पटना। बिहार में गैर-संचारी बीमारियों यानी ऐसी गंभीर बीमारियों, जिनका इलाज लंबे समय तक चल सकता है, उनकी समय पर पहचान के लिए स्वास्थ्य विभाग अब लोगों के घर तक पहुंचेगा। 2 सितंबर से ‘जांच एवं उपचार चिकित्सा आपके द्वार’ अभियान की शुरुआत होने जा रही है। तीन महीने तक चलने वाले इस विशेष अभियान में स्वास्थ्य विभाग की टीमें घर-घर जाकर लोगों की स्क्रीनिंग करेंगी और जोखिम वाले मरीजों को आगे की जांच, इलाज और फॉलो-अप से जोड़ा जाएगा।
अभियान का राज्य स्तरीय शुभारंभ 2 सितंबर 2026 को सुबह 10 बजे पटना के ऊर्जा ऑडिटोरियम में होगा। मुख्यमंत्री अभियान की शुरुआत करेंगे। कार्यक्रम में स्वास्थ्य मंत्री श्री निशांत कुमार भी मौजूद रहेंगे। इस दौरान बिहार के सभी 38 जिलों के लिए जागरूकता रथ रवाना किए जाएंगे।
यह अभियान 2 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक चलेगा।
आखिर किन बीमारियों पर सरकार का फोकस?
अभियान के केंद्र में गैर-संचारी रोग हैं। इनमें ऐसी बीमारियां शामिल हैं जो संक्रामक नहीं होतीं, लेकिन लंबे समय तक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं और कई मामलों में समय पर पहचान न होने पर जानलेवा साबित हो सकती हैं।
स्वास्थ्य विभाग इन बीमारियों की स्क्रीनिंग और प्रबंधन करेगा—
- मधुमेह
- उच्च रक्तचाप
- मुंह का कैंसर
- स्तन कैंसर
- गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर
- हृदय रोग
- नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर डिजीज
- COPD यानी फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी
30 साल से ऊपर के लोगों पर खास नजर
अभियान में 30 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की स्क्रीनिंग को खास महत्व दिया गया है। स्वास्थ्यकर्मी लोगों की ऊंचाई, वजन और BMI की जांच करेंगे। इसके जरिए मोटापा और अन्य जोखिम कारकों की पहचान की जाएगी।
जो लोग जोखिम की श्रेणी में पाए जाएंगे, उन्हें आगे की जांच और उपचार के लिए स्वास्थ्य संस्थानों से जोड़ा जाएगा। गंभीर मामलों को उच्च स्वास्थ्य केंद्रों पर रेफर किया जाएगा।
इस पूरी प्रक्रिया में टेली-कंसल्टेशन का भी इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि जरूरत पड़ने पर मरीजों को चिकित्सकीय सलाह और दवा उपलब्ध कराने में आसानी हो।
आशा और ANM की टीम पहुंचेगी घर-घर
इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में काम करने वाली फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स होंगी।
आशा, आशा फैसिलिटेटर और ANM घर-घर जाकर सर्वे करेंगी। फैमिली फोल्डर और CBAC फॉर्म के जरिए जोखिम वाले लोगों की पहचान की जाएगी। ऐसे मरीजों की लाइन-लिस्ट तैयार कर उन्हें जांच, दवा और नियमित फॉलो-अप के लिए प्रेरित किया जाएगा।
वहीं आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में CHO और ANM 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की स्क्रीनिंग करेंगे।
चिकित्सा पदाधिकारी आवश्यक जांच, OPD आधारित स्क्रीनिंग, उपचार और गंभीर मामलों के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालेंगे।
जांच से लेकर दवा तक, कई सुविधाएं मुफ्त
अभियान के तहत लोगों को निःशुल्क स्वास्थ्य परामर्श मिलेगा। जरूरत के अनुसार नजदीकी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रयोगशाला और अन्य आवश्यक नैदानिक जांच की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी।
सरकार की योजना सिर्फ मरीज की पहचान करने तक सीमित नहीं है। जोखिम वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंचाना, इलाज शुरू कराना और उसके बाद फॉलो-अप कराना भी अभियान का हिस्सा है।
स्वास्थ्य मंत्री बोले- समय पर पहचान सबसे जरूरी
स्वास्थ्य मंत्री श्री निशांत कुमार ने कहा कि अभियान का उद्देश्य गैर-संचारी रोगों की समय पर पहचान और उपचार सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और हृदय रोग सहित अन्य गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग के साथ निःशुल्क जांच, दवा और परामर्श की सुविधा दी जाएगी।
मंत्री के मुताबिक सरकार का लक्ष्य है कि कोई भी व्यक्ति समय पर जांच और उपचार से वंचित न रहे।
विश्लेषण: असली चुनौती घर तक पहुंचना नहीं, मरीज को इलाज तक पहुंचाना है
‘चिकित्सा आपके द्वार’ अभियान की घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार में बड़ी आबादी के लिए स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंच अभी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। खासकर गैर-संचारी बीमारियों में समस्या यह है कि कई लोग बीमारी के शुरुआती चरण में जांच नहीं कराते।
उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे रोग लंबे समय तक बिना गंभीर लक्षण के भी रह सकते हैं। ऐसे में घर-घर स्क्रीनिंग से उन लोगों की पहचान हो सकती है जिन्हें खुद अपनी बीमारी या जोखिम के बारे में जानकारी नहीं है।
लेकिन इस अभियान की असली सफलता सिर्फ स्क्रीनिंग के आंकड़ों से तय नहीं होगी।
मान लीजिए किसी गांव में 1000 लोगों की स्क्रीनिंग हुई और 100 लोग जोखिम वाले मिले। असली सवाल यह होगा कि उन 100 लोगों में से कितने लोगों की आगे की जांच हुई? कितनों को दवा मिली? कितने मरीज नियमित फॉलो-अप में आए? और गंभीर मरीजों को समय पर उच्च स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया गया या नहीं?
