सर फिरोजशाह मेहता आधुनिक भारतीय राजनीतिक चेतना, संवैधानिक राष्ट्रवाद और मुंबई के नगर प्रशासन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण शख्सियत थे। उन्हें ‘बंबई का शेर’ और ‘बंबई का अनौपचारिक राजा’ जैसे संबोधनों से याद किया जाता है। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक नेताओं में शामिल थे, कुशल बैरिस्टर थे और नगर स्वशासन, शिक्षा तथा सार्वजनिक जीवन में भारतीयों की भागीदारी के समर्थक थे।
जन्म और शिक्षा: कानून की पढ़ाई से सार्वजनिक जीवन तक
फिरोजशाह मेरवानजी मेहता का जन्म 4 अगस्त 1845 को बंबई (वर्तमान मुंबई) में एक पारसी व्यापारी परिवार में हुआ था। उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की और बंबई विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की। इसके बाद वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। लिंकन्स इन से प्रशिक्षण के बाद 1868 में उन्हें बार में बुलाया गया और वे भारत लौटकर बंबई हाईकोर्ट में वकालत करने लगे।
उनकी कानूनी दक्षता, तार्किक क्षमता और सार्वजनिक प्रश्नों पर स्पष्ट दृष्टिकोण ने उन्हें शीघ्र ही प्रतिष्ठा दिलाई। वकालत के साथ-साथ वे नगर प्रशासन, शिक्षा और भारतीयों के नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों में सक्रिय होते गए।
बंबई के नगर प्रशासन को आधुनिक स्वरूप देने में भूमिका
मेहता का सबसे स्थायी योगदान बंबई के नगर प्रशासन के विकास से जुड़ा माना जाता है। उन्नीसवीं सदी में शहर के विस्तार, स्वच्छता, जलापूर्ति और सार्वजनिक सेवाओं के लिए जवाबदेह स्थानीय संस्थाओं की आवश्यकता बढ़ रही थी। मेहता ने नगर निकायों को अधिक संगठित और उत्तरदायी बनाने के लिए कानूनी तथा प्रशासनिक सुधारों की वकालत की।

बंबई नगर निगम से उनका जुड़ाव 1870 के दशक में शुरू हुआ। उन्होंने नगर प्रशासन में निर्वाचित प्रतिनिधित्व, वित्तीय जवाबदेही और नागरिक सुविधाओं के महत्व पर जोर दिया। वे कई बार नगर निगम के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व और प्रयासों के कारण उन्हें बंबई में आधुनिक नगर स्वशासन के प्रमुख निर्माताओं में गिना जाता है।
उनकी दृष्टि में नगर प्रशासन केवल सड़कों और इमारतों का प्रबंधन नहीं था, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा और जीवन-स्तर से जुड़ी सार्वजनिक जिम्मेदारी थी।
बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन और कांग्रेस में नेतृत्व
1885 में मेहता ने न्यायमूर्ति के.टी. तेलंग और बदरुद्दीन तैयबजी जैसे सहयोगियों के साथ बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संस्था भारतीयों की राजनीतिक मांगों को संगठित रूप से प्रशासन तक पहुंचाने का मंच बनी। उसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई और मेहता उसके शुरुआती प्रभावशाली नेताओं में शामिल हुए।
वे कांग्रेस के छठे अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए 1890 में कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष बने। उन्होंने संवैधानिक तरीकों, विधायी सुधारों, प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी और नागरिक अधिकारों के पक्ष में आवाज उठाई। उनकी राजनीति उदारवादी और संवैधानिक राष्ट्रवाद की परंपरा से जुड़ी थी। वे याचिकाओं, सार्वजनिक बहस, विधायी हस्तक्षेप और संस्थागत सुधारों को राजनीतिक परिवर्तन के प्रभावी साधन मानते थे।

