6 नवंबर 1905 को बिहार के बक्सर जिले के डुबौली गाँव में भोजपुरी और हिंदी के कवि-लेखक राम बचन ‘अरविन्द’ द्विवेदी का जन्म हुआ था। भोजपुरी साहित्य के इतिहास और रचनाकारों की सूची में उनका नाम रामवचन द्विवेदी ‘अरविन्द’ के रूप में भी मिलता है। उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर उनका साहित्यिक परिचय मुख्यतः भोजपुरी काव्य-परंपरा से जुड़ता है।
नाम और साहित्यिक पहचान
साहित्यिक स्रोतों में उनके नाम की वर्तनी एक जैसी नहीं मिलती। कुछ जगह ‘राम बचन’ और कुछ जगह ‘रामवचन’ लिखा गया है, जबकि उपनाम ‘अरविन्द’ या ‘अरविन्द’ के रूप में दर्ज है। कविता कोश की भोजपुरी रचनाकार सूची में ‘रामवचन द्विवेदी ‘अरविन्द’’ का नाम शामिल है। यह उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि उनका नाम भोजपुरी साहित्य के रचनाकारों के दस्तावेजीकृत समूह में सुरक्षित है।
किसी लेखक के नाम की वर्तनी में ऐसे अंतर पुराने मुद्रित ग्रंथों, सूचीकरण और बाद के डिजिटल संकलनों में देखने को मिलते हैं। इसलिए उनके संदर्भ में अलग-अलग रूपों को पहचानना उपयोगी है, ताकि पाठक किसी दूसरे समान नाम वाले साहित्यकार से भ्रमित न हों।
भोजपुरी साहित्य के इतिहास में उल्लेख
भोजपुरी साहित्य के इतिहास पर बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना द्वारा प्रकाशित दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘भोजपुरी के कवि और काव्य’ एक महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ मानी जाती है। इस पुस्तक का पहला संस्करण 1958 में प्रकाशित हुआ था। इसमें आठवीं शताब्दी से लेकर 1950 तक भोजपुरी भाषा और साहित्य के इतिहास तथा कवियों-काव्य का विवरण संकलित किया गया है। पुस्तक की विषय-सूची में आधुनिक काल के कवियों के बीच रामवचन द्विवेदी ‘अरविन्द’ का उल्लेख पृष्ठ 218 पर दर्ज है।

यह तथ्य उनके साहित्यिक स्थान को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। किसी कवि का नाम भाषा-साहित्य के ऐतिहासिक सर्वेक्षण में दर्ज होना इस बात का संकेत है कि उसे उस परंपरा के अध्ययन योग्य रचनाकारों में गिना गया। इस तरह का संदर्भ किसी एक लोकप्रिय कविता या मौखिक स्मृति से आगे बढ़कर साहित्य के लिखित इतिहास में उनकी उपस्थिति को प्रमाणित करता है।
कविता कोश में दर्ज भोजपुरी रचना
डिजिटल साहित्यिक अभिलेखों में भी रामवचन द्विवेदी ‘अरविन्द’ की रचनात्मक उपस्थिति दिखाई देती है। कविता कोश के भोजपुरी रचना अनुभाग में उनकी एक कविता ‘दुसमन देस के दबावे खाती आवत बाटे’ उनके नाम के साथ सूचीबद्ध है। शीर्षक की भाषा और शब्द-चयन भोजपुरी की अपनी लोकधर्मी अभिव्यक्ति को सामने रखते हैं।
इस रचना का शीर्षक ही अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक संवेदना, बाहरी दबाव और सामूहिक चेतना जैसे प्रश्नों की ओर संकेत करता है। हालांकि केवल शीर्षक के आधार पर कविता की पूरी विषयवस्तु या उसके ऐतिहासिक संदर्भ के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। उपलब्ध डिजिटल सूची से इतना अवश्य पुष्ट होता है कि ‘अरविन्द’ ने भोजपुरी में कविता लिखी और उनकी रचना साहित्यिक संकलन में संरक्षित है।
भोजपुरी भाषा और लोकजीवन की अभिव्यक्ति
भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि गीत, कविता, कथा, नाटक और लोक-स्मृति की समृद्ध परंपरा वाली भाषा है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बड़े भूभाग में बोली जाने वाली भोजपुरी ने लोकजीवन, श्रम, संघर्ष, सामाजिक संबंधों, प्रेम, विरह, उत्सव और राजनीतिक चेतना को अपनी रचनाओं में जगह दी है। इसकी साहित्यिक परंपरा को समझने के लिए पुराने कवियों, लोककवियों और आधुनिक लेखकों के योगदान का दस्तावेजीकरण आवश्यक है।

