4 नवंबर 1995 को इज़राइल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की तेल अवीव में एक शांति रैली के बाद गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह हत्या इज़राइल के राजनीतिक इतिहास की सबसे निर्णायक और दुखद घटनाओं में गिनी जाती है। राबिन को 1994 में फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात और इज़राइल के विदेश मंत्री शिमोन पेरेस के साथ नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। उनकी हत्या एक यहूदी चरमपंथी यिगाल आमिर ने की थी, जो राबिन की शांति नीति और ओस्लो समझौतों का विरोध करता था।
सैनिक से राजनेता बने यित्ज़ाक राबिन
यित्ज़ाक राबिन का जन्म 1 मार्च 1922 को यरुशलम में हुआ था। उन्होंने युवावस्था में यहूदी रक्षा संगठन पालमाख से जुड़कर सैन्य जीवन की शुरुआत की। 1948 के अरब-इज़राइल युद्ध के दौरान उन्होंने सैन्य कमान की जिम्मेदारियां निभाईं। बाद में वे इज़राइल रक्षा बल (IDF) के वरिष्ठ अधिकारी बने और 1964 से 1968 तक सेना प्रमुख रहे। 1967 के छह-दिवसीय युद्ध के समय वे इज़राइली सेना के चीफ ऑफ स्टाफ थे।
सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद राबिन ने कूटनीति और राजनीति में प्रवेश किया। 1968 से 1973 तक वे अमेरिका में इज़राइल के राजदूत रहे। इसके बाद वे लेबर पार्टी से जुड़े और संसद के सदस्य बने। 1974 में गोल्डा मेयर के इस्तीफे के बाद वे पहली बार प्रधानमंत्री बने। 1977 तक इस पद पर रहने के बाद वे विपक्ष में चले गए। 1984 से 1990 तक उन्होंने रक्षा मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
दूसरा कार्यकाल और शांति प्रक्रिया
1992 के चुनाव में लेबर पार्टी की जीत के बाद राबिन दोबारा प्रधानमंत्री बने। उनके दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी पहचान फिलिस्तीनियों के साथ वार्ता और मध्य-पूर्व में शांति स्थापित करने की कोशिशें रहीं। उनकी सरकार ने फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के प्रतिनिधियों के साथ गुप्त वार्ता की, जिसके परिणामस्वरूप 1993 में ओस्लो समझौते की घोषणा हुई।

13 सितंबर 1993 को वाशिंगटन में इज़राइल और PLO के बीच सिद्धांतों की घोषणा पर हस्ताक्षर हुए। इस प्रक्रिया में राबिन, शिमोन पेरेस और यासिर अराफात प्रमुख भूमिका में थे। समझौते ने सीमित फिलिस्तीनी स्वशासन और आगे की वार्ताओं का ढांचा तैयार किया। यह विवादों और विरोध के बीच आगे बढ़ी एक जटिल राजनीतिक प्रक्रिया थी; इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता, लेकिन इसने दशकों पुराने संघर्ष में बातचीत का महत्वपूर्ण रास्ता खोला।
26 अक्टूबर 1994 को राबिन और जॉर्डन के राजा हुसैन ने इज़राइल-जॉर्डन शांति संधि पर हस्ताक्षर किए। इसी वर्ष राबिन, पेरेस और अराफात को मध्य-पूर्व में शांति स्थापित करने के प्रयासों के लिए संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया।
शांति प्रयासों के विरोध में बढ़ता तनाव
ओस्लो समझौतों के बाद इज़राइल के भीतर राबिन की नीतियों को लेकर गहरा राजनीतिक और सामाजिक विभाजन उभरा। दक्षिणपंथी और धार्मिक राष्ट्रवादी समूहों के कुछ हिस्सों ने फिलिस्तीनियों के साथ समझौते को राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध बताया। दूसरी ओर, शांति प्रक्रिया के समर्थक इसे लंबे संघर्ष को समाप्त करने का अवसर मानते थे। क्षेत्र में जारी हिंसा और हमलों ने भी जनमत को प्रभावित किया।
राबिन के खिलाफ सार्वजनिक सभाओं और राजनीतिक अभियानों में तीखी भाषा का इस्तेमाल होने लगा। उनके समर्थकों के लिए यह लोकतांत्रिक वार्ता और समझौते की दिशा में कदम था, जबकि विरोधियों के एक कट्टरपंथी हिस्से ने इसे विश्वासघात के रूप में प्रस्तुत किया। ऐसे माहौल में राजनीतिक असहमति और हिंसा के बीच की रेखा खतरनाक रूप से कमजोर होती गई।

