Dinman Times
  • वीडियो
  • वेब स्टोरीज
Sign In
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Reading: डॉ. वंदना शिवा: विज्ञान से पर्यावरण आंदोलन तक, बीजों और जैव-विविधता की मुखर आवाज
साझा करें
Notification
Font ResizerAa
Dinman Times
  • वेब स्टोरीज
  • होम
  • देश
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Search
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Follow US
© 2026. All Rights Reserved.

Home - देश - डॉ. वंदना शिवा: विज्ञान से पर्यावरण आंदोलन तक, बीजों और जैव-विविधता की मुखर आवाज

डॉ. वंदना शिवा: विज्ञान से पर्यावरण आंदोलन तक, बीजों और जैव-विविधता की मुखर आवाज

प्रशांत कुमार
Last updated: नवम्बर 5, 2026 11:42 पूर्वाह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 38 मिनट पहले
डॉ. वंदना शिवा
साझा करें

पर्यावरण संरक्षण, जैव-विविधता, किसानों के अधिकार और महिलाओं की भूमिका पर वैश्विक बहस में भारत की जिन आवाजों ने अपनी अलग पहचान बनाई है, उनमें डॉ. वंदना शिवा का नाम प्रमुख है। वे पर्यावरण कार्यकर्ता, लेखिका, नारीवादी चिंतक और विज्ञान-दर्शन से जुड़ी सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं। उनका काम खेती, बीजों, खाद्य व्यवस्था और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंधों को सामाजिक न्याय के नजरिये से देखने पर जोर देता है। 5 नवंबर 1952 को देहरादून में जन्मी वंदना शिवा ने भौतिकी के अध्ययन से अपना अकादमिक सफर शुरू किया, लेकिन आगे चलकर पर्यावरण और विकास की नीतियों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली हस्तक्षेप किया।

उनकी पहचान केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं है। उन्होंने शोध संस्थान स्थापित किया, किसानों और स्थानीय समुदायों के साथ काम किया, बीज संरक्षण का अभियान चलाया और पर्यावरण तथा वैश्वीकरण के सवालों पर कई पुस्तकें लिखीं। उनके विचारों को दुनिया भर में समर्थन मिला है, वहीं कृषि जैव-प्रौद्योगिकी और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों पर उनके कुछ दावों को लेकर वैज्ञानिकों और टिप्पणीकारों के बीच बहस भी रही है। उनके जीवन को समझने के लिए इन दोनों पक्षों—योगदान और आलोचनात्मक विमर्श—को साथ देखना जरूरी है।

देहरादून में जन्म और प्रकृति से शुरुआती रिश्ता

वंदना शिवा का जन्म 5 नवंबर 1952 को देहरादून में हुआ। उनके पिता वन विभाग से जुड़े थे और मां किसान परिवार की पृष्ठभूमि से थीं। परिवार और हिमालयी परिवेश ने बचपन से ही प्रकृति, जंगल, मिट्टी और खेती के प्रति उनकी रुचि को आकार दिया। उन्होंने नैनीताल के सेंट मैरी स्कूल और देहरादून के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी में शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही विज्ञान में उनकी दिलचस्पी थी और उन्होंने वैज्ञानिक बनने का लक्ष्य रखा।

उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से भौतिकी की पढ़ाई की। इसके बाद कनाडा के यूनिवर्सिटी ऑफ गेल्फ से विज्ञान-दर्शन में स्नातकोत्तर अध्ययन किया और यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ओंटारियो से भौतिकी के दर्शन तथा क्वांटम सिद्धांत से संबंधित विषय पर पीएचडी पूरी की। उनका शोध प्रबंध ‘हिडन वेरिएबल्स एंड नॉन-लोकैलिटी इन क्वांटम थ्योरी’ विषय पर था। इस शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उन्हें विज्ञान की अवधारणाओं, प्रमाणों और तकनीक के सामाजिक प्रभावों पर विचार करने का आधार दिया।

Dinman Times ads 728-90

विज्ञान अनुसंधान से पर्यावरण नीति की ओर

भारत लौटने के बाद वंदना शिवा ने बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) में विज्ञान, तकनीक और पर्यावरण नीति से जुड़े अंतर्विषयी अनुसंधान में काम किया। उनका ध्यान धीरे-धीरे इस प्रश्न पर केंद्रित हुआ कि विकास, तकनीकी बदलाव और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का असर स्थानीय समुदायों, किसानों और महिलाओं पर किस तरह पड़ता है।

