बिहार में सरकारी भुगतान को लेकर एक साथ कई मोर्चों पर सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों के वेतन-पेंशन, जीविका दीदियों की सहायता राशि, डेटा एंट्री ऑपरेटरों के इंक्रीमेंट और विकास योजनाओं के भुगतान की रफ्तार चर्चा में है। विपक्ष इसे सरकार के खजाने पर दबाव से जोड़ रहा है।
हालांकि, सिर्फ किस्तों में भुगतान होने के आधार पर बिहार को आर्थिक संकट में बताना जल्दबाजी होगी। राज्य के बजट में इन मदों के लिए बड़े प्रावधान किए गए हैं। असली सवाल भुगतान की गति और उसके पीछे की वजह को लेकर है।
वेतन-पेंशन भी चरणों में जारी
सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन भुगतान को लेकर सामने आई जानकारी ने सबसे ज्यादा सवाल खड़े किए हैं। वित्त विभाग की ओर से 2026-27 के बजट से वेतन मद की राशि अलग-अलग चरणों में जारी किए जाने की बात सामने आई है। विश्वविद्यालयों के शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों के लंबित वेतन-पेंशन भुगतान को लेकर भी चरणबद्ध राशि जारी होने की जानकारी है।
बजट में पेंशन के लिए 35,170.48 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। शिक्षा विभाग के स्थापना और प्रतिबद्ध खर्च के लिए 41,853.13 करोड़ रुपये रखे गए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब बजट में राशि तय है तो भुगतान एक साथ करने के बजाय चरणों में क्यों हो रहा है।
जीविका दीदियों को मिली 600 करोड़ की राशि
ग्रामीण बिहार की महिलाओं से जुड़ी जीविका योजना भी इस बहस का बड़ा हिस्सा है। सातवें चरण में 4 लाख जीविका दीदियों को 10-10 हजार रुपये की पहली सहायता दी गई थी। इसके बाद दूसरी किस्त का इंतजार चल रहा था।
27 अगस्त को सरकार की ओर से 600 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसमें करीब 5 लाख महिलाओं को राशि देने की बात सामने आई। इनमें 4 लाख महिलाओं को पहली किस्त और करीब 1 लाख महिलाओं को दूसरी किस्त के रूप में 20-20 हजार रुपये दिए जाने की जानकारी है। यानी राशि जारी हुई है, लेकिन भुगतान चरणों में होने से यह मुद्दा राजनीतिक बहस में आ गया है।
डेटा एंट्री ऑपरेटरों का इंक्रीमेंट अटका
संविदा पर काम कर रहे डेटा एंट्री ऑपरेटर भी अपने इंक्रीमेंट को लेकर इंतजार कर रहे हैं। बिहार राज्य डेटा एंट्री ऑपरेटर संघ ने वित्त विभाग के मंत्री को पत्र देकर सालाना 10 प्रतिशत इंक्रीमेंट लागू करने की मांग की है।
संघ का दावा है कि मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर पंचायत स्तर तक 20 हजार से ज्यादा डेटा एंट्री ऑपरेटर काम कर रहे हैं। इंक्रीमेंट का मामला लंबे समय से लंबित रहने पर कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ने की आशंका है।
बड़े प्रोजेक्ट्स की रफ्तार पर भी सवाल
वेतन और कल्याणकारी योजनाओं के अलावा विकास योजनाओं में फंड जारी होने की गति को लेकर भी चर्चा है। पथ निर्माण विभाग के बड़े प्रोजेक्ट्स में राशि चरणबद्ध तरीके से जारी होने की बात सामने आई है। विधायक मद की योजनाओं में भी स्वीकृति और भुगतान को लेकर देरी के सवाल उठे हैं।
इसका असर सीधे तौर पर विकास कार्यों की रफ्तार पर पड़ सकता है। अगर किसी योजना के लिए राशि समय पर उपलब्ध नहीं होती तो काम शुरू होने या आगे बढ़ने में देरी हो सकती है। यही वजह है कि सरकारी खर्च की गति अब राजनीतिक मुद्दा बन रही है।
युवाओं के भत्ते को लेकर भी सवाल
मुख्यमंत्री निश्चय स्वयं सहायता भत्ता योजना के तहत पात्र बेरोजगार युवाओं को अधिकतम 24 महीने तक हर महीने 1,000 रुपये देने का प्रावधान है। इस योजना में भी भुगतान में देरी की शिकायतों का जिक्र सामने आया है। युवाओं के लिए भले ही यह राशि बहुत बड़ी न हो, लेकिन नौकरी की तलाश के दौरान यात्रा, आवेदन और दूसरे जरूरी खर्चों में यह मददगार होती है।
क्या वाकई आर्थिक संकट में है सरकार?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है। विपक्ष भुगतान में देरी और किस्तों में राशि जारी होने को सरकार की आर्थिक परेशानी से जोड़ रहा है। लेकिन उपलब्ध बजट आंकड़े बताते हैं कि बिहार सरकार ने वेतन, पेंशन और दूसरी योजनाओं के लिए बड़ी रकम का प्रावधान किया है।
PRS के अनुसार 2026-27 में राज्य का कुल खर्च कर्ज चुकाने को छोड़कर करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है और राजस्व अधिशेष का भी अनुमान रखा गया है।
इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि बिहार सरकार आर्थिक संकट में है। लेकिन एक साथ कई विभागों और योजनाओं में भुगतान की रफ्तार पर सवाल उठना जरूर गंभीर विषय है।
सरकार के सामने अब यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि किस्तों में भुगतान के पीछे प्रशासनिक प्रक्रिया, बजट प्रबंधन या नकदी उपलब्धता से जुड़ी कोई समस्या। फिलहाल बिहार में सरकारी खजाने से ज्यादा चर्चा पैसे के फ्लो और भुगतान की रफ्तार की हो रही है।