प्राप्त की। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सेना में सेवा की और युद्ध के अनुभवों का उनके जीवन तथा विचारों पर गहरा प्रभाव पड़ा। युद्ध के बाद वे अकादमिक अनुसंधान की ओर लौटे। औपचारिक शिक्षा में उनका विषय शास्त्रीय अध्ययन रहा, लेकिन पिता से मिली वैज्ञानिक प्रेरणा, गणितीय क्षमता और स्वतंत्र अध्ययन ने उन्हें जीवविज्ञान के सबसे प्रभावशाली विचारकों में स्थान दिलाया।

आधुनिक जनसंख्या आनुवंशिकी की नींव
हाल्डेन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह समझाने में था कि प्राकृतिक चयन और मेंडल के आनुवंशिक नियमों को गणितीय रूप में किस तरह जोड़ा जा सकता है। चार्ल्स डार्विन ने प्राकृतिक चयन के जरिए विकासवाद की व्याख्या की थी, जबकि ग्रेगर मेंडल के कार्य ने वंशागति के नियमों को स्पष्ट किया। हाल्डेन ने गणितीय मॉडल और सांख्यिकीय विश्लेषण के माध्यम से यह समझने में मदद की कि किसी आबादी में जीनों की आवृत्ति पीढ़ी-दर-पीढ़ी कैसे बदल सकती है।
रोनाल्ड ए. फिशर और सीवल राइट के स्वतंत्र योगदान के साथ हाल्डेन के शोध ने आधुनिक जनसंख्या आनुवंशिकी (Population Genetics) के विकास का आधार तैयार किया। यह क्षेत्र अध्ययन करता है कि प्राकृतिक चयन, उत्परिवर्तन (Mutation), आनुवंशिक बहाव (Genetic Drift), प्रवास और प्रजनन जैसे कारक किसी आबादी की आनुवंशिक संरचना को कैसे प्रभावित करते हैं। आज विकासवादी जीवविज्ञान, जैव-विविधता संरक्षण, कृषि प्रजनन, रोगों के आनुवंशिक अध्ययन और मानव आबादी के इतिहास को समझने में जनसंख्या आनुवंशिकी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
उनकी 1932 में प्रकाशित पुस्तक ‘द कॉजेज ऑफ इवोल्यूशन’ (The Causes of Evolution) ने उनके शुरुआती गणितीय और विकासवादी शोध को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने प्राकृतिक चयन की गति, उत्परिवर्तन दर, जीन-संबंध (Genetic Linkage), मानव जीन मानचित्रण और किसी आबादी पर हानिकारक आनुवंशिक परिवर्तनों के प्रभाव जैसे विषयों पर भी महत्वपूर्ण काम किया।
जीवविज्ञान, जैव-रसायन और शरीरक्रिया विज्ञान में योगदान
हाल्डेन की प्रतिभा केवल आनुवंशिकी तक सीमित नहीं थी। जैव-रसायन के क्षेत्र में उन्होंने एंजाइमों की क्रिया और रासायनिक अभिक्रियाओं की गति को समझने में योगदान दिया। स्थिर-अवस्था एंजाइम गतिकी (Steady-State Enzyme Kinetics) से संबंधित उनका कार्य आगे चलकर जैव-रसायन के अध्ययन में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। उनके शोध ने जीवित प्रणालियों में होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं को गणितीय और प्रयोगात्मक दृष्टि से समझने का रास्ता मजबूत किया।