ये भी पढ़े

मुंगेर में दिव्यांग प्रमाणपत्र के नाम पर फर्जीवाड़ा, डॉक्टरों के हस्ताक्षर की नकल कर 20 अभ्यर्थियों ने दी SSC परीक्षा
अनंत सिंह की बेटी की शादी में 30 फीट का जयमाला मंच, पवन सिंह-अक्षरा सिंह और सोनू सूद को न्योता
वैशाली में टेंपो और बाइक की टक्कर, चकबीबी के युवक की मौत; एक अन्य घायल
जमुई के दारोगा पंचम कुमार को केंद्रीय गृह मंत्री दक्षता पदक, चंद्रदीप थाना कांड की जांच के लिए मिला सम्मान

1982 में उन्होंने देहरादून में रिसर्च फाउंडेशन फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड नेचुरल रिसोर्स पॉलिसी की स्थापना की, जिसे बाद में रिसर्च फाउंडेशन फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इकोलॉजी (RFSTE) के नाम से जाना गया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने पर्यावरणीय मुद्दों, प्राकृतिक संसाधनों, जैव-विविधता और समुदाय आधारित संरक्षण पर शोध तथा अभियान चलाए। उनका जोर इस बात पर रहा कि पर्यावरण से जुड़े निर्णयों में स्थानीय लोगों के अनुभव और अधिकारों को महत्व मिलना चाहिए।

चिपको आंदोलन और इकोफेमिनिज्म से जुड़ाव

वंदना शिवा के सार्वजनिक जीवन को समझने में हिमालयी क्षेत्र के वन आंदोलनों और चिपको आंदोलन का संदर्भ महत्वपूर्ण है। चिपको आंदोलन में ग्रामीण महिलाओं सहित स्थानीय समुदायों ने पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए जंगलों को बचाने के लिए अहिंसक तरीके अपनाए। वंदना शिवा ने इस आंदोलन और महिलाओं की पर्यावरणीय भूमिका को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में योगदान दिया। वह इस संघर्ष को केवल जंगल बचाने का प्रश्न नहीं, बल्कि आजीविका, जल, मिट्टी, स्थानीय अर्थव्यवस्था और महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा मानती रही हैं।

इसी वैचारिक धारा से उनका जुड़ाव इकोफेमिनिज्म (Ecofeminism) से हुआ। इकोफेमिनिज्म पर्यावरण के शोषण और महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक शोषण के बीच संबंधों की पड़ताल करता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रकृति और महिलाओं पर नियंत्रण की प्रवृत्तियों को कई सामाजिक व्यवस्थाओं में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ देखा जा सकता है। वंदना शिवा ने अपनी पुस्तकों और व्याख्यानों में इस विचार को विस्तार दिया और विकास की उन धारणाओं पर सवाल उठाए जिनमें प्राकृतिक संसाधनों को मुख्यतः आर्थिक वस्तु के रूप में देखा जाता है।

Dinman Times ads 728-90

नवदान्य: बीज संरक्षण और किसानों के अधिकार

वंदना शिवा की सबसे पहचानी जाने वाली पहलों में ‘नवदान्य’ शामिल है। इसकी शुरुआत 1991 में बीजों की विविधता, किसानों के अधिकार और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई। ‘नवदान्य’ का अर्थ नौ बीजों से जुड़ा है और यह नाम कृषि जैव-विविधता के महत्व का प्रतीक है। इस पहल के तहत स्थानीय बीजों के संरक्षण, सामुदायिक बीज बैंकों, जैविक खेती और किसानों के बीच पारंपरिक बीजों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया गया।

नवदान्य का एक प्रमुख विचार यह है कि बीज केवल कृषि उत्पादन का इनपुट नहीं, बल्कि जैव-विविधता, खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और सांस्कृतिक ज्ञान का आधार भी हैं। पारंपरिक किस्मों का संरक्षण बदलती जलवायु, स्थानीय मिट्टी और अलग-अलग कृषि परिस्थितियों के अनुरूप फसल विकल्प उपलब्ध कराने में उपयोगी हो सकता है। हालांकि किसी विशेष बीज या खेती पद्धति की उपयोगिता का आकलन स्थानीय परिस्थितियों, उत्पादकता, लागत, बाजार और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर किया जाना चाहिए।

वंदना शिवा ने बीजों पर बौद्धिक संपदा अधिकार, बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों की भूमिका और किसानों की बीज बचाने तथा साझा करने की परंपरा पर लगातार सवाल उठाए। उनके अनुसार बीजों पर अत्यधिक कॉरपोरेट नियंत्रण कृषि व्यवस्था में किसानों की स्वायत्तता को कमजोर कर सकता है। यह बहस भारत में बीज कानून, किसान अधिकार, पेटेंट और कृषि अनुसंधान की दिशा जैसे व्यापक नीतिगत मुद्दों से जुड़ती है।

