विशेष लेख | 5 नवंबर | जयंती विशेष | साहित्य एवं इतिहास
लखनऊ की सरजमीं पर जन्मे सज्जाद ज़हीर ने साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक बदलाव, समानता, इंसानी गरिमा और विचारों की आजादी की आवाज बनाया। प्रगतिशील लेखक आंदोलन के निर्माण में उनकी भूमिका ने भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्यिक इतिहास पर गहरी छाप छोड़ी।
5 नवंबर की तारीख भारतीय साहित्य के इतिहास में एक ऐसे व्यक्तित्व के जन्मदिवस के रूप में भी याद की जाती है, जिसने कलम को समाज की वास्तविकताओं से जोड़ने का प्रयास किया। यह नाम है सैयद सज्जाद ज़हीर, जिन्हें साहित्यिक दुनिया सज्जाद ज़हीर के नाम से जानती है। उनका जन्म 5 नवंबर 1905 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोलागंज इलाके में हुआ था। 5 नवंबर 2026 को उनकी 121वीं जयंती मनाई जा रही है।
सज्जाद ज़हीर उर्दू के लेखक, उपन्यासकार, विचारक, संपादक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे। लेकिन उनकी पहचान केवल एक साहित्यकार तक सीमित नहीं रही। वे उस प्रगतिशील साहित्यिक चेतना के प्रमुख निर्माताओं में शामिल थे, जिसने भारतीय लेखकों को समाज के वंचित तबकों, मजदूरों, किसानों, महिलाओं और आम लोगों के जीवन की वास्तविकताओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाने के लिए प्रेरित किया।

उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि साहित्य केवल कल्पनाओं की दुनिया नहीं, बल्कि अपने समय के सवालों से संवाद करने का माध्यम भी हो सकता है।
लखनऊ में जन्म और प्रभावशाली पारिवारिक पृष्ठभूमि
सज्जाद ज़हीर का जन्म एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता सैयद वज़ीर हसन न्यायिक क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण हस्ती थे और अवध के मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुंचे थे। परिवार में शिक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक गतिविधियों का वातावरण था।
ऐसे परिवेश में पले-बढ़े सज्जाद ज़हीर को उच्च शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। उन्होंने लखनऊ में प्रारंभिक और उच्च शिक्षा हासिल की। आगे की पढ़ाई के लिए वे इंग्लैंड गए और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े। उनका उद्देश्य कानून की पढ़ाई करना था, लेकिन विदेश प्रवास ने उनके विचारों और जीवन की दिशा को गहराई से प्रभावित किया।
इंग्लैंड में रहते हुए उनका संपर्क भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों, वामपंथी विचारकों और साहित्यकारों से हुआ। यहीं उनके भीतर साम्राज्यवाद, सामाजिक असमानता और शोषण के विरुद्ध वैचारिक चेतना विकसित हुई।

ऑक्सफोर्ड और लंदन में बिताए वर्षों ने उन्हें भारतीय समाज को एक नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर दिया। वे समझने लगे थे कि साहित्य को सामाजिक जीवन की जटिलताओं और आम आदमी की समस्याओं से जोड़ना जरूरी है।
‘अंगारे’ से उठी साहित्यिक बहस और प्रगतिशील आंदोलन की पृष्ठभूमि
सज्जाद ज़हीर के साहित्यिक जीवन का उल्लेख ‘अंगारे’ के बिना अधूरा है। वर्ष 1932 में प्रकाशित इस कहानी-संग्रह ने तत्कालीन उर्दू साहित्य और सामाजिक परिवेश में व्यापक बहस पैदा कर दी थी।
इस संग्रह में सज्जाद ज़हीर के साथ अहमद अली, राशिद जहां और महमूदुज़्ज़फर की रचनाएं भी शामिल थीं। इन लेखकों ने अपनी कहानियों में सामाजिक रूढ़ियों, धार्मिक पाखंड, लैंगिक असमानता और समाज में मौजूद विसंगतियों पर सवाल उठाए थे।
उस दौर में इस तरह के विषयों को साहित्य में खुलकर उठाना आसान नहीं था। ‘अंगारे’ की कुछ रचनाओं को लेकर विरोध हुआ और तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय सरकार ने 1933 में इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया।

