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BRICS की वेलकम किट में बिहार का स्वाद: सत्तू-मखाना पहुंचे ग्लोबल मंच पर, जानिए क्यों खास हैं ये देसी सुपरफूड

आभा शुक्ला
Last updated: सितम्बर 13, 2026 8:43 अपराह्न
By : आभा शुक्ला
Published on : 2 महीना पहले
BRICS Summit 2026 की वेलकम किट में शामिल बिहार का सत्तू और मखाना
BRICS Summit 2026 की वेलकम किट में शामिल बिहार का सत्तू और मखाना
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भुने चने की ताकत से लेकर मिथिला के तालाबों तक… बिहार के दो देसी खाद्य पदार्थ अब दुनिया के बड़े मंच पर। आधुनिक न्यूट्रिशन साइंस के साथ सदियों पुराने आयुर्वेदिक ज्ञान में भी मिलता है मखाने का उल्लेख।

नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS Summit 2026 में दुनिया के कई देशों से आए प्रतिनिधियों और पत्रकारों के सामने भारत ने सिर्फ अपनी कूटनीतिक ताकत ही नहीं, बल्कि अपनी खान-पान और सांस्कृतिक विविधता की झलक भी पेश की।

BRICS की वेलकम और मीडिया किट में बिहार के सत्तू और मखाना को जगह दी गई। इनके साथ ओडिशा की कोरापुट कॉफी और गुजरात के हस्तशिल्प उत्पाद भी शामिल किए गए। यानी दुनिया के सामने भारत की पहचान सिर्फ बड़े शहरों और आधुनिक तकनीक से नहीं, बल्कि उन स्थानीय उत्पादों से भी रखी गई जो गांव, खेत, तालाब और सदियों पुरानी परंपराओं से जुड़े हैं।

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी सत्तू और मखाने के इस अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने पर खुशी जताई और इसे बिहार के स्वाद, परंपरा और स्थानीय उद्यमिता की पहचान बताया।

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लेकिन सवाल है—आखिर सत्तू और मखाना ही क्यों?

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इसका जवाब सिर्फ इनके स्वाद या आज की ‘सुपरफूड’ वाली लोकप्रियता में नहीं छिपा। इसके पीछे है कृषि, स्थानीय अर्थव्यवस्था, पोषण, परंपरा और भारतीय ज्ञान की एक लंबी कहानी।

सत्तू: जब देसी चना बना बिहार की पहचान

बिहार में सत्तू कोई नया फैशन नहीं है। यह पीढ़ियों से यहां के खान-पान का हिस्सा रहा है।

मुख्य रूप से भुने हुए चने को पीसकर तैयार किया जाने वाला सत्तू बेहद सरल खाद्य है। चने को साफ किया जाता है, भुना जाता है और फिर पीसकर आटा तैयार किया जाता है। कुछ क्षेत्रों और उत्पादों में दूसरे अनाज या दालों का मिश्रण भी इस्तेमाल किया जाता है।

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BRICS Summit 2026 की वेलकम किट में शामिल बिहार का सत्तू और मखाना
BRICS Summit 2026 की वेलकम किट में बिहार के सत्तू

यही सादगी इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

गर्मियों में सत्तू को पानी में घोलकर नमक, नींबू, प्याज और मसालों के साथ पीना हो या फिर इसे लिट्टी की स्टफिंग, पराठे और दूसरे व्यंजनों में इस्तेमाल करना हो—सत्तू बिहार की रोजमर्रा की जिंदगी में गहराई से शामिल है।

और आज जब दुनिया plant-based protein, dietary fibre और traditional foods की तरफ फिर से ध्यान दे रही है, तब सत्तू को नए पैकेजिंग और आधुनिक food products के साथ नए बाजार मिलने की संभावना भी बढ़ी है।

हालांकि इसे हर व्यक्ति के लिए ‘सुपरफूड’ या किसी बीमारी का इलाज बताना सही नहीं होगा। सत्तू कितना और किस रूप में लिया जाए, यह व्यक्ति की पूरी डाइट और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है।

