14 अक्टूबर विशेष | भारतीय क्रिकेट इतिहास
पूरा नाम: सरोबिंदु नाथ बनर्जी | लोकप्रिय नाम: शुटे बनर्जी (Shute Banerjee) | जन्म: 3 अक्टूबर 1911 | निधन: 14 अक्टूबर 1980 | भूमिका: तेज-मध्यम गति के गेंदबाज और उपयोगी निचले क्रम के बल्लेबाज
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे खिलाड़ी हुए हैं, जिनका अंतरराष्ट्रीय करियर भले ही लंबा नहीं रहा, लेकिन घरेलू क्रिकेट और विदेशी दौरों पर उनके प्रदर्शन ने उन्हें रिकॉर्ड बुक में खास जगह दिलाई। शुटे बनर्जी ऐसे ही क्रिकेटरों में शामिल थे। भारत के लिए केवल एक आधिकारिक टेस्ट मैच खेलने वाले इस तेज-मध्यम गति के गेंदबाज ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अपनी उपयोगिता साबित की। इंग्लैंड दौरे पर चंदू सरवटे के साथ उनकी ऐतिहासिक बल्लेबाजी साझेदारी आज भी क्रिकेट इतिहास की यादगार घटनाओं में गिनी जाती है।
14 अक्टूबर 1980 को कोलकाता में शुटे बनर्जी का निधन हो गया था। उनका पूरा नाम सरोबिंदु नाथ बनर्जी था। उन्होंने फरवरी 1949 में वेस्टइंडीज के खिलाफ भारत की ओर से अपना एकमात्र टेस्ट मैच खेला था। हालांकि, उनके करियर की सबसे यादगार उपलब्धियों में 1946 में इंग्लैंड दौरे के दौरान चंदू सरवटे के साथ दसवें विकेट के लिए 249 रन की साझेदारी करना शामिल है।

यह साझेदारी इसलिए ऐतिहासिक थी, क्योंकि टीम के नौ विकेट गिर जाने के बाद दोनों बल्लेबाजों ने पारी को संभाला और शतक भी लगाए। उस समय भारतीय टीम विदेशी परिस्थितियों में अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रही थी। ऐसे में निचले क्रम के दो बल्लेबाजों का इस तरह टिककर खेलना भारतीय क्रिकेट के लिए यादगार उपलब्धि बन गया।
शुटे बनर्जी की कहानी केवल एक रिकॉर्ड साझेदारी तक सीमित नहीं है। यह उस दौर के भारतीय क्रिकेट की भी कहानी है, जब खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीमित अवसर मिलते थे और उनकी प्रतिभा का बड़ा हिस्सा घरेलू मुकाबलों तथा विदेशी दौरों में सामने आता था।
कोलकाता में जन्मे शुटे बनर्जी का शुरुआती जीवन
शुटे बनर्जी का जन्म 3 अक्टूबर 1911 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के कलकत्ता, यानी आज के कोलकाता में हुआ था। उनका पूरा नाम सरोबिंदु नाथ बनर्जी था, लेकिन क्रिकेट जगत में वे शुटे बनर्जी के नाम से पहचाने गए। वह दाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे और दाएं हाथ से तेज-मध्यम गति की गेंदबाजी करते थे।
उनका क्रिकेट करियर ऐसे समय में विकसित हुआ, जब भारत में क्रिकेट का ढांचा आज की तरह व्यापक नहीं था। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में प्रदर्शन करना खिलाड़ियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने का प्रमुख माध्यम था। अंतरराष्ट्रीय मुकाबले भी सीमित होते थे और विदेशी दौरों के लिए चुनी गई टीम में जगह बनाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।