इस विवाद को केवल एक पुस्तक पर उठे विरोध के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसने भारतीय साहित्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार और लेखक की जिम्मेदारी को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दिया।
‘अंगारे’ के प्रकाशन और उसके बाद पैदा हुए विवाद ने प्रगतिशील लेखकों को संगठित होने की दिशा में भी प्रेरित किया। आगे चलकर यही प्रयास एक व्यापक साहित्यिक आंदोलन के रूप में विकसित हुआ।
प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में ऐतिहासिक भूमिका
सज्जाद ज़हीर के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान प्रगतिशील लेखक आंदोलन को संगठित स्वरूप प्रदान करना था।
वर्ष 1935 में लंदन में भारतीय प्रगतिशील लेखकों को एक मंच पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई। सज्जाद ज़हीर इस पहल के प्रमुख सूत्रधार थे। उन्होंने अन्य साहित्यकारों के सहयोग से प्रगतिशील लेखन के उद्देश्य और विचारधारा को व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस आंदोलन का मूल विचार था कि साहित्य समाज से अलग नहीं रह सकता। लेखक को अपने आसपास मौजूद गरीबी, शोषण, अन्याय, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और औपनिवेशिक शासन जैसी समस्याओं को समझना चाहिए तथा उन्हें अपनी रचनाओं में स्थान देना चाहिए।
इसके बाद भारत में इस आंदोलन को संगठित करने का प्रयास तेज हुआ। अप्रैल 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन की अध्यक्षता हिंदी साहित्य के महान लेखक मुंशी प्रेमचंद ने की थी।
यह सम्मेलन भारतीय साहित्य के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। इसमें विभिन्न भाषाओं के लेखकों ने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन और मानवीय मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
सज्जाद ज़हीर ने इस संगठन को मजबूत बनाने, लेखकों को जोड़ने और उसके विचारों को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पुस्तक ‘रोशनाई’ को प्रगतिशील लेखक आंदोलन के इतिहास और उसके विकास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।

‘लंदन की एक रात’ और साहित्यिक रचनाधर्मिता
सज्जाद ज़हीर की साहित्यिक प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण उनका उपन्यास ‘लंदन की एक रात’ है। यह रचना वर्ष 1938 में प्रकाशित हुई थी।
इस उपन्यास में उन्होंने लंदन में रहने वाले भारतीय युवाओं के अनुभवों, मानसिक संघर्षों, सपनों और सामाजिक परिस्थितियों को चित्रित किया। इसके माध्यम से औपनिवेशिक समाज में भारतीयों की स्थिति और उनके भीतर चलने वाले वैचारिक द्वंद्व को अभिव्यक्ति मिली।
उनकी रचनाओं की एक विशेषता यह थी कि वे व्यक्ति के जीवन को उसके सामाजिक और ऐतिहासिक परिवेश से अलग करके नहीं देखते थे। उनके पात्र केवल व्यक्तिगत सुख-दुख तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके माध्यम से व्यापक सामाजिक परिस्थितियों की झलक भी मिलती है।
उनकी अन्य चर्चित साहित्यिक कृतियों में ‘रोशनाई’, ‘बीमार’, ‘पिघला नीलम’ और ‘नक़ूश-ए-जिंदां’ का उल्लेख किया जाता है।

वे अनुवाद के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। विलियम शेक्सपियर की ‘ओथेलो’, वोल्तेयर की ‘कांदीद’ और रवींद्रनाथ टैगोर की ‘गोरा’ जैसी कृतियों के अनुवाद से भी उनका नाम जुड़ा है।
उनकी रचनात्मकता का दायरा केवल कहानी और उपन्यास तक सीमित नहीं था। उन्होंने निबंध, आलोचना, वैचारिक लेखन और संपादन के माध्यम से भी साहित्यिक दुनिया में योगदान दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन और वामपंथी विचारधारा से जुड़ाव
सज्जाद ज़हीर का साहित्यिक जीवन उनके राजनीतिक और सामाजिक विचारों से गहराई से जुड़ा हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सक्रिय रूप से काम किया।
उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक समानता भी जरूरी है। उनके विचार में केवल विदेशी शासन से मुक्ति हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं था, बल्कि समाज में व्याप्त शोषण और असमानता को समाप्त करने की दिशा में भी प्रयास होने चाहिए।

वे लेखन के साथ-साथ संगठनात्मक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे। वर्ष 1940 में ब्रिटिश शासन के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन्होंने जेल में समय बिताया। वर्ष 1942 में रिहाई के बाद उन्होंने अपनी साहित्यिक और राजनीतिक गतिविधियां फिर शुरू कीं।
इस दौरान वे पत्रकारिता और संपादन से भी जुड़े। ‘कौमी जंग’ और ‘नया ज़माना’ जैसे प्रकाशनों के संपादन में उनकी भूमिका रही। आगे चलकर वे ‘अवामी दौर’ और ‘हयात’ से भी जुड़े।
उनके लिए पत्रकारिता और साहित्य दोनों ही जनसामान्य के सवालों को सामने लाने के माध्यम थे।
विभाजन के बाद पाकिस्तान जाना और रावलपिंडी षड्यंत्र मामला
1947 में भारत के विभाजन ने सज्जाद ज़हीर के जीवन में एक नया और जटिल अध्याय शुरू किया।

वर्ष 1948 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के संगठनात्मक कार्यों के सिलसिले में पाकिस्तान गए। वहां उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान के संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई और उसके महासचिव के रूप में काम किया।
हालांकि, पाकिस्तान में उनका राजनीतिक जीवन आसान नहीं रहा। वर्ष 1951 के रावलपिंडी षड्यंत्र मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला पाकिस्तान के शुरुआती राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है।
इस मामले में उन पर तत्कालीन सरकार के खिलाफ साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे। उन्हें लगभग साढ़े चार वर्षों तक विभिन्न जेलों में रहना पड़ा।
वर्ष 1955 में उनकी रिहाई हुई और वे भारत लौट आए। इसके बाद उन्होंने फिर से साहित्यिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया।