हरित क्रांति, वैश्वीकरण और जैव-प्रौद्योगिकी पर विचार

वंदना शिवा ने हरित क्रांति के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों की आलोचनात्मक समीक्षा की है। उनका तर्क रहा है कि अधिक उपज देने वाली कुछ फसलों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता ने कई क्षेत्रों में मिट्टी, जल और खेती की लागत से जुड़ी समस्याएं बढ़ाईं। उन्होंने कृषि को केवल उत्पादन बढ़ाने के नजरिये से नहीं, बल्कि पोषण, पर्यावरणीय स्थिरता, स्थानीय ज्ञान और किसान की आर्थिक स्थिति के संदर्भ में देखने की वकालत की।

Dinman Times ads 728-90

आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) और Bt कपास जैसे विषयों पर उनका रुख आलोचनात्मक रहा है। वे बीज कंपनियों के नियंत्रण, जैव-विविधता पर संभावित प्रभाव और किसानों की निर्भरता से संबंधित चिंताएं उठाती हैं। दूसरी ओर, जैव-प्रौद्योगिकी के समर्थक वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञ कुछ GM फसलों के संभावित लाभ—जैसे विशेष कीटों से सुरक्षा, उपज की स्थिरता या कीटनाशक उपयोग में कमी—की ओर ध्यान दिलाते हैं। किसी तकनीक के लाभ और जोखिम का मूल्यांकन फसल, गुण, पर्यावरण, नियमन और उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर अलग-अलग किया जाना चाहिए।

कृषि जैव-प्रौद्योगिकी पर वंदना शिवा के कुछ सार्वजनिक दावों, खासकर Bt कपास और किसानों की आत्महत्या के बीच सीधे कारणात्मक संबंध जैसे बयानों की आलोचना हुई है। भारत में किसान आत्महत्या एक जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्या है, जिसमें कर्ज, बाजार, मौसम, सिंचाई, फसल जोखिम और आय की अनिश्चितता जैसे अनेक कारक शामिल हैं। इसलिए किसी एक तकनीक को इसका एकमात्र कारण बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। इसी तरह GM फसलों के बारे में किसी भी व्यापक निष्कर्ष के लिए स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा और फसल-विशिष्ट प्रमाण जरूरी हैं। वंदना शिवा की भूमिका को उनके पर्यावरणीय और किसान-अधिकार संबंधी अभियान के संदर्भ में समझना चाहिए, साथ ही उनके वैज्ञानिक दावों को स्वतंत्र प्रमाणों की कसौटी पर परखना चाहिए।

लेखन और प्रमुख पुस्तकें

वंदना शिवा ने पर्यावरण, महिला अधिकार, कृषि, जैव-विविधता और वैश्वीकरण पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में ‘स्टेइंग अलाइव: विमेन, इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट’ (1988), ‘द वायलेंस ऑफ द ग्रीन रिवोल्यूशन’ (1991), ‘मोनोकल्चर्स ऑफ द माइंड’ (1993), ‘बायोपाइरेसी: द प्लंडर ऑफ नेचर एंड नॉलेज’ (1997), ‘स्टोलन हार्वेस्ट’ (1999) और ‘अर्थ डेमोक्रेसी’ शामिल हैं। इन पुस्तकों में उन्होंने विकास की मुख्यधारा की अवधारणाओं, कृषि-व्यवस्था, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों पर अपने विचार रखे।

उनकी लेखन शैली आंदोलनकारी और वैचारिक है। वे जटिल पर्यावरणीय प्रश्नों को किसानों, महिलाओं और स्थानीय समुदायों के अनुभवों से जोड़कर प्रस्तुत करती हैं। उनके विचारों से सहमत और असहमत दोनों तरह के पाठक हैं, लेकिन पर्यावरण नीति, खाद्य व्यवस्था और बीज अधिकारों पर वैश्विक विमर्श में उनकी उपस्थिति महत्वपूर्ण रही है।

Dinman Times ads 728-90

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान

वंदना शिवा को पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई सम्मान मिले हैं। 1993 में उन्हें राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड प्रदान किया गया, जिसे आम तौर पर ‘वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार’ के नाम से भी जाना जाता है। 2010 में उन्हें सिडनी पीस प्राइज मिला। 2012 में फुकुओका पुरस्कार के ग्रैंड प्राइज से सम्मानित किया गया। इन सम्मानों के प्रशस्ति-पत्रों में पर्यावरणीय चिंतन, महिलाओं और गरीब समुदायों के दृष्टिकोण तथा जैव-विविधता संरक्षण के लिए उनके योगदान को रेखांकित किया गया।

