सारण/Chhapra। बिहार के छपरा की रहने वाली मीरा कुमारी ने सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बीच खेल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। बिचला तेलपा की संकरी गलियों से शुरू हुआ उनका साइकिलिंग का सफर अब राष्ट्रीय स्तर की माउंटेन साइकिलिंग प्रतियोगिता तक पहुंच चुका है।
अपनी मेहनत और लगातार अभ्यास के दम पर मीरा ने राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बिहार का प्रतिनिधित्व करते हुए सातवां स्थान हासिल किया।
मीरा की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं है, बल्कि उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जिनके सामने आर्थिक परेशानियां उनके सपनों की राह में बड़ी बाधा बनकर खड़ी होती हैं। घर की सीमित आमदनी के बावजूद मीरा ने साइकिलिंग को छोड़ा नहीं। उनके पास अपनी रेसिंग साइकिल तक नहीं थी, लेकिन मदद मिली तो उन्होंने उस मौके को अपनी मेहनत में बदल दिया।
सहेलियों के साथ लगाती थीं साइकिल की रेस, यहीं से शुरू हुआ सफर
मीरा कुमारी छपरा शहर के बिचला तेलपा मोहल्ले की रहने वाली हैं। उन्हें बचपन से ही साइकिल चलाने का शौक था। शुरुआत में यह उनके लिए महज मनोरंजन और दोस्तों के साथ समय बिताने का जरिया था। वह अपनी सहेलियों के साथ पुलिस लाइन जाती थीं और वहां तेज साइकिल चलाने की होड़ लगाती थीं।

धीरे-धीरे यही शौक उनके लिए गंभीर लक्ष्य में बदल गया। इसी दौरान उनकी मुलाकात फुटबॉल खिलाड़ी और प्रशिक्षक ममता कुमारी से हुई। ममता ने मीरा की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें साइकिलिंग में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद मीरा ने नियमित अभ्यास को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया।
मां घरों में करती हैं काम, फिर भी बेटी के सपनों को मिली रफ्तार
मीरा के संघर्ष की सबसे बड़ी तस्वीर उनके पारिवारिक हालात से सामने आती है। उनकी मां रिंकू देवी दूसरों के घरों में काम करके परिवार का भरण-पोषण करती हैं। सीमित आमदनी में परिवार की जरूरतें पूरी करना ही चुनौती थी। ऐसे में खेल के लिए महंगी साइकिल और अन्य संसाधन जुटाना आसान नहीं था।
मीरा के सामने सबसे बड़ी समस्या उनकी अपनी रेसिंग साइकिल को लेकर थी। उनके पास प्रतियोगिताओं के अनुरूप साइकिल नहीं थी। ऐसे समय में साथी स्पोर्ट्स क्लब ने उन्हें रेसिंग साइकिल उपलब्ध कराई। इस सहयोग ने मीरा को अभ्यास जारी रखने और प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने का अवसर दिया।
यह सहयोग मीरा के सफर में अहम साबित हुआ। संसाधन मिलने के बाद उन्होंने अभ्यास को और गंभीरता से लिया और धीरे-धीरे जिला और राज्य स्तर से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय प्रतियोगिता तक अपनी जगह बनाई।

राज्य स्तर पर पदक, फिर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बिहार का प्रतिनिधित्व
मीरा की मेहनत का असर प्रतियोगिताओं में भी दिखाई दिया। उन्होंने राज्य स्तरीय माउंटेन साइकिलिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल किया। इसके अलावा राज्य स्तरीय अस्मिता साइकिलिंग प्रतियोगिता में कांस्य पदक भी उनके नाम रहा। इन उपलब्धियों ने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया और राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का रास्ता तैयार किया।
इसके बाद मीरा ने ओडिशा में आयोजित 34वीं राष्ट्रीय माउंटेन साइकिलिंग प्रतियोगिता में बिहार का प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण था, लेकिन सीमित सुविधाओं के बावजूद उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए सातवां स्थान हासिल किया।
यह उपलब्धि उनके लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बेहद साधारण परिस्थितियों से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक का सफर तय किया है।
अब नजर राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पदक पर
मीरा के लिए सातवां स्थान मंजिल नहीं है। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रदर्शन के बाद उनका लक्ष्य अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतना है। लगातार अभ्यास और बेहतर प्रदर्शन के जरिए वह अपने खेल को अगले स्तर तक ले जाना चाहती हैं।

मीरा की कहानी यह बताती है कि किसी खिलाड़ी की प्रतिभा केवल महंगे संसाधनों या बेहतर सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। सही मार्गदर्शन, अवसर और लगातार मेहनत मिलने पर छोटे शहर और सीमित साधनों से आने वाला खिलाड़ी भी बड़े मंच पर अपनी जगह बना सकता है।
छपरा की मीरा कुमारी का सफर अभी जारी है। बिचला तेलपा की गलियों में सहेलियों के साथ साइकिल चलाने से शुरू हुई कहानी अब राष्ट्रीय प्रतियोगिता के सातवें स्थान तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में मीरा अपने प्रदर्शन को और बेहतर बनाकर पदक जीतने की कोशिश करेंगी।
उनकी उपलब्धि न सिर्फ उनके परिवार बल्कि बिहार के खेल जगत के लिए भी उम्मीद की एक नई तस्वीर पेश करती है।
