किराएदार मालिक के भाई से हुए समझौते और किराया भुगतान का पुख्ता सबूत नहीं दे सका; कोर्ट ने उसे वैध किराएदार नहीं माना
नई दिल्ली: किराए के मकान या दुकान में रहने वाले लोगों के लिए Madras High Court का एक हालिया फैसला अहम है। अदालत ने एक ऐसे व्यक्ति को बेदखली से सुरक्षा देने से इनकार कर दिया, जिसने खुद को किराएदार बताते हुए एक अनरजिस्टर्ड रेंट एग्रीमेंट का सहारा लिया था।
समस्या यह थी कि कथित समझौता संपत्ति के मालिक ने नहीं, बल्कि उसके भाई ने किया था। किराएदार यह साबित नहीं कर सका कि उस भाई के पास संपत्ति किराए पर देने का कानूनी अधिकार था। साथ ही, किराया दिए जाने का भी पर्याप्त सबूत रिकॉर्ड पर नहीं था।
मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस आर. शक्तिवेल ने 21 सितंबर 2026 को इस मामले में फैसला सुनाया। मामला तमिलनाडु की एक संपत्ति से जुड़ा था और इसकी कानूनी लड़ाई करीब 37 साल तक चली। मुकदमा 1989 में शुरू हुआ था और फैसला 2026 में आया। इस दौरान मूल किराएदार की मृत्यु हो गई और उसके परिवार ने मामले को आगे बढ़ाया।

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने केवल एक कागज मौजूद होने को पर्याप्त नहीं माना। किसी व्यक्ति को किराएदार के रूप में कानूनी संरक्षण पाने के लिए यह दिखाना भी जरूरी है कि वास्तव में landlord-tenant relationship था और जिस व्यक्ति ने agreement किया, उसके पास ऐसा करने का अधिकार था। Pasted text
क्या था पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के कांतासामी वाथियार स्ट्रीट की संपत्ति से जुड़ा था। दुरई नामक व्यक्ति ने खुद को उस संपत्ति का किराएदार बताते हुए अदालत से राहत मांगी थी।
उसका दावा था कि संपत्ति के मालिक के भाई सिदानंदन ने उसके साथ एक रेंट एग्रीमेंट किया था और उसे वहां दुकान के लिए जगह दी थी।
लेकिन संपत्ति के मालिक सदासिवम का पक्ष अलग था। उनका कहना था कि सिदानंदन को संपत्ति के एक हिस्से का इस्तेमाल केवल दुकान चलाने के लिए करने की अनुमति थी। उन्हें उस हिस्से को किसी दूसरे व्यक्ति को किराए पर देने का अधिकार नहीं दिया गया था।

यही अंतर बाद में पूरे मुकदमे का सबसे अहम कानूनी मुद्दा बन गया।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
रिपोर्ट के मुताबिक, 1989 में संपत्ति के मालिक और उनके बेटों की ओर से परिसर में कार्रवाई किए जाने के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। धर्मपुरी पुलिस स्टेशन ने दोनों पक्षों को अदालत जाने की सलाह दी।
इसके बाद दुरई ने अदालत का रुख किया और ऐसी राहत मांगी जिससे उसे संपत्ति से हटाया न जा सके।
मामला वर्षों तक चलता रहा। इस बीच संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर परिवार के भीतर भी विवाद था। अलग title dispute में भी अदालत को यह तय करना था कि संबंधित संपत्ति पर किसका अधिकार है।

18 मार्च 2026 को मद्रास हाईकोर्ट ने उस अलग मालिकाना विवाद में सदासिवम के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद किराएदारी से जुड़ा विवाद भी महत्वपूर्ण हो गया, क्योंकि किराएदार जिस व्यक्ति के साथ agreement का दावा कर रहा था, उसके पास खुद संपत्ति का मालिकाना हक नहीं था।
किराएदार का Rent Agreement क्यों कमजोर पड़ा?
दुरई के पास एक रेंट एग्रीमेंट था, लेकिन वह unregistered था।
इस agreement में कथित तौर पर मासिक किराया 150 रुपये था। लेकिन अदालत के सामने सिर्फ agreement पेश कर देना पर्याप्त नहीं रहा।
कोर्ट ने पाया कि दुरई यह साबित नहीं कर सके कि:

- Agreement वास्तव में सिदानंदन ने किया था।
- सिदानंदन के पास संपत्ति किराए पर देने का अधिकार था।
- दुरई ने वास्तव में तय किराया चुकाया था।
- सिदानंदन ही वैध landlord थे।
अदालत ने यह भी नोट किया कि दुरई ने उस व्यक्ति सिदानंदन को गवाह के रूप में पेश नहीं किया, जिसके साथ कथित तौर पर agreement हुआ था।
यही वजह है कि कोर्ट ने किराएदारी के दावे को पर्याप्त रूप से साबित हुआ नहीं माना।
सिर्फ Rent Agreement होना काफी क्यों नहीं?
यह मामला किराएदारों के लिए एक महत्वपूर्ण practical lesson देता है।
कई लोग मानते हैं कि उनके पास signed rent agreement है, इसलिए उन्हें अपने कब्जे पर कानूनी सुरक्षा मिल जाएगी। लेकिन किसी भी agreement की मजबूती इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे sign करने वाला व्यक्ति उस संपत्ति के संबंध में कानूनी अधिकार रखता था या नहीं।