4 नवंबर 1995: तेल अवीव की शांति रैली और हत्या
4 नवंबर 1995 की शाम तेल अवीव के किंग्स ऑफ इज़राइल स्क्वायर (किकार मालखेई यिस्राएल) में शांति प्रक्रिया के समर्थन में विशाल रैली आयोजित की गई। इसका संदेश था—शांति के पक्ष में समर्थन और हिंसा का विरोध। राबिन ने मंच से लोगों को संबोधित किया और शांति के प्रयास जारी रखने का संकल्प दोहराया।
रैली समाप्त होने के बाद जब राबिन अपनी कार की ओर जा रहे थे, तभी 25 वर्षीय यहूदी कानून के छात्र यिगाल आमिर ने उन पर गोलियां चला दीं। आमिर शांति प्रक्रिया और राबिन की नीतियों का कट्टर विरोधी था। राबिन को गंभीर हालत में तेल अवीव के इखिलोव अस्पताल ले जाया गया, जहां उसी रात रात 11 बजकर 14 मिनट पर उनकी मृत्यु हो गई। हत्या के बाद आमिर को घटनास्थल पर ही गिरफ्तार कर लिया गया।
यह घटना किसी युद्धक्षेत्र में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया के समर्थन में आयोजित सार्वजनिक सभा के बाद हुई थी। इसलिए इस हत्या को केवल एक नेता पर हमला नहीं, बल्कि राजनीतिक हिंसा और लोकतांत्रिक असहमति की सीमाओं पर गंभीर प्रहार के रूप में देखा गया।
इज़राइल और दुनिया की प्रतिक्रिया
राबिन की हत्या के बाद इज़राइल में गहरा शोक फैल गया। जिस चौक पर रैली हुई थी, वहां नागरिकों ने मोमबत्तियां जलाईं, संदेश लिखे और श्रद्धांजलि दी। बाद में उस स्थान का नाम बदलकर राबिन स्क्वायर रखा गया। यरुशलम में माउंट हर्ज़ल पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें दुनिया के अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों ने भाग लिया।

उनकी हत्या ने इज़राइल के भीतर राजनीतिक ध्रुवीकरण, उग्रवाद और सार्वजनिक विमर्श में नफरत भरी भाषा के खतरों पर व्यापक बहस को जन्म दिया। शांति प्रक्रिया पर भी इसका गहरा असर पड़ा। राबिन के बाद शिमोन पेरेस ने प्रधानमंत्री का पद संभाला। हालांकि वार्ताएं आगे बढ़ीं, लेकिन मध्य-पूर्व में स्थायी शांति की राह कठिन बनी रही।
यित्ज़ाक राबिन की विरासत
राबिन की विरासत जटिल है। वे एक सैन्य कमांडर थे, जिन्होंने इज़राइल की सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई; साथ ही अपने दूसरे प्रधानमंत्रित्व काल में उन्होंने फिलिस्तीनियों के साथ राजनीतिक समझौते और जॉर्डन के साथ शांति संधि की दिशा में निर्णायक कदम उठाए। उनके समर्थक उन्हें शांति के लिए जोखिम उठाने वाले नेता के रूप में याद करते हैं। उनके आलोचक उनकी नीतियों और सुरक्षा संबंधी निर्णयों पर प्रश्न उठाते रहे हैं।
लेकिन 4 नवंबर 1995 की हत्या का लोकतांत्रिक संदेश स्पष्ट है: राजनीतिक मतभेदों का समाधान हिंसा से नहीं, संवाद, बहस और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से होना चाहिए। राबिन की हत्या आज भी इस बात की चेतावनी है कि चरमपंथ और राजनीतिक हिंसा किसी भी समाज की संस्थाओं तथा सार्वजनिक जीवन को गहरी चोट पहुंचा सकते हैं।
