आजादी के दशकों बाद भी ऊपरी केरवातरी के करीब 200 लोग नल-जल योजना से दूर, पानी लाने में महिलाओं के रोज 3 से 4 घंटे हो रहे खर्च
जमुई: देश की आजादी को कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन जमुई जिले के खैरा प्रखंड की हरणी पंचायत स्थित ऊपरी केरवातरी गांव के लोगों के लिए आज भी साफ पेयजल आसानी से उपलब्ध नहीं है। करीब 30 घरों में रहने वाली लगभग 200 की आबादी अपनी प्यास बुझाने के लिए पहाड़ से निकलने वाले एक छोटे से झरने पर निर्भर है।
गांव में अब तक नल-जल योजना नहीं पहुंच पाई है, जबकि सरकारी चापाकल भी लंबे समय से खराब पड़े हैं। ऐसे में ग्रामीणों के सामने पानी के लिए प्राकृतिक जलस्रोत पर निर्भर रहने के अलावा कोई आसान विकल्प नहीं बचा है।
एक बाल्टी पानी के लिए तय करना पड़ता है जंगल का रास्ता
ऊपरी केरवातरी की महिलाओं की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा सिर्फ पानी जुटाने में बीत जाता है। गांव से करीब एक किलोमीटर दूर घने जंगल के रास्ते महिलाओं को बंधेथान पहाड़ के नीचे जाना पड़ता है।
वहां पहाड़ से निकलने वाले झरने से पानी भरने के बाद महिलाएं उसे लेकर वापस घर लौटती हैं। यही प्रक्रिया दिन में करीब तीन बार दोहरानी पड़ती है।
स्थानीय महिलाओं के मुताबिक, पानी लाने के इस काम में रोजाना तीन से चार घंटे तक का समय निकल जाता है। घर के दूसरे कामों के अलावा पानी की व्यवस्था की जिम्मेदारी भी मुख्य रूप से महिलाओं पर ही है।
पिछले चार साल से झरने पर निर्भर हैं परिवार
गांव की सबीना, मंजू और अन्य महिलाओं ने बताया कि पिछले करीब चार वर्षों से वे इसी झरने से पानी लाकर अपनी जरूरतें पूरी कर रही हैं।
मंजू देवी के मुताबिक, एक बार पानी लाने में करीब एक घंटे का समय लग जाता है। झरने से लाया गया यही पानी परिवार में खाना बनाने के साथ-साथ पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
इस स्थिति में महिलाओं को न केवल समय और मेहनत खर्च करनी पड़ती है, बल्कि जंगल के रास्ते रोजाना आने-जाने की मजबूरी भी बनी हुई है।
भीषण गर्मी में भी नहीं सूखता पहाड़ का झरना
ऊपरी केरवातरी के लोगों के लिए अगर कोई राहत है तो वह बंधेथान पहाड़ से निकलने वाला प्राकृतिक झरना है। ग्रामीणों के अनुसार यह झरना सालभर पानी देता है।
गर्मी के मौसम में जब आसपास के कई गांवों के जलस्रोत सूख जाते हैं और जलस्तर नीचे चला जाता है, तब भी इस झरने से पानी निकलता रहता है। इसी वजह से यह झरना गांव के लोगों के लिए जीवनरेखा बन गया है।
हालांकि, ग्रामीणों की जरूरत के हिसाब से यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। गांव में स्थायी पेयजल सुविधा उपलब्ध होने से ही लोगों को रोजाना जंगल और पहाड़ का रास्ता तय करने से राहत मिल सकती है।
पथरीली जमीन के कारण बोरिंग में आई परेशानी
गांव में नल-जल योजना नहीं पहुंचने के पीछे इलाके की भौगोलिक स्थिति भी एक बड़ी चुनौती बताई जा रही है।
पंचायत के मुखिया प्रकाश तांती ने बताया कि ऊपरी केरवातरी पहाड़ी और पथरीले इलाके में बसा हुआ है। ऐसे में बोरिंग के जरिए पानी निकालना काफी मुश्किल हो रहा है।
उनके अनुसार, नल-जल योजना के लिए बोरिंग मशीन से 500 फीट से अधिक गहराई तक खुदाई भी कराई गई, लेकिन पानी नहीं मिल सका।
नीचे वाले इलाके से पाइपलाइन पहुंचाने की तैयारी
मुखिया प्रकाश तांती के मुताबिक अब नीचे वाले इलाके में बोरिंग कराकर वहां से पाइपलाइन के जरिए ऊपरी केरवातरी तक पानी पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है।
पंचायत स्तर से जल्द गांव की पेयजल समस्या दूर करने का प्रयास किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, जब तक यह व्यवस्था जमीन पर शुरू नहीं होती, तब तक ग्रामीणों की निर्भरता झरने पर ही बनी रहेगी।
पहाड़ से टपकती बूंदों के भरोसे गांव की जिंदगी
ऊपरी केरवातरी की तस्वीर बताती है कि सरकारी पेयजल योजनाओं की पहुंच से दूर रहने वाले ग्रामीणों के लिए पानी आज भी रोज की सबसे बड़ी जरूरत और चुनौती बना हुआ है।
एक तरफ गांव के लोग नल-जल योजना का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ महिलाएं हर दिन जंगल का रास्ता तय कर झरने से पानी ढोने को मजबूर हैं।