इस मामले में कथित agreement संपत्ति के मालिक के भाई के साथ था। मालिक का कहना था कि उनके भाई को सिर्फ वहां दुकान चलाने की अनुमति मिली थी। अगर वह व्यक्ति स्वयं मालिक नहीं है और उसके पास property को आगे rent पर देने का अधिकार भी नहीं है, तो उसके द्वारा किया गया agreement विवाद की स्थिति में गंभीर सवालों के घेरे में आ सकता है।
इसलिए किराए पर जगह लेते समय यह जांचना जरूरी है कि agreement करने वाला व्यक्ति वास्तव में कौन है और उसके पास property rent पर देने का अधिकार क्या है।
किराया देने का सबूत भी नहीं था
मामले में एक और बड़ी कमी किराए के भुगतान का सबूत था।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुरई यह साबित नहीं कर सके कि उन्होंने agreement में तय 150 रुपये मासिक किराया वास्तव में चुकाया था।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि उन्होंने विवाद शुरू होने के बाद कथित बकाया किराया अदालत में जमा नहीं कराया।
यह बिंदु खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर कोई व्यक्ति खुद को genuine tenant बताता है और landlord-tenant relationship को लेकर विवाद हो जाता है, तो rent payment का रिकॉर्ड उसके दावे को मजबूत कर सकता है।
बैंक ट्रांसफर, UPI transaction, cheque या signed rent receipt जैसे दस्तावेज बाद में यह दिखाने में मदद कर सकते हैं कि वास्तव में किराया दिया गया था।
Court में Rent जमा न कराने का भी असर
मद्रास हाईकोर्ट ने इस बात को भी महत्व दिया कि विवाद के दौरान दुरई ने कथित किराया अदालत में जमा नहीं कराया।

रिपोर्ट के मुताबिक, संपत्ति के मालिक ने बाद में उसे 500 रुपये मासिक किराया देने या परिसर खाली करने को कहा था। दुरई ने न तो इस मांग के अनुसार किराया दिया और न ही संपत्ति खाली की। इसके बजाय उन्होंने अदालत में मुकदमा जारी रखा।
अदालत ने इस पूरे आचरण को देखते हुए उनके tenant होने के दावे पर भरोसा नहीं किया।
Court ने क्या कहा?
मद्रास हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता न तो वैध किराएदार साबित हुआ और न ही lawful occupant।
अदालत के अनुसार, ऐसी स्थिति में वह वास्तविक मालिक के खिलाफ injunction यानी बेदखली रोकने का आदेश नहीं मांग सकता।

यहां “injunction” का अर्थ सामान्य तौर पर ऐसा न्यायिक आदेश है जिसके जरिए किसी पक्ष को कोई कार्रवाई करने से रोका जाता है। इस मामले में किराएदार ऐसी सुरक्षा चाहता था जिससे उसे संपत्ति से हटाया न जा सके।
लेकिन अदालत ने उसकी tenancy ही पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं मानी।
क्या हर Unregistered Rent Agreement बेकार है?
नहीं।
यह distinction बहुत जरूरी है।

इस फैसले को यह कहकर समझना गलत होगा कि भारत में हर unregistered rent agreement अपने आप अमान्य है या ऐसे agreement वाले हर किराएदार को बेदखली से कोई सुरक्षा नहीं मिलेगी।
इस मामले में कई परिस्थितियां एक साथ थीं—agreement मालिक के भाई के साथ था, उस व्यक्ति के authority का पर्याप्त प्रमाण नहीं था, किराए के भुगतान का सबूत नहीं था और agreement करने वाले व्यक्ति को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया।
यानी अदालत का फैसला इस विशेष मामले के facts और उपलब्ध evidence पर आधारित है।
भारत में छोटे या कम अवधि के rental arrangements में unregistered agreements का व्यवहार में इस्तेमाल आम है। लेकिन किसी विवाद की स्थिति में document की legal strength कई बातों पर निर्भर करती है—tenure, applicable law, stamp duty, registration requirements, parties की authority और उपलब्ध evidence आदि।

