हर साल 5 नवंबर को विश्व सुनामी जागरूकता दिवस (World Tsunami Awareness Day) मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य दुनिया के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सुनामी के खतरे, समय रहते चेतावनी, सुरक्षित निकासी और आपदा के बाद पुनर्वास के प्रति जागरूक करना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 दिसंबर 2015 को प्रस्ताव A/RES/70/203 पारित कर 5 नवंबर को इस दिवस के रूप में घोषित किया था। यह तारीख जापान की 1854 की एक प्रेरक घटना ‘इनामुरा-नो-ही’ यानी धान की बालियों में आग लगाने की कहानी से जुड़ी है।
संयुक्त राष्ट्र ने क्यों शुरू किया यह दिवस?
सुनामी समुद्र से उठने वाली ऐसी शक्तिशाली लहरों की श्रृंखला है, जो तटीय क्षेत्रों में भारी जनहानि और विनाश का कारण बन सकती है। यह खतरा किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता; समुद्र से जुड़े देशों और द्वीपीय समुदायों को इसकी चपेट में आने का जोखिम रहता है। संयुक्त राष्ट्र ने इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए सदस्य देशों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और नागरिक समाज से सुनामी के जोखिम के बारे में जन-जागरूकता बढ़ाने और आपदा जोखिम कम करने के उपाय साझा करने का आह्वान किया।
महासभा का प्रस्ताव 22 दिसंबर 2015 को बिना मतदान के अपनाया गया था। प्रस्ताव में शुरुआती चेतावनी प्रणालियों, समय पर सूचना प्रसारित करने, पारंपरिक ज्ञान के उपयोग और आपदा के बाद बेहतर पुनर्निर्माण यानी ‘Build Back Better’ के महत्व पर जोर दिया गया। संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (UNDRR) इस दिवस के आयोजन में संयुक्त राष्ट्र की अन्य संस्थाओं के साथ समन्वय करता है।
5 नवंबर की तारीख के पीछे 1854 की कहानी
इस दिवस की तारीख जापान के वाकायामा क्षेत्र से जुड़ी ‘इनामुरा-नो-ही’ की लोककथा से प्रेरित है। 5 नवंबर 1854 को आए अनसेई नानकाई भूकंप के बाद समुद्र में सुनामी का खतरा पैदा हुआ। कहानी के अनुसार, एक ग्रामीण ने समुद्र के असामान्य व्यवहार को देखकर आसन्न खतरे का अंदेशा लगाया। उसने अपनी धान की कटी हुई बालियों के ढेर में आग लगा दी, ताकि गांव के लोग आग देखकर ऊंचे स्थान की ओर भागें। इस चेतावनी से कई लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का अवसर मिला।

इस घटना को केवल साहस की कहानी के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, खतरे के संकेत पहचानने और समुदाय को तुरंत सचेत करने के उदाहरण के रूप में याद किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में भी 5 नवंबर की तारीख इसी प्रसंग से जोड़ी गई है। जापान ने 2015 में विश्व स्तर पर इस दिवस की स्थापना का प्रस्ताव रखा था।
सुनामी क्या है और यह कैसे आती है?
सुनामी सामान्य समुद्री लहरों से अलग होती है। समुद्र के भीतर या उसके आसपास अचानक बड़े पैमाने पर पानी का विस्थापन होने से सुनामी उत्पन्न हो सकती है। इसका सबसे आम कारण समुद्र तल के नीचे आने वाला शक्तिशाली भूकंप है, विशेषकर तब जब समुद्र तल का कोई हिस्सा अचानक ऊपर या नीचे खिसकता है। इसके अलावा समुद्र के भीतर भूस्खलन, ज्वालामुखीय गतिविधि और दुर्लभ परिस्थितियों में अन्य बड़े प्राकृतिक घटनाक्रम भी सुनामी पैदा कर सकते हैं।
खुले समुद्र में सुनामी की लहरें बहुत तेज गति से आगे बढ़ सकती हैं और कई बार जहाजों को उनका एहसास भी नहीं होता। लेकिन तट के पास उथले पानी में पहुंचते ही लहरों की गति घटती है और पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। सुनामी हमेशा एक अकेली विशाल लहर के रूप में नहीं आती; कई लहरें क्रमशः पहुंच सकती हैं और पहली लहर जरूरी नहीं कि सबसे बड़ी हो। इसलिए पहली लहर गुजर जाने के बाद भी खतरा समाप्त मानना खतरनाक है।
सुनामी को केवल समुद्र में उठने वाली ऊंची लहर समझना भी गलत है। तट पर यह तेजी से बढ़ते जलस्तर, तेज बहाव या मलबे से भरे बाढ़ जैसे प्रवाह के रूप में पहुंच सकती है। इसकी ताकत इमारतों, सड़कों, बंदरगाहों और तटीय बस्तियों को नुकसान पहुंचा सकती है।