यह दौर उनके जीवन का बेहद कठिन समय था। एक ओर वे साहित्य और विचारों की दुनिया में सक्रिय थे, तो दूसरी ओर राजनीतिक परिस्थितियों और जेल जीवन ने उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित किया।
भारत लौटने के बाद साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियां
भारत लौटने के बाद सज्जाद ज़हीर ने प्रगतिशील लेखक संघ को फिर से सक्रिय करने की दिशा में काम किया। उनका प्रयास था कि साहित्यकारों के बीच संवाद बना रहे और साहित्यिक गतिविधियां केवल किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित न रहें।
वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लेखकों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग के पक्षधर थे।
वर्ष 1958 में ताशकंद में आयोजित प्रथम अफ्रीकी-एशियाई लेखक सम्मेलन से उनका जुड़ाव रहा। उन्होंने अफ्रीकी और एशियाई देशों के लेखकों को एक साझा मंच पर लाने की दिशा में भी काम किया।

उनकी सोच में साहित्य की कोई सीमित भौगोलिक पहचान नहीं थी। वे मानते थे कि अलग-अलग देशों के लेखक अपने समाजों की समस्याओं, संघर्षों और आकांक्षाओं को समझने के लिए एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं।
उनकी सक्रियता का प्रभाव भारत के अलावा पाकिस्तान और अन्य देशों के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी देखा गया।
निजी जीवन और परिवार
सज्जाद ज़हीर का विवाह 10 दिसंबर 1938 को रज़िया दिलशाद से हुआ था। उनकी पत्नी भी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी थीं।
उनके परिवार का भी भारतीय साहित्य और रंगमंच की दुनिया से संबंध रहा। उनकी बेटी नादिरा बब्बर भारतीय रंगमंच और अभिनय जगत की जानी-मानी हस्ती हैं, जबकि नूर ज़हीर लेखन और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय रही हैं।

सज्जाद ज़हीर के निजी जीवन में साहित्य, विचार और सामाजिक सरोकारों का विशेष स्थान था। उनका परिवार भी उनकी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा।
कजाकिस्तान में निधन, लेकिन विचारों की विरासत आज भी जीवित
सज्जाद ज़हीर का निधन 13 सितंबर 1973 को तत्कालीन सोवियत संघ के अल्मा-अता (वर्तमान अल्माटी, कजाकिस्तान) में हुआ। वे वहां अफ्रीकी-एशियाई लेखकों के एक सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। इसी दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया।
उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया और दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के निकट जामिया नगर स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
उनके निधन से भारतीय साहित्य और प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व खो दिया। हालांकि, उनके विचार और साहित्यिक योगदान आगे भी लेखकों, शोधकर्ताओं और पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहे।

सज्जाद ज़हीर की विरासत और आज के समय में उनकी प्रासंगिकता
आज जब साहित्य की भूमिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और लेखक की जिम्मेदारी जैसे सवालों पर चर्चा होती है, तब सज्जाद ज़हीर का जीवन और योगदान विशेष रूप से याद किया जाता है।
उन्होंने लेखकों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि साहित्य का उद्देश्य केवल सुंदर शब्दों और कल्पनाशील कथाओं की रचना करना नहीं है। समाज के वास्तविक जीवन, उसकी समस्याओं और आम लोगों के संघर्षों को भी साहित्य में जगह मिलनी चाहिए।
उनके प्रयासों से विकसित प्रगतिशील लेखक आंदोलन ने हिंदी, उर्दू, बंगाली, पंजाबी और अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य को प्रभावित किया। प्रेमचंद, मुल्कराज आनंद, फैज़ अहमद फैज़, इस्मत चुगताई, कृष्ण चंदर और कई अन्य साहित्यकारों से जुड़ी व्यापक प्रगतिशील साहित्यिक परंपरा ने भारतीय उपमहाद्वीप के लेखन को नए विषय और नई दृष्टि प्रदान की। इस आंदोलन के विकास में अलग-अलग लेखकों की अपनी स्वतंत्र भूमिका भी रही।
सज्जाद ज़हीर की जयंती केवल एक साहित्यकार के जन्मदिन को याद करने का अवसर नहीं है। यह उस दौर को समझने का भी अवसर है, जब भारतीय लेखकों ने साहित्य के माध्यम से सामाजिक बदलाव और मानवीय मूल्यों की स्थापना का सपना देखा था।

5 नवंबर 2026 को उनकी 121वीं जयंती पर लखनऊ की इस महान साहित्यिक विभूति को याद करना भारतीय साहित्य की उस परंपरा को सम्मान देना है, जिसने कलम को समाज की आवाज बनाने का प्रयास किया।
सज्जाद ज़हीर की सबसे बड़ी पहचान शायद यही है कि उन्होंने साहित्य को केवल पढ़ने की चीज नहीं, बल्कि सोचने, सवाल उठाने और समाज को समझने का माध्यम बनाने की कोशिश की। उनकी यह विरासत आज भी भारतीय साहित्यिक चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