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लेकिन बिहार के इन देसी खाद्य पदार्थों की कहानी सिर्फ आधुनिक Nutrition Science तक सीमित नहीं है…

भारत में भोजन को समझने की परंपरा आज की nutrition labels से कहीं पुरानी है।

आयुर्वेद में किसी पदार्थ को केवल इस आधार पर नहीं देखा जाता था कि वह खाने में कैसा है। उसके रस, गुण, वीर्य, विपाक और शरीर पर प्रभाव जैसे पहलुओं को भी समझने की कोशिश की जाती थी।

इसी परंपरा में आता है ‘भावप्रकाश निघंटु’।

16वीं शताब्दी के वैद्य भावमिश्र से जुड़ा यह महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक निघंटु ग्रंथ विभिन्न वनस्पतियों, खाद्य पदार्थों और दूसरे द्रव्यों के गुणों को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करता है। इसकी खासियत यह है कि किसी पदार्थ की पहचान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके अलग-अलग पर्याय और गुणों के जरिए भी की जाती है।

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BRICS Summit 2026 की वेलकम किट में शामिल बिहार का सत्तू और मखाना
मखाने के लिए भावप्रकाश निघंटु में ‘मखान्न’ नाम मिलता है।

यानी उस दौर की सोच में सवाल सिर्फ यह नहीं था कि—

“यह चीज क्या है?”

बल्कि यह भी था—

“इसका स्वभाव कैसा है? इसके गुण क्या हैं? और शरीर के साथ इसका संबंध कैसा है?”

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और यहीं से हमारी कहानी फिर लौटती है मखाने पर।


भावप्रकाश निघंटु में मखाना: आज का Superfood, पुराने ग्रंथ में ‘मखान्न’

मखाने के लिए भावप्रकाश निघंटु में ‘मखान्न’ नाम मिलता है।

ग्रंथ में लिखा है—

“मखान्नं पद्मबीजाभं पानीयफलमित्यपि।
मखान्नं पद्मबीजस्य गुणैस्तुल्यं विनिर्दिशेत्॥”

सरल भाषा में इसका अर्थ है कि मखान्न को पद्मबीज यानी कमल के बीज के समान माना गया है और उसके गुणों को भी पद्मबीज के समान बताया गया है। यह संदर्भ भावप्रकाश निघंटु के आम्रादिफलवर्ग में मिलता है।

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यानी जिस मखाने को आज दुनिया आधुनिक पैकेजिंग में fox nut या एक nutritious snack के रूप में देख रही है, उसका उल्लेख भारतीय आयुर्वेदिक साहित्य में सदियों पहले एक विशिष्ट खाद्य द्रव्य के रूप में मिलता है।

यहां एक जरूरी बात समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

आयुर्वेदिक गुणों को आधुनिक nutrition science के वैज्ञानिक मापदंडों के बराबर नहीं रखा जा सकता। दोनों की अपनी अलग भाषा और अपनी अलग ज्ञान-पद्धति है।

लेकिन दोनों के बीच एक दिलचस्प समानता जरूर दिखाई देती है—भोजन को केवल स्वाद नहीं, बल्कि उसके गुण और शरीर पर प्रभाव के नजरिए से समझने की कोशिश।

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यही वजह है कि मखाने की कहानी सिर्फ एक snack की कहानी नहीं रह जाती।

यह तालाब से आयुर्वेद तक और आयुर्वेद से ग्लोबल मार्केट तक पहुंची एक लंबी यात्रा बन जाती है।


मखाना: तालाब से निकलकर दुनिया की प्लेट तक

अगर सत्तू बिहार की मिट्टी और चने से जुड़ा है, तो मखाना बिहार के जल संसाधनों और खासकर मिथिला क्षेत्र की पहचान है।

BRICS Summit 2026 की वेलकम किट में शामिल बिहार का सत्तू और मखाना
मखाना: तालाब से दुनिया की प्लेट तक

