रोचेस्टर (अमेरिका): 5 नवंबर 1872 को अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य के रोचेस्टर शहर में एक ऐसी घटना हुई, जिसने महिला मताधिकार की लड़ाई को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। महिला अधिकारों की प्रमुख कार्यकर्ता सुसन बी. एंथनी ने उस दिन राष्ट्रपति चुनाव में अपना मत डाला, जबकि उस समय महिलाओं को मतदान का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं था। उनके साथ उसी निर्वाचन क्षेत्र की 14 अन्य महिलाओं ने भी मतदान किया। इस कदम के बाद एंथनी पर अवैध मतदान का मुकदमा चला और उन्हें दोषी ठहराया गया। यह घटना अमेरिकी महिला मताधिकार आंदोलन के इतिहास में प्रतिरोध, नागरिक अधिकार और समानता की मांग का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गई।
महिला मताधिकार की लड़ाई का ऐतिहासिक संदर्भ
19वीं सदी के अमेरिका में महिलाओं को राजनीति और सार्वजनिक जीवन में समान अधिकार नहीं मिले थे। अधिकांश राज्यों में महिलाएं मतदान नहीं कर सकती थीं और कानून-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी सीधी भागीदारी सीमित थी। इसके बावजूद महिलाएं शिक्षा, संपत्ति, रोजगार और नागरिक अधिकारों से जुड़े सवालों पर संगठित हो रही थीं। 1848 के सेनेका फॉल्स सम्मेलन को अमेरिकी महिला अधिकार आंदोलन की शुरुआती संगठित घटनाओं में गिना जाता है। इस सम्मेलन के बाद मताधिकार की मांग धीरे-धीरे एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनी।
सुसन बी. एंथनी इस आंदोलन की प्रमुख नेताओं में थीं। उन्होंने एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन के साथ मिलकर महिलाओं के कानूनी और राजनीतिक अधिकारों के लिए लंबे समय तक अभियान चलाया। 1869 में दोनों ने नेशनल वुमन सफरेज एसोसिएशन (NWSA) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका तर्क था कि नागरिकता और लोकतंत्र के अधिकार महिलाओं को भी मिलने चाहिए।
5 नवंबर 1872: मतदान केंद्र पर एंथनी की चुनौती
1872 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार और तत्कालीन राष्ट्रपति यूलिसिस एस. ग्रांट तथा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार होरेस ग्रीली के बीच मुकाबला था। चुनाव के पहले सुसन बी. एंथनी ने रोचेस्टर में मतदाता के रूप में अपना पंजीकरण कराया। स्थानीय चुनाव अधिकारियों के सामने उन्होंने अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन का हवाला देते हुए कहा कि नागरिक होने के नाते उन्हें भी मतदान का अधिकार मिलना चाहिए। उस समय न्यूयॉर्क का कानून महिलाओं को मताधिकार नहीं देता था, फिर भी स्थानीय अधिकारियों ने उनका पंजीकरण स्वीकार किया।

5 नवंबर को एंथनी ने मतदान केंद्र पहुंचकर अपना मत डाला। उनके साथ उसी निर्वाचन क्षेत्र की 14 अन्य महिलाओं ने भी वोट दिया। एंथनी ने उसी दिन अपनी सहयोगी एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन को पत्र लिखकर बताया कि उन्होंने मतदान कर दिया है। उनके लिए यह केवल चुनाव में भागीदारी नहीं थी, बल्कि संविधान और नागरिकता की उस व्याख्या को सार्वजनिक चुनौती देना था जिसमें महिलाओं को राजनीतिक अधिकारों से बाहर रखा गया था।
मतदान के बाद गिरफ्तारी और मुकदमा
मतदान के तुरंत बाद एंथनी को गिरफ्तार नहीं किया गया। चुनाव के लगभग दो सप्ताह बाद उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हुई। 26 दिसंबर 1872 को अमेरिकी मार्शल को उन्हें हिरासत में लेने का आदेश दिया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने यह जानते हुए मतदान किया कि उन्हें कानूनी रूप से ऐसा करने का अधिकार नहीं था। इस मामले में अन्य महिलाओं के नाम भी आए, लेकिन मुकदमे के लिए अंततः एंथनी का मामला आगे बढ़ाया गया।
मुकदमे में एंथनी ने दलील दी कि 14वें संशोधन के तहत अमेरिकी नागरिक के रूप में उन्हें मतदान का अधिकार प्राप्त था। उनका तर्क था कि यदि संविधान नागरिकों को समान संरक्षण देता है, तो राज्य केवल लिंग के आधार पर महिलाओं को मताधिकार से वंचित नहीं कर सकता। अदालत ने उनकी दलील स्वीकार नहीं की। जून 1873 में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश वार्ड हंट ने जूरी को दोषी ठहराने का निर्देश दिया। एंथनी को दोषी करार देते हुए 100 डॉलर का जुर्माना और अदालती खर्च भरने की सजा सुनाई गई।
एंथनी ने जुर्माना भरने से इनकार कर दिया। उन्होंने मुकदमे को महिलाओं के नागरिक अधिकारों के प्रश्न से जोड़ा और अदालत की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। इस मुकदमे ने अखबारों और सार्वजनिक सभाओं के जरिए महिला मताधिकार की मांग को व्यापक चर्चा में ला दिया। यह मामला इस बात का उदाहरण बना कि कानून की सीमाओं को चुनौती देकर सामाजिक अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस कैसे खड़ी की जा सकती है।