बनर्जी की खासियत यह थी कि वह गेंदबाजी के साथ जरूरत पड़ने पर बल्लेबाजी में भी योगदान दे सकते थे। निचले क्रम में उतरने वाले खिलाड़ी के रूप में उनसे मुख्य रूप से गेंदबाजी की उम्मीद की जाती थी, लेकिन उन्होंने कई मौकों पर बल्ले से भी उपयोगी प्रदर्शन किया।
उनके प्रथम श्रेणी करियर में बंगाल, नवानगर, बिहार और मध्य प्रदेश जैसी टीमों के लिए खेलने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने अपने लंबे घरेलू करियर में कुल 138 प्रथम श्रेणी मैच खेले, जिनमें 3,715 रन बनाए और 385 विकेट लिए।
ये आंकड़े बताते हैं कि उनका योगदान केवल किसी एक यादगार पारी या विदेशी दौरे तक सीमित नहीं था। उन्होंने कई वर्षों तक घरेलू क्रिकेट में सक्रिय रहते हुए बल्लेबाजी और गेंदबाजी, दोनों में अपनी भूमिका निभाई।
1946 का इंग्लैंड दौरा और 249 रन की रिकॉर्ड साझेदारी
शुटे बनर्जी के करियर का सबसे चर्चित अध्याय 1946 में भारतीय टीम के इंग्लैंड दौरे से जुड़ा है। उस दौरे पर भारतीय टीम ने सरे (Surrey) के खिलाफ द ओवल मैदान पर प्रथम श्रेणी मुकाबला खेला। इसी मैच में बनर्जी और चंदू सरवटे ने दसवें विकेट के लिए 249 रन जोड़कर क्रिकेट इतिहास में अपनी जगह बना ली।

भारतीय पारी उस समय बेहद मुश्किल स्थिति में थी। टीम का स्कोर 205 रन पर नौ विकेट था। ऐसे समय में शुटे बनर्जी बल्लेबाजी के लिए उतरे और चंदू सरवटे के साथ मिलकर पारी को संभाला। विपक्षी टीम को उम्मीद रही होगी कि अंतिम विकेट जल्दी गिर जाएगा, लेकिन दोनों बल्लेबाजों ने धैर्य और आत्मविश्वास के साथ बल्लेबाजी जारी रखी।
इस साझेदारी में चंदू सरवटे ने नाबाद 124 रन बनाए, जबकि शुटे बनर्जी ने 121 रन की शानदार पारी खेली। दोनों ने मिलकर 249 रन जोड़े। यह साझेदारी तीन घंटे से अधिक समय तक चली और उस दौर में इंग्लैंड में दसवें विकेट की सबसे बड़ी साझेदारियों में दर्ज हुई।
इस उपलब्धि का सबसे असाधारण पहलू यह था कि दोनों बल्लेबाज पारी के अंतिम दो स्थानों पर उतरे थे। आम तौर पर इन स्थानों पर खेलने वाले खिलाड़ियों से लंबी बल्लेबाजी की अपेक्षा नहीं की जाती। लेकिन सरवटे और बनर्जी ने अपनी भूमिका से कहीं आगे जाकर प्रदर्शन किया।
इस साझेदारी ने भारतीय टीम को मुश्किल स्थिति से उबारने में मदद की। यह भारतीय क्रिकेट के उन उदाहरणों में शामिल हो गई, जहां आखिरी विकेट के बल्लेबाजों ने न केवल टीम को संभाला, बल्कि अपनी बल्लेबाजी से मुकाबले का रुख भी बदल दिया।

नंबर 10 और 11 के बल्लेबाजों के शतक ने बनाया रिकॉर्ड
क्रिकेट में दसवें और ग्यारहवें नंबर पर बल्लेबाजी करने वाले खिलाड़ी सामान्यतः विशेषज्ञ गेंदबाज होते हैं। उनकी मुख्य जिम्मेदारी विपक्षी बल्लेबाजों को आउट करना होती है। ऐसे में दोनों खिलाड़ियों का एक ही पारी में शतक बनाना बेहद दुर्लभ उपलब्धि है।
1946 में सरवटे और बनर्जी ने यही कर दिखाया। सरवटे ने नाबाद 124 रन बनाए, जबकि बनर्जी ने 121 रन की पारी खेली। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में नंबर 10 और नंबर 11 के बल्लेबाजों द्वारा एक ही पारी में शतक लगाने का यह विशिष्ट उदाहरण लंबे समय तक चर्चा में रहा।
इस प्रदर्शन ने यह भी दिखाया कि बल्लेबाजी क्रम में नीचे आने का अर्थ बल्लेबाजी की क्षमता का अभाव नहीं होता। धैर्य, तकनीक और परिस्थितियों के अनुरूप खेलने की क्षमता हो, तो निचले क्रम के खिलाड़ी भी बड़ी साझेदारी कर सकते हैं।
बनर्जी और सरवटे ने गेंदबाजों के सामने विकेट बचाने के साथ-साथ रन बनाने का रास्ता भी निकाला। उन्होंने केवल पिच पर टिके रहने की कोशिश नहीं की, बल्कि अवसर मिलने पर रन भी बटोरे।