मखाना पानी में उगने वाला पौधा है और बिहार देश के मखाना उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। हालिया सरकारी जानकारी के मुताबिक भारत के कुल मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी करीब 90 प्रतिशत बताई गई है। PIB के अनुसार 2025-26 में बिहार में मखाना उत्पादन 60,000 मीट्रिक टन रहा।

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मखाने की खेती और processing आसान काम नहीं है।

पानी में जाकर बीजों को इकट्ठा करना, उन्हें सुखाना, गर्म करना, फोड़ना और फिर सफेद, कुरकुरे मखाने में बदलना—इस पूरी प्रक्रिया के पीछे किसानों और श्रमिकों की मेहनत होती है।

यानी बाजार में दिखाई देने वाला छोटा-सा मखाना वास्तव में तालाब, किसान, श्रमिक और स्थानीय अर्थव्यवस्था की पूरी कहानी अपने साथ लेकर आता है।


मखाने का सफेद दाना तैयार होने में लगती है लंबी मेहनत

मखाने के बीज पानी से एकत्र किए जाते हैं। इसके बाद उन्हें साफ किया जाता है और सुखाया जाता है।

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फिर शुरू होती है सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया—भूनने और फोड़ने की।

उचित तापमान पर बीजों को गर्म करने के बाद पारंपरिक तरीके से उन्हें फोड़ा जाता है। इसी प्रक्रिया के बाद अंदर का सफेद हिस्सा बाहर आता है और हमें मिलता है वह हल्का और कुरकुरा मखाना जिसे आज snack के तौर पर पूरी दुनिया में पहचान मिल रही है।

पारंपरिक processing काफी श्रम-प्रधान रही है। इसलिए मखाने की कहानी में सिर्फ खेती नहीं, बल्कि processing, grading, packaging और value addition भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।


मिथिला मखाना को मिला GI Tag

मखाने की पहचान को एक बड़ा संस्थागत आधार तब मिला जब मिथिला मखाना को 2022 में GI Tag मिला।

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GI यानी Geographical Indication किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े उत्पाद की पहचान को कानूनी संरक्षण देता है।

इससे ‘मिथिला मखाना’ की अलग पहचान बनाने और उसकी brand value मजबूत करने की कोशिशों को सहारा मिला। सरकारी दस्तावेजों में भी ‘Mithila Makhana’ के GI Tag का उल्लेख है।

यानी अब यह सिर्फ ‘मखाना’ नहीं—मिथिला की पहचान से जुड़ा उत्पाद भी है।


अब मखाना सिर्फ खेत और तालाब का उत्पाद नहीं, पूरी Value Chain का हिस्सा

मखाने की बढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने National Makhana Board की दिशा में कदम बढ़ाया और बोर्ड का गठन 14 सितंबर 2025 को बिहार में किया गया। इसका उद्देश्य उत्पादन, processing, value addition, marketing और export promotion को बढ़ावा देना है।

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यानी आने वाले समय में असली मुकाबला सिर्फ यह नहीं होगा कि बिहार कितना मखाना पैदा करता है। सवाल यह होगा कि—

  • क्या बिहार अपने मखाने की बेहतर processing कर पाएगा?
  • क्या packaging को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाया जा सकेगा?
  • क्या consistent quality सुनिश्चित होगी?
  • क्या global food standards के साथ बाजार बढ़ाया जा सकेगा?

और अब आते हैं मखाने के पोषण पर

मखाने में carbohydrate, protein और कई minerals पाए जाते हैं और इसे आमतौर पर भूनकर snack के रूप में खाया जाता है।

लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है।

सादा भुना हुआ मखाना और ज्यादा घी, तेल, नमक या flavouring के साथ तैयार मखाने की nutritional profile एक जैसी नहीं होगी।

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इसलिए ‘मखाना हर बीमारी का इलाज है’ या ‘हर व्यक्ति के लिए perfect superfood है’ जैसे दावे वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होंगे।

सही बात यह है कि मखाना एक पारंपरिक खाद्य पदार्थ है, जिसका पोषण और संभावित स्वास्थ्य प्रभाव आधुनिक शोध का भी विषय रहा है।

