Dinman Times
  • ट्रेंडिंग
  • फोटो
  • वीडियो
  • वेब स्टोरीज
Sign In
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
Reading: बच्चा के दूध नै मिलै छै बाबू… दूध नै पिला पर बच्चा कानै छै, कैसे बच्चा पालियै? अब बच्चों की भूख ने मां को तोड़ दिया
साझा करें
Notification
Font ResizerAa
Dinman Times
  • वेब स्टोरीज
  • होम
  • देश
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
Search
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
Follow US
© 2024. All Rights Reserved.

Home - देश - बच्चा के दूध नै मिलै छै बाबू… दूध नै पिला पर बच्चा कानै छै, कैसे बच्चा पालियै? अब बच्चों की भूख ने मां को तोड़ दिया

बच्चा के दूध नै मिलै छै बाबू… दूध नै पिला पर बच्चा कानै छै, कैसे बच्चा पालियै? अब बच्चों की भूख ने मां को तोड़ दिया

प्रशांत कुमार
Last updated: सितम्बर 11, 2026 1:14 पूर्वाह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 20 घंटे पहले
मुंगेर बाढ़ राहत शिविर में बच्चों को दूध नहीं मिलने से परेशान मां
मुंगेर बाढ़ राहत शिविर में बच्चों को दूध नहीं मिलने से परेशान मां
साझा करें

मुंगेर के राहत शिविरों में बाढ़ पीड़ित महिलाओं की आंखों में घर उजड़ने से बड़ा दर्द—गोद में बिलखते बच्चों के लिए दूध नहीं; दो वक्त का खाना मिल रहा, लेकिन नौनिहालों का पोषण अधूरा

मुंगेर – राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता में

दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे,
दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे।
दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊँ दूध कहाँ किस घर से,
दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूँदें टपका अम्बर से।

भूख और अभाव के बीच खड़ा वह सवाल आज भी उतना ही बेचैन करता है—जब मां के पास अपने बच्चे को देने के लिए दूध तक न हो, तो वह जाए तो जाए कहां? दिनकर ने जिस सामाजिक पीड़ा और असमानता को शब्द दिए थे, मुंगेर के बाढ़ राहत शिविरों में वही सवाल आज किसी कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि एक मां की कांपती आवाज बनकर सामने आ रहा है।

बच्चा के दूध नै मिलै छै बाबू… दूध नै पिला पर बच्चा कानै छै, कैसे बच्चा पालियै?

यह सवाल समाहरणालय के सामने केसी सुरेंद्र बाबू पार्क में बैठी उस मां का है, जिसने बाढ़ में अपना घर खो दिया है। उसके पास अब न अपना आंगन है, न चूल्हा और न बच्चे के लिए दूध। उसके पास बची है तो बस बच्चे को सीने से लगाकर चुप कराने की कोशिश।

बाढ़ ने घर छीना, राहत शिविर ने छत दी… लेकिन बच्चे के हिस्से का दूध कहां है?

मुंगेर में बाढ़ का पानी लोगों के घरों में घुसा तो परिवारों को अपना सब कुछ छोड़कर ऊंचे स्थानों और राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। समाहरणालय के सामने केसी सुरेंद्र बाबू पार्क और जिला स्कूल राहत शिविर में ऐसे दर्जनों परिवार रह रहे हैं।

ये भी पढ़े

धर्म और विज्ञान अलग नहीं: राजीव शुक्ला
औरंगाबाद में CSP संचालक से डेढ़ लाख की लूट, ग्रामीणों ने पीछा कर दो बदमाशों को दबोचा
इरिमी-बीसीई के बीच पांच साल का करार, इंजीनियरिंग छात्रों को मिलेगी रेलवे तकनीक की ट्रेनिंग
हस्तांतरण के बाद सामने आईं खामियां, मंत्री ने पंचायत सरकार भवन की गुणवत्ता पर उठाए सवाल

बड़ों के लिए किसी तरह भोजन की व्यवस्था हो रही है, लेकिन छोटे बच्चों की जरूरत पर सवाल खड़ा हो गया है।

सीताचरण निवासी रिंकू देवी करीब एक सप्ताह से पति साजन सिंह, मां जगता देवी और दो छोटे बच्चों के साथ शरणार्थी की तरह रह रही हैं।

गांव में बच्चे रोज दूध पीते थे। घर में दूध मिल जाता था। लेकिन बाढ़ ने वह सामान्य जिंदगी छीन ली।

