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Home - धर्म - करमा पूजा: प्रकृति, कर्म और भाई-बहन के प्रेम का प्राचीन लोकपर्व

करमा पूजा: प्रकृति, कर्म और भाई-बहन के प्रेम का प्राचीन लोकपर्व

Last updated: सितम्बर 22, 2026 10:57 अपराह्न
By : Dinman News Network
Published on : 1 दिन पहले
करमा पूजा में करम वृक्ष की डाल और पारंपरिक लोक नृत्य
करमा पर्व प्रकृति, कृषि और भाई-बहन के प्रेम से जुड़ा प्रमुख लोकपर्व है। (AI Generated Image)
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करमा पूजा को लोक में करमा-धरमा भी कहा जाता है। यह प्रकृति यानी पर्यावरण संरक्षण, श्रम की महत्ता और भाई-बहन के प्रेम का एक प्रमुख आदिवासी लोक पर्व है, जिसे मुख्य रूप से झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, प . बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है।

इसकी परंपरा लिखित इतिहास से भी पुरानी मानी जाती है। इसमें करम वृक्ष की पूजा करम देवता मानकर अच्छी फसल और पारिवारिक खुशहाली के निमित्त की जाती है।

क्यों मनाते हैं?

यह कृषि का त्योहार है। किसान अच्छी फसल, भूमि की उर्वरता और वर्षा के लिए प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। इसके अलावा इस दिन शक्ति, युवावस्था और भाग्य के प्रतीक ‘कर्म देवता’ (करम पेड़ की डाल) की पूजा की जाती है।

करमा पूजा 2026 और करमा-धरमा लोकपर्व
करमा पूजा 2026 और करमा-धरमा लोकपर्व

इसके साथ ही बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए उपवास रखती हैं और करमा-धरमा की कथा सुनती हैं।

कैसे मनाते हैं?

पर्व से 7 से 9 दिन पहले कुंवारी लड़कियां बालू और अनाज डालकर टोकरी में ‘जावा’ (अंकुरित अनाज) उगाती हैं। इसके बाद पर्व के दिन युवा जंगल जाकर विधि-विधान से करम पेड़ की तीन डालियां काट कर लाते हैं।

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फिर गांव के अखाड़े या आंगन में करम की डाल को गाड़कर फूलों, दीयों और खीरा से पूजा की जाती है। इसके बाद धान के अक्षत हाथ में लेकर करमा-धरमा की कथा सुनी जाती है।

रातभर ढोल, मांदर और नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक ‘करम नृत्य’ किया जाता है। अगले दिन करम की डाल को नदी या तालाब में विसर्जित किया जाता है।

करमा पूजा 2026 और करमा-धरमा लोकपर्व
करमा पूजा 2026 और करमा-धरमा लोकपर्व

इसकी क्या विशेषता है?

प्रकृति पूजा: इसमें किसी मूर्ति की नहीं बल्कि जीवंत पेड़ की डाल की पूजा होती है, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है।

अंकुरित जावा: पूजा में अर्पित ‘जावा’ नए जीवन, उर्वरता और प्रकृति के पुनरुत्थान का प्रतीक होता है।

पारंपरिक पकवान: इस अवसर पर धुस्का, ठेकुआ, अरसा और चावल की खीर जैसे विशेष पकवान बनाए जाते हैं।

इसका सामाजिक महत्व

सामुदायिक एकता: यह पर्व जात-पात और भेदभाद से ऊपर उठकर पूरे समाज और परिवार को एक सूत्र में बांधता है।

सांस्कृतिक धरोहर: लोकगीत, नृत्य और कथाओं के माध्यम से आदिवासी संस्कृति और मूल्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं।

पारिस्थितिकी संतुलन: यह हमें सिखाता है कि जंगल, नदियां, मिट्टी और जीव-जंतुओं के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।

करमा पर्व में कर्म, प्रकृति और समरसता का संदेश

स्पष्ट है कि यह लोकपर्व अति प्राचीन, पर्यावरण संरक्षण, भाईचारे का संदेश देने वाला कृषि संस्कृति के माध्यम से आर्थिक समृद्धि लाने के साथ-साथ कर्म की महत्ता को प्रतिष्ठित करता है। यहां यह श्रीमद्भागवत गीता के कर्मण्येवाधिकारस्ते और फ्रांसीसी क्रांति के बंधुत्व के साथ-साथ वसुधैव कुटुंबकम् से आबद्ध दिखता है।

इससे सहमति या असहमति हो सकती है, पर इतना तो तय है कि हमारा लोक सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समुन्नति के दृष्टिकोण से शुरू से ही काफी परिपक्व और भारतीय समरस विचार का संवाहक रहा है।

इस उत्तर आधुनिक दौर में भी लोक में जीवन जीवंत है। इसलिए कर्म से धर्म को प्रतिष्ठित करने वाले इस लोकपर्व पर आज रात हम सब मांदर की थाप पर जमकर झूमें, नाचें, गाएं।

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