मेहता का दृष्टिकोण कांग्रेस के भीतर उग्र राष्ट्रवादी तरीकों से अलग था। वे राजनीतिक संघर्ष को संगठित, तर्कपूर्ण और संवैधानिक दिशा में आगे बढ़ाना चाहते थे। इस मतभेद के बावजूद शुरुआती कांग्रेस को संस्थागत आधार देने में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।
विधायी परिषद और भारतीयों के अधिकार
मेहता ने बंबई की विधायी परिषद और बाद में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में भी भूमिका निभाई। इन मंचों पर उन्होंने प्रशासनिक जवाबदेही, सार्वजनिक सेवाओं में भारतीयों के अवसर, शिक्षा और नागरिक हितों से जुड़े प्रश्न उठाए। उनका विश्वास था कि आधुनिक शिक्षा और राजनीतिक संस्थाओं में भागीदारी से भारतीय समाज अपनी क्षमता और अधिकारों को मजबूत कर सकता है।
वे बंबई विश्वविद्यालय से भी लंबे समय तक जुड़े रहे और 1910 के दशक में उसके उपकुलपति बने। उच्च शिक्षा के विस्तार और विश्वविद्यालयी प्रशासन में उनकी रुचि उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष थी।
पत्रकारिता और जनमत निर्माण
मेहता ने पत्रकारिता को सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही और जनमत निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम माना। उनके प्रयासों से 1913 में अंग्रेजी दैनिक द बॉम्बे क्रॉनिकल की शुरुआत हुई। यह समाचारपत्र आगे चलकर भारतीय राजनीतिक विचारों और राष्ट्रवादी विमर्श को अभिव्यक्ति देने वाला प्रभावशाली मंच बना।

उनका मानना था कि स्वतंत्र और निर्भीक प्रेस शासन की नीतियों की समीक्षा कर सकता है और जनता को सार्वजनिक मुद्दों पर जागरूक बनाता है। इस दृष्टि से उनका योगदान केवल राजनीति और नगर प्रशासन तक सीमित नहीं था।
सम्मान और ‘बंबई का शेर’ की पहचान
बंबई के सार्वजनिक जीवन में उनके प्रभाव, स्पष्ट वक्तृत्व और प्रशासनिक सक्रियता के कारण उन्हें ‘बंबई का शेर’ कहा गया। ब्रिटिश शासन ने उन्हें 1904 में नाइट की उपाधि दी। हालांकि उनकी पहचान किसी औपनिवेशिक सम्मान से अधिक भारतीय सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका के कारण बनी। वे उन नेताओं में थे जिन्होंने औपनिवेशिक शासन के भीतर उपलब्ध संस्थागत अवसरों का उपयोग भारतीयों की राजनीतिक आवाज मजबूत करने के लिए किया।
निधन की तारीख: 4 नहीं, 5 नवंबर 1915
सर फिरोजशाह मेहता के निधन की तारीख के संबंध में एक महत्वपूर्ण तथ्य-सुधार जरूरी है। कुछ लोकप्रिय संदर्भों में 4 नवंबर का उल्लेख मिलता है, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आधिकारिक जीवन-वृत्त, मराठी विश्वकोश और अन्य ऐतिहासिक संदर्भों में उनकी मृत्यु 5 नवंबर 1915 दर्ज है। इसलिए उनकी पुण्यतिथि 5 नवंबर मानी जानी चाहिए, न कि 4 नवंबर।
उनका निधन बंबई में हुआ। उनके जाने से भारतीय राजनीति ने एक अनुभवी उदारवादी नेता, प्रतिष्ठित विधिवेत्ता और नगर प्रशासन के दूरदर्शी समर्थक को खो दिया।

ऐतिहासिक विरासत
फिरोजशाह मेहता का महत्व इस बात में है कि उन्होंने राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक नारों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने नगर निगम, विश्वविद्यालय, विधायी परिषद, राजनीतिक संगठन और समाचारपत्र जैसे संस्थागत माध्यमों के जरिए सार्वजनिक जीवन को मजबूत करने का प्रयास किया। आधुनिक मुंबई के नगर प्रशासन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती इतिहास में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।
उन्हें याद करना उस पीढ़ी के प्रयासों को समझना है जिसने संवैधानिक अधिकारों, सार्वजनिक संस्थाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के जरिए आधुनिक भारत की आधारभूमि तैयार की।