अब बच्चा दूध मांगता है तो मां के पास जवाब नहीं।

बच्चा रोता है… मां उसे गोद में लेकर चुप कराती है… लेकिन दूध कहां से आए, इसका जवाब किसी के पास नहीं।


पका भोजन मिल जाए तो बड़े पेट भर लेते हैं, बच्चे फिर भी भूखे रह जाते हैं

केसी सुरेंद्र बाबू पार्क में सीताचरण के दो दर्जन से अधिक परिवारों के रहने की बात सामने आई है। यहां नियमित रूप से पका भोजन नहीं पहुंचने की शिकायत भी है। परिवारों को बबुआ घाट जाकर भोजन लाना पड़ता है।

किसी तरह बड़े लोग खाना खा लेते हैं।

लेकिन छोटे बच्चों की जरूरत अलग है।

पका हुआ खाना पेट भर सकता है, मगर हर छोटे बच्चे की पोषण संबंधी जरूरत पूरी नहीं कर सकता।

मांओं का कहना है कि गांव में बच्चों को दूध पीने की आदत थी। अचानक दूध बंद होने से बच्चे परेशान हैं और रोते हैं।

एक मां के लिए यह स्थिति कितनी कठिन होगी, इसे शायद राहत की किसी सूची में दर्ज नहीं किया जा सकता।


जिला स्कूल शिविर में दो वक्त खाना, फिर भी बच्चों की आंखों में अधूरी भूख

मिर्ची तालाब, लाल दरवाजा निवासी पूजा देवी अपने बच्चों के साथ करीब एक सप्ताह से जिला स्कूल राहत शिविर में रह रही हैं। उनका घर बाढ़ के पानी में डूब गया है।

पूजा देवी के मुताबिक शिविर में दो वक्त पका हुआ भोजन मिल रहा है। इससे परिवार का पेट तो भर रहा है, लेकिन बच्चों के लिए दूध उपलब्ध नहीं है।

लाल दरवाजा की रानी देवी भी बच्चों को दूध नहीं मिलने की बात कहती हैं।

यानी राहत व्यवस्था में भोजन पहुंच रहा है, लेकिन बच्चों के लिए जरूरी पोषण की एक महत्वपूर्ण कड़ी अभी भी गायब है।


आंगनबाड़ी पानी में डूबी तो क्या बच्चों का हक भी पानी में डूब गया?

इस पूरी कहानी का सबसे गंभीर पहलू आंगनबाड़ी व्यवस्था है।

बाढ़ प्रभावित इलाकों में कई आंगनबाड़ी केंद्र पानी में डूब गए हैं। महिलाओं का कहना है कि उनके गांव का आंगनबाड़ी केंद्र भी बाढ़ की चपेट में है, इसलिए वहां से बच्चों को मिलने वाला लाभ नहीं मिल पा रहा।

प्रशासन की ओर से ऐसे आंगनबाड़ी केंद्रों को राहत शिविरों में शिफ्ट करने का निर्देश दिया गया है। बाल विकास परियोजना कार्यालय की ओर से राहत शिविरों में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित करने का दावा भी किया जाता है।

लेकिन जमीन पर मौजूद मांओं की कहानी अलग है।

उनका सवाल सीधा है—अगर बच्चे अब राहत शिविर में हैं, तो आंगनबाड़ी की सेवा भी वहीं क्यों नहीं पहुंच रही?


“डीएम आदेश देंगे तो दूध बांटा जाएगा” — इस जवाब में छिपा बड़ा सवाल

आइसीडीएस समन्वयक मुक्ता कुमारी के अनुसार पोषक क्षेत्र के बच्चों और महिलाओं को आंगनबाड़ी का लाभ देने का प्रावधान है। उन्होंने बताया कि जिलाधिकारी के आदेश के बाद राहत शिविरों और शरणार्थियों के बीच दूध का वितरण किया जाएगा।

यह जवाब प्रशासनिक प्रक्रिया की तस्वीर सामने रखता है, लेकिन दूसरी तरफ राहत शिविर में बैठी मां की जरूरत आज की है।

बच्चा आज रो रहा है।

मां आज दूध मांग रही है।

बाढ़ आज उसके घर में है।

ऐसे में सवाल सिर्फ आदेश का नहीं, आपदा के समय व्यवस्था की संवेदनशीलता और तत्परता का है।**


दिनकर की कविता का सवाल, मुंगेर की मां की जुबान

विवश देखती माँ आँचल से नन्ही तड़प उड़ जाती,
अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती।
कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती है …..