यहीं से अभियान की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू होगी।
दवा की उपलब्धता और फॉलो-अप बनेगा गेमचेंजर
घर-घर जांच के बाद अगर मरीज को स्वास्थ्य केंद्र पर दवा उपलब्ध नहीं होती या जांच के लिए उसे कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, तो स्क्रीनिंग का लाभ सीमित रह जाएगा।
इसी तरह कैंसर या हृदय रोग जैसे गंभीर मामलों में केवल प्राथमिक स्तर पर पहचान काफी नहीं होगी। ऐसे मरीजों के लिए रेफरल सिस्टम, विशेषज्ञ चिकित्सा, जांच और लगातार फॉलो-अप मजबूत होना जरूरी है।
इसलिए अभियान की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह होना चाहिए कि स्क्रीनिंग से मिले मरीजों को उपचार की अगली सीढ़ी तक कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से पहुंचाया गया।
रियल-टाइम डेटा से जवाबदेही बढ़ सकती है
स्वास्थ्य विभाग ने अभियान के दौरान आंकड़ों की NCD पोर्टल पर रियल-टाइम एंट्री का निर्देश दिया है। इससे अभियान की प्रगति की निगरानी बेहतर तरीके से की जा सकती है।
प्रखंड और जिला स्तर पर अधिकारियों को नियमित समीक्षा की जिम्मेदारी दी गई है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किस इलाके में स्क्रीनिंग कम हुई, कहां मानव संसाधन की कमी है और कहां दवाओं की उपलब्धता में समस्या है।
हालांकि डेटा दर्ज करना तभी उपयोगी होगा जब उसका इस्तेमाल कमियों को पहचानने और तुरंत सुधार करने के लिए भी किया जाए।
तीन महीने का अभियान, लेकिन जरूरत लंबे सिस्टम की
2 सितंबर से 30 नवंबर तक चलने वाला यह अभियान एक बड़ा विशेष अभियान है, लेकिन गैर-संचारी रोगों की चुनौती तीन महीने में खत्म नहीं होगी।
इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि 30 नवंबर के बाद क्या होगा?
अगर अभियान के दौरान तैयार किए गए मरीजों के रिकॉर्ड, लाइन-लिस्ट और फॉलो-अप सिस्टम को नियमित स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बना दिया जाता है, तो इसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है। लेकिन अगर स्क्रीनिंग अभियान खत्म होने के साथ ही निगरानी और फॉलो-अप कमजोर पड़ गया, तो बड़ी संख्या में पहचाने गए मरीज दोबारा स्वास्थ्य व्यवस्था से बाहर हो सकते हैं।
निष्कर्ष
‘जांच एवं उपचार चिकित्सा आपके द्वार’ अभियान बिहार में बीमारी होने के बाद अस्पताल पहुंचने की बजाय बीमारी की समय रहते पहचान करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
घर-घर स्क्रीनिंग से छिपे हुए मरीजों की पहचान का रास्ता खुलेगा, लेकिन इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार पहचान किए गए मरीजों को जांच → उपचार → दवा → रेफरल → फॉलो-अप की पूरी श्रृंखला से कितनी मजबूती से जोड़ पाती है।
अगर यह कड़ी मजबूत रही, तो तीन महीने का अभियान महज एक सरकारी कार्यक्रम न रहकर बिहार की प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था में लंबे समय का बदलाव ला सकता है।