इसलिए इस फैसले को “unregistered agreement = कोई अधिकार नहीं” जैसे blanket rule के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
Tenant को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
इस मामले से किराएदारों के लिए कुछ practical lessons निकलते हैं।
- मालिकाना हक जांचें।
जिस व्यक्ति से property rent पर ले रहे हैं, उसकी identity और ownership/authority verify करें। - Agreement में सही पक्ष शामिल करें।
अगर कोई व्यक्ति मालिक की ओर से agreement कर रहा है तो उसके पास ऐसा करने का अधिकार है या नहीं, यह देखना जरूरी है। - किराया traceable तरीके से दें।
जहां संभव हो, बैंक transfer, UPI या अन्य documented mode इस्तेमाल करें। - Rent receipts संभालकर रखें।
खासकर cash payment की स्थिति में signed receipt महत्वपूर्ण हो सकती है। - Property documents और agreement सुरक्षित रखें।
Agreement, payment records, notices और correspondence भविष्य में evidence बन सकते हैं। - Legal notice को नजरअंदाज न करें।
अगर landlord की ओर से notice मिलता है, तो उसे समझकर समय पर उचित जवाब देना बेहतर है। - विवाद होने पर legal advice लें।
Property और tenancy laws में राज्य के अनुसार अलग-अलग नियम लागू हो सकते हैं, इसलिए बड़े विवाद में स्थानीय वकील से सलाह लेना उचित है।
Agreement पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति कौन है, यह क्यों जरूरी है?
इस मामले की सबसे बड़ी सीख शायद यही है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने आपको कोई कमरा, दुकान या मकान किराए पर दिया। आपके पास उसका signed agreement भी है। लेकिन बाद में असली मालिक सामने आकर कहता है कि उस व्यक्ति को property rent पर देने का अधिकार ही नहीं था।

तब केवल agreement दिखाना पर्याप्त नहीं हो सकता।
अदालत यह देख सकती है कि agreement करने वाला व्यक्ति कौन था, उसके पास क्या अधिकार था और क्या वास्तविक मालिक ने उसे ऐसी authority दी थी।
इसी वजह से किसी property को किराए पर लेने से पहले केवल “किराया कितना है” और “कब से रहना है” जैसे सवाल ही नहीं, बल्कि “मालिक कौन है और agreement कौन कर रहा है?” यह भी देखना जरूरी है।
37 साल चली कानूनी लड़ाई
इस मामले का एक भावनात्मक पहलू भी है।

कानूनी विवाद 1989 में शुरू हुआ और सितंबर 2026 में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले तक पहुंचा। यानी करीब 37 साल तक मामला चला।
इस दौरान मूल किराएदार दुरई की मृत्यु हो गई। उनके परिवार ने बाद में मुकदमे को आगे बढ़ाया।
इतने लंबे समय तक चलने वाला property dispute यह भी दिखाता है कि शुरुआती चरण में ownership और tenancy से जुड़े दस्तावेजों को स्पष्ट रखना कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस फैसले का आम किराएदार पर क्या असर?
आम किराएदार के लिए इस फैसले का संदेश यह नहीं है कि हर unregistered agreement बेकार है।

असल संदेश है कि किराएदारी साबित करने के लिए पूरा evidence महत्वपूर्ण है।
Agreement के साथ इन दस्तावेजों को भी सुरक्षित रखें:
- Landlord की पहचान
- Property ownership या authority
- Rent payment records
- Tenancy period
- Rent amount
- Correspondence
- Rent receipts
- जरूरत पड़ने पर relevant witnesses
अगर ये चीजें स्पष्ट हैं तो विवाद की स्थिति में tenant का पक्ष मजबूत हो सकता है।
इसके विपरीत, केवल एक ऐसे व्यक्ति के साथ किया गया agreement जो स्वयं property का मालिक नहीं है और जिसके पास rent देने का अधिकार साबित नहीं है, कमजोर पड़ सकता है।
मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण tenancy dispute में उस व्यक्ति को बेदखली से सुरक्षा देने से इनकार कर दिया, जो एक unregistered rent agreement के आधार पर खुद को किराएदार बता रहा था।

अदालत के सामने वह यह पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सका कि agreement करने वाला संपत्ति के मालिक का भाई वास्तव में उसे property rent पर देने का अधिकार रखता था।
वह किराए के भुगतान का भी ठोस सबूत नहीं दे सका और कथित agreement पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया।
इसलिए कोर्ट ने उसे lawful tenant या lawful occupant नहीं माना और वास्तविक मालिक के खिलाफ injunction की राहत देने से इनकार कर दिया।
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि हर unregistered rent agreement अपने आप बेकार हो जाता है। इस मामले का फैसला उसके खास तथ्यों और evidence पर आधारित है।

किराएदारों के लिए सबसे जरूरी सबक यही है—property किसकी है, agreement कौन कर रहा है, उसके पास क्या अधिकार है और किराया वास्तव में कैसे दिया जा रहा है—इन सभी का रिकॉर्ड रखें।
केवल signed paper पर निर्भर रहने के बजाय tenancy से जुड़े पूरे दस्तावेज और payment records सुरक्षित रखना भविष्य के विवाद में बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।
