दो दिवसीय युवा इतिहासकार राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा पर हुआ मंथन
Rohtas/सासाराम। जमुहार स्थित गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय में ‘इतिहास लेखन की भारतीय परंपरा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय दशम युवा इतिहासकार राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारतीय इतिहास लेखन, उसके स्रोतों और स्थानीय इतिहास के शोध को लेकर व्यापक चर्चा हुई।
संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से इतिहासकारों, शोधार्थियों और शिक्षाविदों ने भाग लिया। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, कार्यक्रम में युवा इतिहासकारों के लिए भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा और उसके विभिन्न आयामों पर अकादमिक विमर्श किया गया।
विश्वविद्यालयों में स्थानीय इतिहास पर शोध की जरूरत
संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए उच्च शिक्षा मंत्री संजय सिंह टाइगर ने युवा इतिहासकारों से विश्वविद्यालयों में स्थानीय इतिहास लेखन और उससे जुड़े शोध की परंपरा को विकसित करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि भारत जैसे प्राचीन और विविधतापूर्ण देश में इतिहास को केवल राजाओं के शासन, युद्धों और राजनीतिक घटनाओं के विवरण तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारतीय दृष्टि में इतिहास का संबंध धर्म, नीति, लोकजीवन, संस्कृति, प्रकृति, समाज और मानवीय मूल्यों से भी रहा है।

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में इतिहास अतीत और वर्तमान को भविष्य से जोड़ने वाला सेतु रहा है। भारतीय इतिहास लेखन की जड़ों को वेदों से लेकर पुराणों तक देखा जा सकता है। वेदों में तत्कालीन समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीतिक संस्थाओं और जीवन पद्धति से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं।
रामायण-महाभारत सहित विभिन्न स्रोतों का उल्लेख
मंत्री ने कहा कि रामायण और महाभारत अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक और सांस्कृतिक जीवन को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
वंशावलियों में राजवंशों, भूगोल, तीर्थ और सांस्कृतिक परंपराओं से संबंधित जानकारियां मिलती हैं। भारतीय इतिहास की सामग्री केवल राजकीय अभिलेखों तक सीमित नहीं रही, बल्कि महाकाव्यों, पुराणों, धार्मिक ग्रंथों, लोककथाओं और मौखिक परंपराओं में भी संरक्षित रही है। बौद्ध और जैन ग्रंथ भी इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इतिहास के पुनर्लेखन पर भी हुई चर्चा
शिक्षा मंत्री मिथलेश तिवारी ने कहा कि भारत ने लंबे समय में अनेक चुनौतियों का सामना किया है और अपनी सभ्यता तथा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखा है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों तक इतिहास के तथ्यों को पहुंचाना जरूरी है। उनके अनुसार, यदि नई पीढ़ी को अपने इतिहास की जानकारी नहीं होगी तो विकसित भारत की परिकल्पना को मजबूत आधार देना कठिन होगा।
उन्होंने शिक्षा को विकसित भारत की नींव बताते हुए कहा कि शिक्षा में भारतीय दर्शन, सभ्यता और संस्कृति की समझ भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्थानीय उदाहरण देते हुए इतिहास, स्थानों और उनके नामों को देखने की दृष्टि पर भी चर्चा की और नई पीढ़ी को अपने इतिहास से परिचित कराने की आवश्यकता पर जोर दिया।
युवा शोधकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संगठन सचिव बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि इतिहास किसी राष्ट्र की केवल अतीत की कथा नहीं, बल्कि उसकी सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना और भविष्य की दिशा का आधार भी है। उन्होंने कहा कि युवा शोधकर्ताओं में नए प्रश्न उठाने, आवश्यक स्रोतों की तलाश करने और स्थापित धारणाओं का प्रमाणों के आधार पर पुनर्परीक्षण करने की क्षमता होती है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि राष्ट्रीय संगोष्ठी युवा इतिहासकारों और शोधार्थियों को संवाद, विमर्श और शोध-विचारों के आदान-प्रदान का व्यापक मंच उपलब्ध कराएगी।
300 शोध-पत्र आने की जानकारी
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने कहा कि संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन पर नए तथ्यों और विचारों का विश्लेषण करना है। वहीं युवा इतिहासकार प्रमुख प्रो. विकास सिंह ने बताया कि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना लंबे समय से इतिहास लेखन के क्षेत्र में कार्य कर रही है। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी में 300 शोध-पत्र प्राप्त हुए हैं और कार्यक्रम को 16 सत्रों में आयोजित किया जा रहा है।
दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर के.एन. सिंह ने युवा इतिहासकारों से राष्ट्रीय शिक्षा नीति को कक्षा और परिसर तक पहुंचाने के साथ-साथ कक्षा में होने वाली चर्चा को समुदाय तक ले जाने की अपील की।
आठ तकनीकी सत्रों में शोध-पत्र प्रस्तुत
उद्घाटन सत्र के बाद संगोष्ठी के प्रथम दिन आठ तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। इनमें देश के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे शोधार्थियों और इतिहासकारों ने भाग लिया। इन सत्रों में 200 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। शोध-पत्रों में भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा, इतिहास के स्रोत, इतिहास-बोध, भारतीय इतिहास-दृष्टि और इतिहास लेखन से जुड़े विभिन्न विषय शामिल रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और पुष्पांजलि से हुआ। इसके बाद संकल्प मंत्र और स्वागत भाषण संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. राम प्रकाश शर्मा ने प्रस्तुत किया।
विश्वविद्यालय के संस्थापक गोपाल नारायण सिंह ने अध्यक्षीय उद्बोधन में रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों से भारतीय इतिहास और कर्तव्यबोध की सीख लेने की बात कही।
धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी के संयोजक डॉ. मुकेश कुमार ने किया, जबकि मंच संचालन डॉ. निर्मल पांडेय ने किया। आयोजन में इतिहास संकलन समिति दक्षिण बिहार प्रांत के कार्यकर्ताओं और विश्वविद्यालय प्रशासन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
आयोजकों के अनुसार, संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा, भारतीय इतिहास-दृष्टि और इतिहास लेखन की स्वदेशी पद्धतियों पर व्यापक अकादमिक विमर्श को आगे बढ़ाना है।