आज के क्रिकेट में भी निचले क्रम की साझेदारियां कई मुकाबलों का परिणाम बदल देती हैं। 1946 की यह पारी उस ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में याद की जाती है, जिसने दिखाया कि अंतिम विकेट गिरने तक मुकाबले की संभावनाएं समाप्त नहीं होतीं।
शुटे बनर्जी का अंतरराष्ट्रीय करियर: भारत के लिए केवल एक टेस्ट
शुटे बनर्जी ने भारत के लिए अपना एकमात्र आधिकारिक टेस्ट मैच फरवरी 1949 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में खेला। यह पांच दिवसीय मुकाबला 4 से 8 फरवरी 1949 तक चला।
इस मैच में उन्होंने गेंदबाजी से उल्लेखनीय योगदान दिया। पहली पारी में उन्होंने एक विकेट लिया, जबकि दूसरी पारी में चार विकेट हासिल किए। इस तरह उन्होंने टेस्ट मैच में कुल पांच विकेट लिए। उनके सर्वश्रेष्ठ टेस्ट पारी आंकड़े 4 विकेट पर 54 रन रहे। बल्लेबाजी में उन्होंने दोनों पारियों में क्रमशः 5 और 8 रन बनाए।
हालांकि, उनका अंतरराष्ट्रीय करियर केवल एक टेस्ट तक सीमित रहा, लेकिन इससे उनके घरेलू क्रिकेट में योगदान का महत्त्व कम नहीं हो जाता। उस समय भारत का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कार्यक्रम आज की तुलना में बहुत सीमित था। खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम के लिए नियमित अवसर मिलना आसान नहीं था।

बनर्जी ने घरेलू क्रिकेट और विदेशी दौरों पर अपनी उपयोगिता साबित की थी। उनके प्रथम श्रेणी आंकड़े भी दिखाते हैं कि वह एक ऐसे खिलाड़ी थे, जो गेंदबाजी में नियमित योगदान देने के साथ बल्लेबाजी में भी महत्त्वपूर्ण रन बना सकते थे।
उनका एकमात्र टेस्ट उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का प्रमुख रिकॉर्ड है, लेकिन 1946 की 249 रन की साझेदारी उनकी क्रिकेट विरासत का सबसे चर्चित हिस्सा बनी रही।
घरेलू क्रिकेट में लंबा सफर और बिहार की टीम से जुड़ाव
शुटे बनर्जी का प्रथम श्रेणी करियर लगभग तीन दशकों तक फैला रहा। उन्होंने 1931-32 से 1959-60 के बीच विभिन्न टीमों के लिए क्रिकेट खेला। बंगाल और नवानगर के बाद वह बिहार की टीम से जुड़े और बाद के वर्षों में मध्य प्रदेश की ओर से भी खेले।
बिहार के लिए खेलते हुए उन्होंने कई मौकों पर बल्लेबाजी और गेंदबाजी, दोनों से योगदान दिया। 1948-49 में दिल्ली के खिलाफ एक मुकाबले में उन्होंने हैट्रिक लेकर विशेष ध्यान आकर्षित किया था। घरेलू क्रिकेट में उनकी भूमिका केवल विकेट लेने तक सीमित नहीं थी; जरूरत पड़ने पर वह महत्त्वपूर्ण रन भी बना सकते थे।

