विशेष लेख | 7 नवंबर | आज का इतिहास | विश्व इतिहास एवं राजनीति
20वीं सदी के इतिहास को निर्णायक रूप से बदल देने वाली घटनाओं में रूसी अक्टूबर क्रांति का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 7 नवंबर 1917 को आधुनिक ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार रूस की राजधानी पेट्रोग्राद (आज का सेंट पीटर्सबर्ग) में व्लादिमीर इल्यिच लेनिन के नेतृत्व वाली बोल्शेविक पार्टी ने अस्थायी सरकार को सत्ता से हटाकर राजधानी के प्रमुख संस्थानों और शासन-तंत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह सत्ता-परिवर्तन रूस की फरवरी क्रांति के बाद बनी अस्थायी व्यवस्था का अंत था और दुनिया के पहले समाजवादी राज्य की स्थापना की दिशा में निर्णायक कदम बना।
इस घटना को ‘अक्टूबर क्रांति’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर लागू था। उसके अनुसार निर्णायक घटनाएँ 25 अक्टूबर 1917 को हुईं, जबकि पश्चिमी यूरोप सहित अधिकांश दुनिया में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार वह तारीख 7 नवंबर थी। कैलेंडर का यह अंतर इस ऐतिहासिक नाम और तारीख़ को समझने की कुंजी है।
क्रांति की पृष्ठभूमि: युद्ध, भूख और साम्राज्य का संकट
1917 की रूसी क्रांति को समझने के लिए उस समय के रूस की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखना आवश्यक है। रूस पर रोमानोव राजवंश का शासन था और जार निकोलस द्वितीय निरंकुश सत्ता के केंद्र में थे। देश में औद्योगिक श्रमिकों की कठिन परिस्थितियाँ, किसानों में भूमि की माँग, खाद्य संकट, महँगाई और राजनीतिक अधिकारों की कमी लंबे समय से असंतोष पैदा कर रहे थे। प्रथम विश्वयुद्ध ने इन समस्याओं को और गहरा कर दिया। युद्ध में भारी सैन्य नुकसान, रसद की विफलता और शहरों में भोजन की कमी ने शासन के प्रति जनता और सेना के विश्वास को कमजोर किया।

फरवरी 1917 में पेट्रोग्राद में रोटी की कमी और युद्ध के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुए। श्रमिक हड़तालों के साथ सैनिकों के एक हिस्से ने भी प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने के आदेश मानने से इनकार कर दिया और विद्रोह में शामिल हो गया। जार निकोलस द्वितीय ने मार्च 1917 में सिंहासन छोड़ दिया। इसके साथ ही सदियों पुरानी रोमानोव राजशाही का अंत हुआ। रूस में अस्थायी सरकार बनी, लेकिन उसके साथ-साथ श्रमिकों और सैनिकों की परिषदें—सोवियत—भी प्रभावशाली बनी रहीं।
अस्थायी सरकार और दोहरी सत्ता की समस्या
जारशाही के पतन के बाद बनी अस्थायी सरकार ने राजनीतिक स्वतंत्रताओं और कुछ सुधारों का वादा किया, लेकिन उसने रूस को प्रथम विश्वयुद्ध से तत्काल बाहर नहीं निकाला। युद्ध जारी रखने के निर्णय ने सैनिकों, श्रमिकों और किसानों में असंतोष बढ़ाया। किसानों को भूमि का प्रश्न टालने से निराशा हुई और शहरों में भोजन तथा ईंधन की कमी बनी रही। दूसरी ओर, पेट्रोग्राद सोवियत जैसी परिषदों के पास श्रमिकों और सैनिकों का वास्तविक समर्थन था। इस स्थिति को अक्सर ‘दोहरी सत्ता’ कहा जाता है—एक ओर औपचारिक अस्थायी सरकार और दूसरी ओर जनता के संगठित वर्गों पर प्रभाव रखने वाली सोवियतें।
बोल्शेविक पार्टी, जो रूसी समाजवादी आंदोलन की एक धारा थी, ने ‘शांति, भूमि और रोटी’ जैसे सरल और प्रभावी नारों के जरिए समर्थन जुटाया। लेनिन ने अप्रैल 1917 में रूस लौटने के बाद अस्थायी सरकार को समर्थन न देने और सत्ता सोवियतों को हस्तांतरित करने की रणनीति पर जोर दिया। बोल्शेविकों का प्रभाव विशेष रूप से पेट्रोग्राद और मॉस्को के श्रमिकों तथा सैनिकों के बीच बढ़ा। सितंबर तक पेट्रोग्राद और मॉस्को की सोवियतों में उनका प्रभाव निर्णायक हो गया।
लेनिन, ट्रॉट्स्की और सत्ता पर कब्जे की योजना
अक्टूबर 1917 तक बोल्शेविक नेतृत्व के भीतर यह बहस तेज हो गई थी कि सत्ता कब और किस तरीके से हासिल की जाए। लेनिन ने सशस्त्र विद्रोह के पक्ष में दबाव बनाया। पेट्रोग्राद सोवियत के अध्यक्ष लियोन ट्रॉट्स्की ने सैन्य-राजनीतिक संगठन और रणनीति तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पेट्रोग्राद सोवियत की सैन्य क्रांतिकारी समिति (Military Revolutionary Committee) विद्रोह के संचालन का प्रमुख केंद्र बनी। इसमें बोल्शेविक समर्थक सैनिक, नाविक और श्रमिक रेड गार्ड शामिल थे।