क्या इस घटना से ही महिला मताधिकार आंदोलन शुरू हुआ?
इतिहास को सटीक रूप में समझने के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि महिला मताधिकार आंदोलन 1872 में एंथनी के मतदान से शुरू नहीं हुआ था। अमेरिका में महिलाओं के अधिकारों की संगठित मांग इससे कई दशक पहले उठ चुकी थी। एंथनी का मतदान उस लंबे संघर्ष की एक नाटकीय और चर्चित कार्रवाई थी, जिसने आंदोलन को नई सार्वजनिक दृश्यता दी। इस घटना ने नागरिकता, संविधान और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के अर्थ पर बहस को तेज किया।
उस दौर में महिला मताधिकार आंदोलन के भीतर रणनीति और प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद भी थे। कुछ कार्यकर्ता संघीय संविधान संशोधन पर जोर दे रहे थे, जबकि अन्य राज्य-दर-राज्य मतदान अधिकार हासिल करने की रणनीति अपनाना चाहते थे। 1869 में स्थापित दो प्रमुख संगठनों—NWSA और अमेरिकन वुमन सफरेज एसोसिएशन—की अलग-अलग रणनीतियां थीं। 1890 में दोनों का विलय हुआ और नेशनल अमेरिकन वुमन सफरेज एसोसिएशन बना। इस व्यापक आंदोलन में अनेक महिलाओं, अश्वेत अधिकार कार्यकर्ताओं और सहयोगियों का योगदान रहा।
19वां संविधान संशोधन और अधूरी रह गई व्यक्तिगत उपलब्धि
सुसन बी. एंथनी ने जीवन के अंतिम वर्षों तक महिलाओं के मताधिकार के लिए अभियान जारी रखा। 1906 में उनका निधन हो गया। वे अपने जीवनकाल में महिलाओं को पूरे देश में समान मताधिकार मिलने की संवैधानिक उपलब्धि नहीं देख सकीं। 18 अगस्त 1920 को अमेरिकी संविधान के 19वें संशोधन को अनुमोदन मिला। इस संशोधन ने संघीय और राज्य सरकारों को लिंग के आधार पर नागरिकों के मतदान अधिकार से वंचित करने पर रोक लगाई। यह संशोधन एंथनी की मृत्यु के लगभग 14 वर्ष बाद लागू हुआ और उनके सम्मान में इसे लोकप्रिय रूप से ‘सुसन बी. एंथनी संशोधन’ भी कहा जाता है।
हालांकि 19वें संशोधन के बाद भी अमेरिका में सभी महिलाओं के लिए मतदान व्यवहार में समान रूप से सुलभ नहीं हुआ। नस्लीय भेदभाव, स्थानीय पंजीकरण बाधाएं और अन्य प्रतिबंध विशेष रूप से अश्वेत महिलाओं तथा अन्य वंचित समुदायों के मतदाताओं को प्रभावित करते रहे। इसलिए महिला मताधिकार की संवैधानिक जीत को लोकतांत्रिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव मानना चाहिए, न कि सभी बाधाओं के तत्काल अंत के रूप में।

एक मत, जिसने नागरिक अधिकारों की बहस को नई धार दी
5 नवंबर 1872 की घटना का महत्व इस बात में है कि सुसन बी. एंथनी ने उस समय के कानून को निष्क्रिय रूप से स्वीकार करने के बजाय उसके औचित्य को चुनौती दी। उनका मतदान और उसके बाद चला मुकदमा अमेरिकी लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी के सवाल को सार्वजनिक विमर्श में लाने वाला महत्वपूर्ण प्रसंग बना। यह कार्रवाई अकेली नहीं थी—उस दिन उनके साथ 14 अन्य महिलाओं ने भी मतदान किया और व्यापक आंदोलन में अनेक कार्यकर्ता सक्रिय थीं।
आज सुसन बी. एंथनी को महिला मताधिकार आंदोलन की अग्रणी नेताओं में गिना जाता है। उनकी कहानी याद दिलाती है कि लोकतांत्रिक अधिकार अक्सर लंबे संघर्ष, संगठन, कानूनी चुनौती और सार्वजनिक दबाव के बाद हासिल होते हैं। 5 नवंबर 1872 का उनका मत केवल एक चुनावी मत नहीं था; वह समान नागरिकता की मांग का एक ऐतिहासिक वक्तव्य था, जिसकी गूंज 1920 के 19वें संशोधन तक और उसके बाद भी सुनाई देती रही।