उनके करियर के आंकड़े उनकी निरंतरता की कहानी बताते हैं। 138 प्रथम श्रेणी मुकाबलों में 3,715 रन और 385 विकेट उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं। पांच शतक और 11 अर्धशतक यह भी दर्शाते हैं कि वह बल्लेबाजी में उपयोगी योगदान देने की क्षमता रखते थे।
उस समय क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए आज जैसी आर्थिक सुविधाएं, मीडिया कवरेज और व्यावसायिक अवसर उपलब्ध नहीं थे। इसके बावजूद बनर्जी जैसे खिलाड़ियों ने वर्षों तक खेल के प्रति समर्पण बनाए रखा और भारतीय क्रिकेट की नींव मजबूत करने में योगदान दिया।
14 अक्टूबर 1980: भारतीय क्रिकेट ने खोया एक अनुभवी खिलाड़ी
14 अक्टूबर 1980 को शुटे बनर्जी का कोलकाता में निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र 69 वर्ष थी। क्रिकेट के ऐतिहासिक रिकॉर्ड और खिलाड़ी परिचयों में उनकी जन्म तथा निधन की तारीखें दर्ज हैं।
उनके निधन के साथ भारतीय क्रिकेट ने उस पीढ़ी के एक ऐसे खिलाड़ी को खो दिया, जिसने टेस्ट क्रिकेट के सीमित अवसरों के बावजूद प्रथम श्रेणी स्तर पर लंबा करियर बनाया था।

आज जब भारतीय क्रिकेट में अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड, बड़े टूर्नामेंट और आधुनिक खिलाड़ियों की उपलब्धियों पर व्यापक चर्चा होती है, तब शुटे बनर्जी जैसे पुराने खिलाड़ियों का योगदान भारतीय क्रिकेट के विकास की कहानी को पूरा करता है। इन खिलाड़ियों ने उस दौर में खेल को आगे बढ़ाया, जब सुविधाएं कम थीं और अपनी प्रतिभा साबित करने के लिए लगातार घरेलू मुकाबलों में प्रदर्शन करना पड़ता था।
बनर्जी की कहानी यह भी बताती है कि किसी खिलाड़ी की उपलब्धियों का आकलन केवल उसके टेस्ट मैचों की संख्या से नहीं किया जा सकता। घरेलू क्रिकेट में निरंतरता, कठिन परिस्थितियों में प्रदर्शन और ऐतिहासिक उपलब्धियां भी उसकी विरासत का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती हैं।
शुटे बनर्जी की क्रिकेट विरासत
शुटे बनर्जी का नाम भारतीय क्रिकेट इतिहास में मुख्य रूप से 1946 की उस असाधारण साझेदारी के कारण याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने चंदू सरवटे के साथ दसवें विकेट के लिए 249 रन जोड़े थे। दोनों बल्लेबाजों के शतक ने इस प्रदर्शन को और विशिष्ट बना दिया।
उनका अंतरराष्ट्रीय करियर भले ही एक टेस्ट तक सीमित रहा, लेकिन प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनका योगदान कहीं अधिक व्यापक था। 385 विकेट और 3,715 रन उनके लंबे और उपयोगी करियर के प्रमाण हैं।

इस ऐतिहासिक साझेदारी की अहमियत केवल उसके रनों में नहीं है। यह क्रिकेट की उस भावना को भी दर्शाती है, जिसमें मुश्किल परिस्थिति में भी खिलाड़ी धैर्य, कौशल और साझेदारी के दम पर मुकाबले को बदल सकते हैं।
14 अक्टूबर को शुटे बनर्जी की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना भारतीय क्रिकेट के उस दौर को याद करना है, जब खिलाड़ियों ने सीमित संसाधनों और कम अंतरराष्ट्रीय अवसरों के बावजूद अपने प्रदर्शन से इतिहास रचा। चंदू सरवटे के साथ उनकी 249 रन की साझेदारी आज भी इस बात का उदाहरण है कि क्रिकेट में अंतिम विकेट तक उम्मीद बाकी रहती है।