दिनकर के नज़र में दूध केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि मां और बच्चे के बीच जीवन, ममता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक बनकर सामने आता है।

मुंगेर के राहत शिविर में वही प्रतीक आज एक वास्तविक जरूरत बन गया है।

जिस मां का घर बाढ़ में बह गया, वह अब सरकार से कोई बड़ी मांग नहीं कर रही। वह न नया मकान मांग रही है, न सुविधा-संपन्न जिंदगी।

वह बस पूछ रही है—

मेरे बच्चे के लिए दूध कहां से लाऊं?

और शायद यही इस बाढ़ की सबसे मार्मिक तस्वीर है।


विश्लेषण: राहत सिर्फ पेट भरने का नाम नहीं

आपदा के समय राहत व्यवस्था का मतलब केवल लोगों को किसी ऊंचे स्थान पर पहुंचा देना या दो वक्त का भोजन उपलब्ध करा देना नहीं है।

राहत की असली परीक्षा यह है कि सबसे कमजोर व्यक्ति तक उसकी जरूरत की सहायता पहुंच रही है या नहीं।

एक बुजुर्ग को दवा चाहिए, गर्भवती महिला को विशेष देखभाल चाहिए और छोटे बच्चे को पोषण। इसलिए राहत शिविर में बच्चों की जरूरतों को सामान्य भोजन के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

आंगनबाड़ी केंद्र अगर बाढ़ में डूब गया है तो उसकी सेवाएं भी बच्चों तक पहुंचाने का वैकल्पिक इंतजाम जरूरी है। क्योंकि बाढ़ पानी में केंद्र की दीवारें डुबो सकती है, लेकिन बच्चों का अधिकार नहीं।

मुंगेर की इन मांओं की आवाज प्रशासन के लिए सिर्फ शिकायत नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है—बाढ़ का पानी उतर जाएगा, लेकिन इस दौरान बच्चों के पोषण की जो कमी हुई, उसे नजरअंदाज करना आने वाले समय में भारी पड़ सकता है।

और अंत में वही सवाल, जो कविता से निकलकर आज राहत शिविर की जमीन पर खड़ा है—

**घर डूब गया तो मां ने किसी तरह खुद को संभाल लिया…

लेकिन जब बच्चा दूध के लिए रोया, तब वह मां आखिर किससे पूछे—दूध कहां से लाऊं?**

TAGGED:Bihar Newsबाढ़ राहत शिविरबिहार बाढ़मुंगेरमुंगेर बाढ़
ख़बर साझा करें
Facebook Whatsapp Whatsapp Telegram Email Print
पिछली ख़बर गया में भूमिहीन गरीब परिवारों को भूमि का पर्चा वितरित गया में भूमिहीन गरीब परिवारों को एक माह में मिलेगा पर्चा, विस अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने दिया आश्वासन
अगली ख़बर आज का राशिफल 11 सितंबर 2026 सभी 12 राशियों का भविष्यफल आज का राशिफल 11 सितंबर 2026: इन 7 राशियों के लिए दिन रहेगा खास, करियर-धन और रिश्तों में मिल सकते हैं अच्छे संकेत

ये भी पढ़ें

AI आधारित ज्योतिष सॉफ्टवेयर के शुभारंभ कार्यक्रम

धर्म और विज्ञान अलग नहीं: राजीव शुक्ला

औरंगाबाद में CSP संचालक से लूट के बाद गिरफ्तार बदमाश

औरंगाबाद में CSP संचालक से डेढ़ लाख की लूट, ग्रामीणों ने पीछा कर दो बदमाशों को दबोचा

इरिमी-बीसीई करार के तहत रेलवे तकनीक की ट्रेनिंग

इरिमी-बीसीई के बीच पांच साल का करार, इंजीनियरिंग छात्रों को मिलेगी रेलवे तकनीक की ट्रेनिंग

खैरा पंचायत सरकार भवन का निरीक्षण

हस्तांतरण के बाद सामने आईं खामियां, मंत्री ने पंचायत सरकार भवन की गुणवत्ता पर उठाए सवाल

खाली पदों पर अब तेजी से होगी बहाली, गृह विभाग ने तय किया एक्शन प्लान

खाली पदों पर अब तेजी से होगी बहाली, गृह विभाग ने तय किया एक्शन प्लान

Get Connected with us on social networks

Facebook-f X-twitter Instagram Youtube Linkedin-in

Poppular Categories

  • बिहार
  • देश
  • अपराध
  • राजनीति
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • झारखण्‍ड
  • करियर
  • उत्तर प्रदेश
  • स्वास्थ्य

Download APP

Google-play Apple
  • About us
  • Privacy Policy
  • Terms and Condition
  • Cookies Policy
  • Contact us
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?