अस्थायी सरकार के प्रमुख अलेक्जेंडर केरेन्स्की के प्रशासन ने बोल्शेविक अखबारों के मुद्रणालय बंद कराने और सैन्य क्रांतिकारी समिति के सदस्यों पर कार्रवाई करने की कोशिश की। इससे टकराव और तेज हो गया। 24 अक्टूबर (6 नवंबर ग्रेगोरियन) की रात से बोल्शेविक समर्थक दस्तों ने पेट्रोग्राद में पुलों, रेलवे स्टेशनों, डाक-तार केंद्रों, टेलीफोन एक्सचेंज, बिजलीघर और सरकारी संचार सुविधाओं जैसे रणनीतिक ठिकानों पर नियंत्रण करना शुरू किया। कई स्थानों पर प्रतिरोध सीमित रहा।
विंटर पैलेस पर कार्रवाई और अस्थायी सरकार का पतन
25 अक्टूबर (7 नवंबर) तक पेट्रोग्राद के अधिकांश प्रमुख संस्थान विद्रोहियों के नियंत्रण में आ चुके थे। अस्थायी सरकार का मुख्य केंद्र विंटर पैलेस था, जहाँ उसके मंत्री मौजूद थे। केरेन्स्की राजधानी से बाहर निकलकर सरकार के समर्थन में सैनिक जुटाने की कोशिश में लगे थे। उसी दिन पेट्रोग्राद में सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस की बैठक भी शुरू हुई।
विंटर पैलेस पर कार्रवाई 25 अक्टूबर की रात और 26 अक्टूबर (7–8 नवंबर) की शुरुआती घड़ियों में हुई। रेड गार्ड, सैनिकों और नाविकों के दस्तों ने महल में प्रवेश कर अस्थायी सरकार के मंत्रियों को गिरफ्तार कर लिया। लोकप्रिय चित्रणों में इसे एक विशाल और भीषण ‘महल पर धावा’ बताकर दिखाया गया है, लेकिन ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार पेट्रोग्राद में निर्णायक कब्जे के दौरान कई स्थानों पर प्रतिरोध अपेक्षाकृत कम था। बाद में सोवियत काल के फिल्मकारों और आधिकारिक स्मृतियों ने इस घटना को अधिक नाटकीय रूप दिया।
लेनिन ने सोवियत कांग्रेस को संबोधित करते हुए घोषणा की कि श्रमिकों और किसानों की क्रांति सफल हो गई है। कांग्रेस में बोल्शेविकों की कार्रवाई के विरोध में मेंशेविकों और कुछ अन्य समाजवादी प्रतिनिधियों ने बैठक छोड़ दी। कांग्रेस में बचे प्रतिनिधियों ने सत्ता के नए ढाँचे और तत्काल शांति तथा भूमि से संबंधित प्रस्तावों पर काम शुरू किया।

पहले फैसले: शांति और भूमि के प्रश्न
नई बोल्शेविक सरकार ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद दो प्रमुख घोषणाएँ कीं। ‘शांति संबंधी डिक्री’ में युद्धरत देशों से बिना विलय और क्षतिपूर्ति के शांति वार्ता शुरू करने की अपील की गई। ‘भूमि संबंधी डिक्री’ ने जमींदारी व्यवस्था के उन्मूलन और किसानों की भूमि संबंधी माँगों को मान्यता देने की दिशा में कदम बढ़ाया। इन घोषणाओं का उद्देश्य उन सैनिकों, किसानों और श्रमिकों का समर्थन बनाए रखना था, जिनकी प्रमुख माँगें युद्ध का अंत, भूमि और बेहतर जीवन-स्थितियाँ थीं।
हालाँकि सत्ता पर कब्जा कर लेना पूरे रूस पर तत्काल नियंत्रण स्थापित कर लेने के समान नहीं था। मॉस्को सहित कई क्षेत्रों में बोल्शेविकों को विरोध और संघर्ष का सामना करना पड़ा। देश के अनेक हिस्सों में अलग-अलग राजनीतिक और राष्ट्रीय शक्तियाँ सक्रिय थीं। नई सरकार को प्रशासन, अर्थव्यवस्था और सेना पर नियंत्रण स्थापित करने की कठिन चुनौती मिली।
प्रथम विश्वयुद्ध से रूस की वापसी
बोल्शेविक नेतृत्व ने युद्ध से बाहर निकलने को प्राथमिकता दी। जर्मनी और उसके सहयोगियों के साथ बातचीत के बाद 3 मार्च 1918 को ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि पर हस्ताक्षर हुए। इसके तहत रूस ने व्यापक भू-भाग और संसाधनों पर नियंत्रण छोड़ते हुए प्रथम विश्वयुद्ध से अपनी भागीदारी समाप्त की। इस संधि ने युद्ध से थकी जनता को राहत देने का वादा पूरा किया, लेकिन रूस के भीतर इसे लेकर तीखा विरोध भी हुआ। कई राजनीतिक समूहों ने इसे राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध अपमानजनक समझौता माना।
गृहयुद्ध और नई सत्ता की चुनौतियाँ
अक्टूबर क्रांति के बाद रूस में राजनीतिक संघर्ष समाप्त नहीं हुआ, बल्कि वह व्यापक गृहयुद्ध में बदल गया। बोल्शेविकों की रेड आर्मी के विरुद्ध श्वेत सेनाओं और अनेक अन्य विरोधी समूहों ने मोर्चा खोला। इन समूहों के उद्देश्य एक जैसे नहीं थे—कुछ राजशाही की वापसी चाहते थे, कुछ उदारवादी या समाजवादी विकल्प के पक्षधर थे, जबकि कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय आंदोलन स्वतंत्रता या स्वायत्तता की माँग कर रहे थे। विदेशी शक्तियों ने भी गृहयुद्ध में हस्तक्षेप किया।