शरीरक्रिया विज्ञान में भी उनका काम उल्लेखनीय था। गैसों, दबाव, तापमान और गोताखोरी से जुड़े प्रयोगों में उन्होंने कई बार स्वयं को परीक्षण का विषय बनाया। प्रथम विश्वयुद्ध और नौसेना से संबंधित परिस्थितियों में श्वसन तथा दबाव के प्रभावों को समझने के लिए किए गए उनके प्रयोग जोखिमपूर्ण थे। इनसे उन्हें शारीरिक चोटें भी पहुंचीं। वैज्ञानिक जिज्ञासा और प्रयोगों के प्रति उनका साहस असाधारण था, हालांकि आज के शोध मानकों के अनुसार ऐसे प्रयोगों में कठोर नैतिक और सुरक्षा प्रक्रियाएं अनिवार्य मानी जाती हैं।
1957 में भारत आगमन: भारतीय विज्ञान से जुड़ाव
1950 के दशक में ब्रिटेन की राजनीतिक परिस्थितियों और अपने वैचारिक असंतोष के बीच हाल्डेन ने भारत आने का निर्णय लिया। भारत की स्वतंत्रता के बाद विज्ञान और तकनीक के माध्यम से आधुनिक राष्ट्र निर्माण की कोशिशों ने उन्हें आकर्षित किया। भारत की जैव-विविधता, पौधों और जीव-जंतुओं की विविध प्रजातियों तथा मानव आबादियों में आनुवंशिक विविधता का अध्ययन भी उनके लिए महत्वपूर्ण शोध अवसर था।
प्रसिद्ध भारतीय सांख्यिकीविद् प्रोफेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस के आमंत्रण पर हाल्डेन 1957 में कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (Indian Statistical Institute—ISI) में रिसर्च प्रोफेसर के रूप में शामिल हुए। उनकी पत्नी और वैज्ञानिक सहयोगी हेलेन स्परवे भी भारत आईं। हाल्डेन ने यहां 1957 से 1961 तक काम किया। इस अवधि में उन्होंने अपने सहयोगियों और शोधार्थियों के साथ आनुवंशिकी, जैवमिति, मानव आनुवंशिकी तथा पारिस्थितिकी से जुड़े अध्ययन को प्रोत्साहित किया।
उनका दृष्टिकोण यह था कि महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान हमेशा महंगे उपकरणों और विशाल प्रयोगशालाओं पर निर्भर नहीं होता। स्थानीय जैविक संसाधनों, व्यवस्थित अवलोकन, गणितीय विश्लेषण और वैज्ञानिक प्रशिक्षण के सहारे भी उपयोगी शोध किया जा सकता है। भारत में उनके कार्य ने जैविक समस्याओं के मात्रात्मक अध्ययन और मानव आनुवंशिकी को अधिक प्रोत्साहन देने में मदद की।

कोलकाता से भुवनेश्वर तक: अंतिम वर्षों का शोध
भारतीय सांख्यिकी संस्थान में निदेशक पी. सी. महालनोबिस के साथ प्रशासनिक और वैचारिक मतभेदों के बाद हाल्डेन ने 1961 के आसपास संस्थान छोड़ दिया। इसके बाद वे कुछ समय दिल्ली में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) से जुड़े और फिर ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर चले गए। वहां उन्होंने आनुवंशिकी और जैवमिति प्रयोगशाला (Genetics and Biometry Laboratory) स्थापित करने का काम शुरू किया। ओडिशा में रहते हुए उन्होंने भारतीय जैव-विविधता और विकासवादी प्रक्रियाओं से संबंधित शोध को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
भारत में उनके अंतिम वर्षों में शोधार्थियों के साथ काम, वैज्ञानिक लेखन और व्याख्यान जारी रहे। वे विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने के पक्षधर थे और समाचार-पत्रों तथा लोकप्रिय पत्रिकाओं में विज्ञान पर लेख लिखते थे। उनके लेखों में जीवविज्ञान के साथ गणित, दर्शन, समाज और विज्ञान की नैतिक जिम्मेदारियों पर भी विचार मिलता है।
भारतीय नागरिकता और निधन
हाल्डेन ने 1961 में भारतीय नागरिकता ग्रहण की। यह निर्णय उनके भारत से जुड़ाव का महत्वपूर्ण प्रतीक था। वे केवल किसी संस्थान में काम करने आए विदेशी वैज्ञानिक नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भारत को अपना देश चुना और यहां के वैज्ञानिक समुदाय के साथ अपना अंतिम जीवन बिताया। उनका निधन 1 दिसंबर 1964 को भुवनेश्वर में कैंसर के उपचार के बाद हुआ। उनकी इच्छा के अनुरूप उनके शरीर को चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के लिए दान किया गया।
विज्ञान की दुनिया में हाल्डेन की विरासत
जे. बी. एस. हाल्डेन की विरासत कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्राकृतिक चयन और मेंडलियन आनुवंशिकी के बीच गणितीय संबंधों को स्पष्ट करने में योगदान दिया। उनके कार्य ने जनसंख्या आनुवंशिकी को एक व्यवस्थित वैज्ञानिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने में मदद की। एंजाइम गतिकी, मानव आनुवंशिकी, जैवमिति और शरीरक्रिया विज्ञान में उनका शोध आज भी विज्ञान के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

भारत के संदर्भ में उनका जीवन यह भी दिखाता है कि वैज्ञानिक ज्ञान राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर साझा किया जा सकता है। कोलकाता के भारतीय सांख्यिकी संस्थान से लेकर भुवनेश्वर में आनुवंशिकी और जैवमिति प्रयोगशाला की स्थापना के प्रयास तक, हाल्डेन ने भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान की संभावनाओं को मजबूत करने का काम किया। 5 नवंबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना आधुनिक जीवविज्ञान के विकास में उनके योगदान के साथ-साथ भारत को अपना घर चुनने वाले इस असाधारण वैज्ञानिक के बौद्धिक साहस और वैज्ञानिक प्रतिबद्धता को सम्मान देना है।
