6 नवंबर 1937 को पटना, बिहार में जन्मे यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी से राजनीति में आए और देश के वित्त तथा विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के रूप में उनकी भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल किया। चंद्रशेखर सरकार में भी वे वित्त मंत्री रहे। उनका सार्वजनिक जीवन प्रशासन, आर्थिक नीति, संसदीय राजनीति और विदेश संबंधों के कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरा है।
पटना में जन्म और शिक्षा
यशवंत सिन्हा का जन्म 6 नवंबर 1937 को पटना में हुआ। उनकी स्कूली और उच्च शिक्षा पटना में ही हुई। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई 1958 में प्रथम श्रेणी में पूरी की। इसके बाद 1958 से 1960 तक उसी विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाया। शिक्षण के शुरुआती अनुभव ने उन्हें सार्वजनिक नीति, शासन और राजनीतिक संस्थाओं को समझने की अकादमिक पृष्ठभूमि दी।
उनकी शिक्षा और प्रशासनिक जीवन की शुरुआत बिहार की राजधानी पटना से हुई, लेकिन आगे उनका कार्यक्षेत्र राज्य से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैला।
भारतीय प्रशासनिक सेवा में 24 वर्ष
1960 में यशवंत सिन्हा भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए। लगभग 24 वर्षों तक उन्होंने बिहार सरकार और केंद्र सरकार में विभिन्न पदों पर काम किया। उनके कार्यक्षेत्र में वित्त, वाणिज्य, उद्योग, परिवहन और प्रशासनिक प्रबंधन जैसे विभाग शामिल रहे। बिहार में उन्होंने जिला और राज्य स्तर पर प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। केंद्र में भी वे मंत्रालयों में वरिष्ठ पदों पर रहे।

उनकी विदेश सेवा से जुड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण थीं। 1971 से 1973 तक वे जर्मनी के बॉन स्थित भारतीय दूतावास में वाणिज्यिक प्रथम सचिव रहे। 1973 से 1974 के दौरान उन्होंने फ्रैंकफर्ट में भारत के महावाणिज्यदूत के रूप में काम किया। इस अनुभव ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आर्थिक कूटनीति और यूरोपीय देशों के साथ भारत के संबंधों को नजदीक से समझने का अवसर दिया। बाद में वे केंद्र सरकार के सतह परिवहन मंत्रालय में संयुक्त सचिव भी रहे।
1984 में IAS से इस्तीफा और राजनीति में प्रवेश
1984 में यशवंत सिन्हा ने भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और जनता पार्टी से जुड़े। 1986 में वे पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव बने। 1988 में वे राज्यसभा के सदस्य चुने गए। जनता दल के गठन के बाद वे उससे जुड़े और पार्टी के महासचिव की भूमिका निभाई।
उनके राजनीतिक जीवन पर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन और चंद्रशेखर जैसे नेताओं का प्रभाव बताया जाता है। 1990 में चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी तो यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया। यह उनका पहला केंद्रीय वित्त मंत्रालय का कार्यकाल था, जो नवंबर 1990 से जून 1991 तक चला। उस समय देश राजनीतिक अस्थिरता और गंभीर आर्थिक दबावों के दौर से गुजर रहा था।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री
1990 के दशक में यशवंत सिन्हा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और जून 1996 में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने। मार्च 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें केंद्रीय वित्त मंत्री नियुक्त किया गया। 1999 के आम चुनाव के बाद बनी सरकार में भी उन्होंने वित्त मंत्रालय संभाला और 1 जुलाई 2002 तक इस पद पर रहे। इस प्रकार वे दो अलग-अलग प्रधानमंत्रियों—चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी—की सरकारों में वित्त मंत्री रहे।

वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल में आर्थिक उदारीकरण के बाद के सुधारों को आगे बढ़ाने, निवेश और बुनियादी ढांचे को प्रोत्साहन देने तथा कर और वित्तीय क्षेत्र में बदलावों पर जोर रहा। 1998-99 के बजट भाषण में उन्होंने कृषि और ग्रामीण विकास, सिंचाई, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, विदेशी निवेश, प्राथमिक शिक्षा, राष्ट्रीय राजमार्गों और केंद्रीय मूल्य वर्धित कर व्यवस्था की दिशा में प्रस्ताव रखे। बजट में आर्थिक विकास और सामाजिक क्षेत्र के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश दिखाई देती है।
उनके कार्यकाल में बीमा क्षेत्र में निजी भागीदारी का रास्ता खोलने से जुड़े प्रस्ताव, वित्तीय क्षेत्र के नियमन, दूरसंचार और बुनियादी ढांचे के विकास पर नीतिगत बहस आगे बढ़ी। इन नीतियों के प्रभाव और प्राथमिकताओं पर अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण रहे, लेकिन यह दौर भारत की अर्थव्यवस्था के क्रमिक पुनर्गठन का महत्वपूर्ण चरण था।
वैश्विक आर्थिक संस्थाओं में भारत की भूमिका
वित्त मंत्री के रूप में यशवंत सिन्हा ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मंचों पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। अगस्त 2000 में वे विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की विकास समिति के अध्यक्ष चुने गए। वे इस पद पर पहुंचने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने विकासशील देशों की चिंताओं, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा और स्वास्थ्य तक पहुंच तथा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया।
वे जी-20 से जुड़े वित्तीय संवादों में भी भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख नेताओं में रहे। इस भूमिका ने उन्हें घरेलू आर्थिक नीति के साथ-साथ वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के कामकाज और विकासशील देशों के हितों पर विचार रखने का अवसर दिया।