1918 से 1921 के बीच चले इस संघर्ष में भारी जनहानि, विस्थापन, अकाल और आर्थिक तबाही हुई। बोल्शेविक सत्ता ने राजनीतिक विरोधियों पर कठोर कार्रवाई की और एक केंद्रीकृत राज्य व्यवस्था विकसित की। 1922 में रूसी सोवियत संघीय समाजवादी गणराज्य सहित कई सोवियत गणराज्यों के संघ से सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ (USSR) बना। इस तरह 1917 की क्रांति ने एक नए राज्य और वैश्विक राजनीति की नई धुरी के निर्माण की नींव रखी।
दुनिया पर अक्टूबर क्रांति का प्रभाव
रूसी क्रांति का प्रभाव रूस की सीमाओं से बहुत आगे तक पहुँचा। इसने दुनिया भर के समाजवादी, साम्यवादी, श्रमिक और उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों को प्रेरित किया। कई देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों का गठन हुआ और मजदूरों के अधिकार, भूमि सुधार, राज्य की भूमिका तथा आर्थिक समानता पर बहस तेज हुई। दूसरी ओर, पूँजीवादी और उदार लोकतांत्रिक देशों में साम्यवाद के प्रसार को लेकर चिंता और विरोध बढ़ा। 20वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति, विशेषकर शीतयुद्ध की पृष्ठभूमि, को समझने में 1917 की क्रांति एक केंद्रीय घटना है।
‘अक्टूबर’ क्रांति नवंबर में क्यों?
1917 में रूस जूलियन कैलेंडर का उपयोग करता था, जबकि पश्चिमी यूरोप में ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू था। दोनों कैलेंडरों के बीच उस समय 13 दिनों का अंतर था। इसलिए रूस के पुराने कैलेंडर की 25 अक्टूबर 1917 की तारीख ग्रेगोरियन कैलेंडर में 7 नवंबर 1917 थी। 1918 में सोवियत सरकार ने ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनाया, लेकिन क्रांति का ऐतिहासिक नाम ‘अक्टूबर क्रांति’ बना रहा। इसीलिए कई इतिहास पुस्तकों में दोनों तिथियाँ साथ लिखी जाती हैं—25 अक्टूबर (पुरानी शैली) और 7 नवंबर (नई शैली)।
इतिहास में विरासत और बहस
अक्टूबर क्रांति को लेकर इतिहासकारों और राजनीतिक विचारधाराओं में अलग-अलग व्याख्याएँ रही हैं। कुछ इसे युद्ध, असमानता और जारशाही के दमन के विरुद्ध श्रमिकों तथा किसानों की क्रांतिकारी जीत मानते हैं। दूसरे इतिहासकार इसे एक संगठित अल्पसंख्यक दल द्वारा लोकतांत्रिक रूप से कमजोर अस्थायी सरकार को हटाकर सत्ता पर कब्जा करने की कार्रवाई के रूप में देखते हैं। वास्तविकता यह है कि क्रांति व्यापक सामाजिक असंतोष की पृष्ठभूमि में हुई, लेकिन सत्ता हस्तांतरण का निर्णायक संचालन बोल्शेविक नेतृत्व और उसके संगठित सशस्त्र समर्थकों ने किया।

7 नवंबर 1917 की घटना ने रूस की राजनीतिक दिशा बदल दी और विश्व इतिहास में समाजवाद, साम्यवाद, क्रांति तथा राज्य-सत्ता की भूमिका पर नई बहसों को जन्म दिया। लेनिन और बोल्शेविकों का सत्ता में आना केवल एक सरकार का पतन नहीं था; यह 20वीं सदी के वैश्विक राजनीतिक इतिहास की दिशा बदलने वाला मोड़ साबित हुआ।