रामवचन द्विवेदी ‘अरविन्द’ का नाम इसी साहित्यिक परंपरा के ऐतिहासिक उल्लेखों में आता है। उनके बारे में उपलब्ध सामग्री सीमित है, इसलिए उनके जीवन, शिक्षा, परिवार, प्रकाशित पुस्तकों या साहित्यिक गतिविधियों के बारे में अप्रमाणित विवरण जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से जुड़े इतिहास-ग्रंथ में उनका उल्लेख और कविता कोश में उनकी रचना का सूचीबद्ध होना उनकी साहित्यिक पहचान के दो अलग-अलग प्रमाण हैं।
जीवन-वृत्त पर शोध की आवश्यकता
भोजपुरी के अनेक पुराने रचनाकारों के जीवन और कृतित्व की जानकारी आज भी बिखरे हुए ग्रंथों, पत्र-पत्रिकाओं, स्थानीय स्मृतियों और पुस्तकालयों में उपलब्ध है। कई बार रचनाएँ सुरक्षित रह जाती हैं, लेकिन रचनाकार की जन्मस्थली, जीवन-काल, परिवार, शिक्षा और साहित्यिक गतिविधियों का व्यवस्थित विवरण सार्वजनिक स्रोतों में नहीं मिल पाता। रामवचन द्विवेदी ‘अरविन्द’ के संदर्भ में भी यही स्थिति दिखाई देती है।
उनके जन्म की तारीख और स्थान का उल्लेख एक ऐतिहासिक तिथि-संग्रह में मिलता है, जबकि भोजपुरी साहित्य के संदर्भ-ग्रंथ और कविता कोश उनके साहित्यिक नाम तथा रचना की पुष्टि करते हैं। आगे के शोध में पुराने संस्करणों, स्थानीय अभिलेखों, परिवार या क्षेत्र के साहित्यिक संगठनों की सामग्री और पुस्तकालयों में उपलब्ध मूल दस्तावेजों की जांच से उनके जीवन और कृतित्व की अधिक विस्तृत तस्वीर सामने आ सकती है।
6 नवंबर को स्मरण
राम बचन ‘अरविन्द’ द्विवेदी का जन्मदिवस भोजपुरी और हिंदी साहित्य के उन रचनाकारों को याद करने का अवसर है जिनकी पहचान मुख्यधारा के व्यापक साहित्यिक विमर्श में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, लेकिन जिनके नाम क्षेत्रीय भाषा-साहित्य के इतिहास और संकलनों में दर्ज हैं। डुबौली, बक्सर से जुड़ा उनका जन्म-संदर्भ और भोजपुरी साहित्य में ‘रामवचन द्विवेदी ‘अरविन्द’’ के रूप में सुरक्षित नाम उनकी साहित्यिक स्मृति को जीवित रखते हैं।

उनकी उपलब्ध रचनाओं और संदर्भों का संरक्षण, सूचीकरण तथा शोधपरक परिचय तैयार करना भोजपुरी साहित्य के इतिहास को अधिक समावेशी और प्रमाण-आधारित बनाने की दिशा में उपयोगी कदम होगा।