2004 की हिंद महासागर सुनामी ने दुनिया को क्या सिखाया?
26 दिसंबर 2004 को सुमात्रा के निकट समुद्र के भीतर आए शक्तिशाली भूकंप के बाद हिंद महासागर में विनाशकारी सुनामी आई। इंडोनेशिया, श्रीलंका, भारत, थाईलैंड और कई अन्य देशों के तटीय इलाकों में भारी तबाही हुई। लाखों लोग प्रभावित हुए और दो लाख से अधिक लोगों की जान गई। इस आपदा ने दिखाया कि सुनामी का खतरा केवल भूकंप के केंद्र के पास तक सीमित नहीं रहता; समुद्र के पार स्थित देशों के तट भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।
इस त्रासदी के बाद हिंद महासागर क्षेत्र में सुनामी चेतावनी और जोखिम न्यूनीकरण की व्यवस्था विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया। भारत ने भी अपनी राष्ट्रीय सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में तेजी से काम किया। आपदा ने यह स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक निगरानी के साथ-साथ चेतावनी को आम लोगों तक पहुंचाना, निकासी मार्ग तैयार रखना और नियमित अभ्यास कराना उतना ही जरूरी है।
भारत की सुनामी चेतावनी व्यवस्था
भारत में भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS), हैदराबाद स्थित भारतीय सुनामी पूर्व चेतावनी केंद्र (ITEWC) के माध्यम से सुनामी संबंधी निगरानी और परामर्श जारी करता है। यह केंद्र पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन काम करता है और 24 घंटे सक्रिय रहता है। इसकी प्रणाली भूकंपीय केंद्रों, समुद्र तल के दबाव मापने वाले उपकरणों, ज्वारमापी और समुद्री निगरानी नेटवर्क से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करती है।
भारत की सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली अक्टूबर 2007 में पूरी तरह परिचालन में आई। इसका उद्देश्य संभावित सुनामी का आकलन कर संबंधित प्रशासन और तटीय क्षेत्रों के लिए समय पर परामर्श जारी करना है। INCOIS हिंद महासागर क्षेत्र के अन्य देशों को भी क्षेत्रीय सुनामी सेवा प्रदाता के रूप में चेतावनी संबंधी सेवाएं देता है। चेतावनी मिलने के बाद स्थानीय और राज्य प्रशासन की भूमिका लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने तथा निकासी आदेश लागू करने में महत्वपूर्ण होती है।

सुनामी के प्राकृतिक संकेत कैसे पहचानें?
तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को आधिकारिक चेतावनी के साथ प्राकृतिक संकेतों की जानकारी भी होनी चाहिए। कई बार स्थानीय सुनामी के मामले में आधिकारिक संदेश आने से पहले ही खतरा तट तक पहुंच सकता है। ऐसे में निम्न संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए:
- तट के पास तेज या लंबे समय तक महसूस होने वाला भूकंप।
- समुद्र से असामान्य, तेज गर्जना या ट्रेन जैसी आवाज सुनाई देना।
- समुद्र के पानी का अचानक बहुत पीछे हट जाना या असामान्य रूप से तेजी से ऊपर चढ़ना।
- समुद्र में असामान्य तेज बहाव या पानी की दीवार जैसी स्थिति दिखाई देना।
इनमें से कोई संकेत दिखे तो आधिकारिक संदेश की प्रतीक्षा किए बिना समुद्र तट से दूर और ऊंचे स्थान की ओर बढ़ना चाहिए।
सुनामी के समय क्या करें और क्या न करें?
- तुरंत ऊंचे स्थान पर जाएं: समुद्र तट, नदी के मुहाने और निचले तटीय इलाकों से दूर निकलें। निर्धारित निकासी मार्गों का पालन करें।
- आधिकारिक निर्देशों पर भरोसा करें: स्थानीय प्रशासन, आपदा प्रबंधन अधिकारियों और आधिकारिक चेतावनी प्रणालियों से मिली सूचना का पालन करें।
- समुद्र देखने के लिए तट पर न रुकें: लहरों को देखने, वीडियो बनाने या सामान लेने के लिए जोखिम वाले क्षेत्र में वापस न जाएं।
- पहली लहर के बाद वापस न लौटें: कई लहरें आ सकती हैं और खतरा कई घंटों तक बना रह सकता है। प्रशासन की सुरक्षित वापसी संबंधी घोषणा का इंतजार करें।
- परिवार की योजना पहले बनाएं: निकासी मार्ग, मिलने का स्थान, आपातकालीन संपर्क और जरूरी दवाओं तथा दस्तावेजों वाला आपातकालीन बैग पहले से तैयार रखें।
- बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांग व्यक्तियों की सहायता करें: सामुदायिक निकासी योजना में उन लोगों की जरूरतों को शामिल करें जिन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचने में अतिरिक्त मदद चाहिए।
जागरूकता, अभ्यास और सामुदायिक तैयारी का महत्व
विश्व सुनामी जागरूकता दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य जोखिम वाले समुदायों को ऐसा ज्ञान और तैयारी देना है, जिससे चेतावनी मिलने पर वे बिना देर किए कार्रवाई कर सकें। स्कूलों, पंचायतों, स्थानीय निकायों, मछुआरा समुदायों, पर्यटन प्रतिष्ठानों और प्रशासन को मिलकर निकासी अभ्यास, जन-जागरूकता कार्यक्रम और आपदा प्रतिक्रिया प्रशिक्षण आयोजित करना चाहिए।
तटीय इलाकों में स्पष्ट संकेतक, सुरक्षित ऊंचे स्थान, सुगम निकासी मार्ग, बहुभाषी चेतावनी संदेश और भरोसेमंद संचार व्यवस्था जीवन बचाने में मदद कर सकती है। सुनामी के खतरे को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं, लेकिन विज्ञान, स्थानीय अनुभव, समय पर चेतावनी और सामुदायिक तैयारी के मेल से इसके विनाशकारी प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है।

5 नवंबर का यह दिवस दुनिया को यही संदेश देता है कि आपदा के समय कुछ मिनटों की सही जानकारी और त्वरित कार्रवाई सैकड़ों-हजारों जिंदगियां बचा सकती है। सुनामी से सुरक्षा की शुरुआत चेतावनी आने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले की तैयारी से होती है।