और यही जगह है जहां पुराना ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे से बातचीत करते हुए दिखाई देते हैं।


BRICS में जगह मिलना सिर्फ सम्मान नहीं, एक बड़ा बाजार संकेत भी

BRICS की वेलकम किट में बिहार का सत्तू और मखाना शामिल होना अपने आप में कोई export agreement नहीं है।

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लेकिन यह निश्चित तौर पर global visibility का बड़ा मौका है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार BRICS की वेलकम किट के लिए बिहार से सत्तू और मखाना शामिल किए गए थे। करीब 1,500 पैकेट तैयार किए गए और इन उत्पादों को विदेशी प्रतिनिधियों तथा पत्रकारों तक पहुंचाया गया।

दुनिया के अलग-अलग देशों से आए प्रतिनिधि और अंतरराष्ट्रीय पत्रकार जब बिहार के सत्तू और मखाने को अपने हाथ में लेते हैं, तो उनके सामने सिर्फ दो खाद्य पदार्थ नहीं होते।

उनके सामने होती है—

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  • बिहार की खेती
  • मिथिला के तालाब
  • स्थानीय श्रमिकों की मेहनत
  • आयुर्वेद की पुरानी ज्ञान-परंपरा
  • आज का बदलता हुआ food market

यही है Local to Global की असली कहानी।


अब असली चुनौती शुरू होती है

BRICS की किट में जगह मिलना बिहार के लिए बड़ी उपलब्धि जरूर है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में जगह सिर्फ पहचान से नहीं बनती।

इसके लिए चाहिए—

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  • एक जैसी गुणवत्ता
  • बेहतर processing
  • सुरक्षित packaging
  • food safety standards
  • निरंतर supply
  • मजबूत branding
  • competitive pricing

अगर ये चीजें मजबूत होती हैं, तो सत्तू और मखाना सिर्फ BRICS की welcome kit तक सीमित नहीं रहेंगे।

वे दुनिया के supermarket shelves, health-food markets और international kitchens तक पहुंच सकते हैं।

और तब बिहार की कहानी सिर्फ यह नहीं होगी कि—

“हमारे यहां मखाना पैदा होता है।”

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बल्कि कहानी यह होगी कि—

“बिहार ने अपने तालाब और खेत की उपज को दुनिया के बाजार की भाषा में बदल दिया।”

सत्तू हो या मखाना—दोनों हमें एक बात याद दिलाते हैं।

जिसे दुनिया आज ‘नया’ और ‘healthy’ कहकर खोज रही है, भारत के कई हिस्सों में वह खान-पान की परंपरा का हिस्सा पहले से रहा है।

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और अब BRICS के मंच से बिहार के इन देसी स्वादों ने एक नया सवाल दुनिया के सामने रख दिया है—

क्या अगला Global Superfood किसी विदेशी laboratory से नहीं, बल्कि बिहार के किसी खेत या तालाब से निकलेगा?

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Byआभा शुक्ला
आभा शुक्ला पत्रकारिता, जनसंपर्क और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में 5+ वर्षों के अनुभव वाली पत्रकार एवं कम्युनिकेशन प्रोफेशनल हैं। पटना से जुड़ीं आभा को समाचार शोध, रिपोर्टिंग, कंटेंट डेवलपमेंट, मीडिया आउटरीच और जनसंपर्क अभियानों का अनुभव है। उन्होंने Zee News में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में समाचार शोध, रिपोर्टिंग और कंटेंट डेवलपमेंट का अनुभव हासिल किया। इसके बाद UNE Consultant में PR Executive के तौर पर मीडिया आउटरीच, PR कैंपेन और कॉर्पोरेट इवेंट्स पर काम किया। TCS में Associate के रूप में उन्होंने डेटा मैनेजमेंट, रिसर्च और सूचना प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। आभा शुक्ला तथ्यपरक, शोध-आधारित और प्रभावी पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों को पाठकों तक पहुंचाने में रुचि रखती हैं।
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