विदेश मंत्री के रूप में कूटनीतिक जिम्मेदारी
1 जुलाई 2002 को यशवंत सिन्हा को भारत का विदेश मंत्री नियुक्त किया गया। उन्होंने मई 2004 तक यह जिम्मेदारी संभाली। यह समय अंतरराष्ट्रीय राजनीति में 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद बने नए सुरक्षा परिवेश, अफगानिस्तान में बदलाव, भारत-अमेरिका संबंधों और दक्षिण एशिया की कूटनीतिक चुनौतियों का दौर था।
विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने भारत की विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संवाद, आर्थिक कूटनीति और बहुपक्षीय मंचों पर देश की भागीदारी से जुड़े मुद्दों पर काम किया। भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद तथा जनवरी 2004 के इस्लामाबाद सार्क शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। इस अवधि में भारत ने अमेरिका सहित कई प्रमुख देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
संसदीय जीवन और राजनीतिक मतभेद
यशवंत सिन्हा ने हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र से कई चुनाव लड़े और संसद के दोनों सदनों में प्रतिनिधित्व किया। 1998 और 1999 में वे हजारीबाग से लोकसभा पहुंचे। 2004 में वे झारखंड से राज्यसभा के सदस्य बने और संसद की वित्त तथा अन्य समितियों में काम किया। 2009 में वे फिर हजारीबाग से लोकसभा के लिए चुने गए।
समय के साथ भाजपा के भीतर उनकी भूमिका और नेतृत्व से मतभेद सार्वजनिक होने लगे। 2009 में उन्होंने पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। बाद के वर्षों में उन्होंने आर्थिक नीतियों और सरकार के फैसलों की आलोचना की। 2018 में उन्होंने भाजपा छोड़ने की घोषणा की और सक्रिय दलगत राजनीति से अलग रहने की बात कही।

तृणमूल कांग्रेस और 2022 का राष्ट्रपति चुनाव
2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले यशवंत सिन्हा तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। जून 2022 में उन्होंने विपक्षी दलों की व्यापक एकता के लिए तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दिया। इसके बाद कई विपक्षी दलों ने उन्हें 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में अपना साझा उम्मीदवार बनाया।
18 जुलाई 2022 को राष्ट्रपति पद के लिए मतदान हुआ। उनका मुकाबला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू से था। 21 जुलाई को घोषित परिणाम में द्रौपदी मुर्मू निर्वाचित हुईं। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक विवरण के अनुसार मुर्मू को 6,76,803 मत-मूल्य और यशवंत सिन्हा को 3,80,177 मत-मूल्य प्राप्त हुए। इस चुनाव ने सिन्हा को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया, हालांकि वे राष्ट्रपति नहीं चुने गए।
सम्मान, लेखन और सार्वजनिक विचार
यशवंत सिन्हा प्रशासन और राजनीति के अलावा आर्थिक नीति पर लेखन और सार्वजनिक विमर्श के लिए भी जाने जाते हैं। वित्त मंत्री के रूप में अपने अनुभवों और आर्थिक नीतियों पर उन्होंने पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘Confessions of a Swadeshi Reformer’ का उल्लेख किया जाता है। 2015 में फ्रांस ने उन्हें अपने प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘लीजन ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया।
उनकी राजनीतिक यात्रा में विचारों और दलों के स्तर पर बदलाव आए—जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा और बाद में तृणमूल कांग्रेस तक। इन बदलावों को उनके लंबे सार्वजनिक जीवन, बदलते राजनीतिक समीकरणों और समय-समय पर सामने आए वैचारिक मतभेदों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

बिहार से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक
पटना में जन्मे यशवंत सिन्हा का जीवन बिहार की शैक्षणिक पृष्ठभूमि से शुरू होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा, केंद्रीय मंत्रिमंडल और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-कूटनीतिक मंचों तक पहुंचा। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने दो अलग-अलग सरकारों में काम किया और विदेश मंत्री के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2022 में राष्ट्रपति पद के विपक्षी उम्मीदवार बनना उनके सार्वजनिक जीवन का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव था।
6 नवंबर को उनके जन्मदिवस पर उनका जीवन इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करता है कि प्रशासनिक अनुभव, आर्थिक नीति की समझ और राजनीतिक भागीदारी किस तरह किसी व्यक्ति को देश के सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक सक्रिय रख सकती है।