वंदना शिवा की विरासत और विचारों का मूल्यांकन

डॉ. वंदना शिवा का सार्वजनिक जीवन कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखता है—खेती में बीजों का नियंत्रण किसके पास हो, जैव-विविधता का संरक्षण कैसे हो, विकास की कीमत कौन चुकाता है और पर्यावरणीय फैसलों में महिलाओं तथा स्थानीय समुदायों की आवाज कितनी सुनी जाती है। उन्होंने इन सवालों को भारत से बाहर वैश्विक मंचों तक पहुंचाया और पर्यावरण आंदोलन को किसान अधिकार तथा नारीवादी विमर्श से जोड़ा।

उनके विचारों का मूल्यांकन करते समय यह अंतर बनाए रखना जरूरी है कि पर्यावरण नीति और सामाजिक न्याय पर उनका वैचारिक योगदान एक विषय है, जबकि कृषि विज्ञान, GM फसलों या किसी तकनीक के स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों पर विशिष्ट दावे वैज्ञानिक प्रमाणों से तय होते हैं। लोकतांत्रिक बहस में कार्यकर्ताओं की चेतावनी, किसानों के अनुभव और वैज्ञानिक अनुसंधान—तीनों की जगह है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष मजबूत, स्वतंत्र और पारदर्शी साक्ष्यों पर आधारित होने चाहिए।

5 नवंबर को जन्मदिवस के अवसर पर डॉ. वंदना शिवा को याद करना भारत में पर्यावरण आंदोलन, बीज संरक्षण और इकोफेमिनिज्म के इतिहास को समझने का अवसर है। उनकी यात्रा यह बताती है कि विज्ञान की शिक्षा से निकला व्यक्ति भी समाज, प्रकृति और विकास की दिशा पर व्यापक सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन सकता है। उनके योगदान और विवादित विचारों पर तथ्यपरक संवाद ही उनकी सार्वजनिक भूमिका को संतुलित ढंग से समझने का बेहतर रास्ता है।

Dinman Times ads 728-90
ख़बर साझा करें
Facebook Whatsapp Whatsapp Telegram Email Print
पिछली ख़बर जमुई के पंचम कुमार को केंद्रीय गृह मंत्री दक्षता पदक, जमुई के दारोगा पंचम कुमार को केंद्रीय गृह मंत्री दक्षता पदक, चंद्रदीप थाना कांड की जांच के लिए मिला सम्मान
अगली ख़बर जे. बी. एस. हाल्डेन जे. बी. एस. हाल्डेन: ब्रिटेन से भारत आए वैज्ञानिक, जिन्होंने आधुनिक आनुवंशिकी और विकासवाद को नई दिशा दी
Google prefered

गूगल पर फेवरेट बनाएँ

ये भी पढ़ें

विवियन ली

विवियन ली: दार्जिलिंग में जन्मी वह अभिनेत्री, जिसने ‘गॉन विद द विंड’ से रचा सिनेमा का इतिहास

मुंगेर में दिव्यांग प्रमाणपत्र फर्जीवाड़ा, डॉक्टरों के हस्ताक्षर से SSC परीक्षा देने वाले 20 अभ्यर्थी जांच के घेरे में

मुंगेर में दिव्यांग प्रमाणपत्र के नाम पर फर्जीवाड़ा, डॉक्टरों के हस्ताक्षर की नकल कर 20 अभ्यर्थियों ने दी SSC परीक्षा

अनंत सिंह की बेटी की शादी: 30 फीट का जयमाला मंच

अनंत सिंह की बेटी की शादी में 30 फीट का जयमाला मंच, पवन सिंह-अक्षरा सिंह और सोनू सूद को न्योता

सज्जाद ज़हीर की 121वीं जयंती

सज्जाद ज़हीर की 121वीं जयंती (5 नवंबर 2026): उर्दू साहित्य में प्रगतिशील चेतना के सूत्रधार, जिनके विचारों ने भारतीय लेखन को नई दिशा दी

वैशाली में टेंपो-बाइक की टक्कर में युवक की मौत, हिलालपुर चौक पर हादसा

वैशाली में टेंपो और बाइक की टक्कर, चकबीबी के युवक की मौत; एक अन्य घायल

Dinman Ads

Get Connected with us on social networks

Facebook-f X-twitter Instagram Youtube Linkedin-in

Poppular Categories

  • बिहार
  • देश
  • अपराध
  • राजनीति
  • मनोरंजन
  • विदेश
  • धर्म
  • खेल
  • पटना
  • टेक्नोलॉजी

Download APP

Google-play Apple
  • About us
  • Privacy Policy
  • Terms and Condition
  • Cookies Policy
  • Contact us
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?