बेटी के सपनों की पहली साथी थीं कृष्णा, कभी अभिनय के लिए बढ़ाया हौसला तो कभी स्क्रीन टेस्ट खराब लगने पर निर्माता से कह दिया था—रानी को फिल्म में मत लो
मुंबई। बॉलीवुड अभिनेत्री रानी मुखर्जी की जिंदगी का वह रिश्ता टूट गया, जिसे वह अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती रही हैं। रानी की मां और पूर्व प्लेबैक सिंगर कृष्णा मुखर्जी का मंगलवार दोपहर 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। परिवार की ओर से जारी बयान में इसकी पुष्टि की गई।
परिवार ने इस कठिन समय में मिल रहे प्यार, प्रार्थनाओं और समर्थन के लिए आभार जताते हुए लोगों से निजता का सम्मान करने की अपील की है। निधन की वजह के बारे में परिवार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है।
कृष्णा मुखर्जी का जाना रानी के लिए सिर्फ एक माँ को खोना नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व के उस सबसे अहम और जरूरी हिस्से को खो देना है जिसने उनके जीवन और करियर की नींव रखी।
वह सिर्फ उनकी माँ नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी मार्गदर्शक, ताकत और उनका आत्मबल थीं; जिनके बिना रानी की हर सफलता अधूरी है और उनका जाना रानी के जीवन में एक ऐसा खालीपन दे गया है, जिसे कभी भरा नहीं जा सकता।”
रानी ने कई मौकों पर अपनी मां के प्रभाव और अपने करियर में उनकी भूमिका के बारे में बात की है। अभिनय की दुनिया में कदम रखने का फैसला भी रानी ने अपनी मां के प्रोत्साहन के बाद ही आगे बढ़ाया था।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यही मां अपनी बेटी की तारीफ करने के बजाय उसकी पहली परीक्षा में इतनी ईमानदार थीं कि उन्होंने निर्माता को उसे फिल्म में लेने से तक मना कर दिया था।
पहली स्क्रीन टेस्ट के बाद मां ने कहा था- बेटी को फिल्म में मत लो
रानी मुखर्जी ने 2025 में एक इंटरव्यू में अपने शुरुआती दिनों का यह किस्सा साझा किया था। उन्होंने बताया था कि जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘राजा की आएगी बारात’ के लिए स्क्रीन टेस्ट दिया, तो कृष्णा मुखर्जी को उनका प्रदर्शन बिल्कुल पसंद नहीं आया।
फिल्म के निर्माता रानी को साइन करने के लिए उत्सुक थे, लेकिन उनकी मां ने निर्माता से साफ कह दिया कि उनकी बेटी को फिल्म में लेने से फिल्म को नुकसान हो सकता है।
रानी ने बताया था कि उनकी मां ने स्क्रीन टेस्ट देखकर समझ लिया था कि उस समय वह कैमरे के सामने अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रही थीं। इसलिए उन्होंने निर्माता को अपनी बेटी को साइन न करने की सलाह दी।
यह किस्सा कृष्णा मुखर्जी के व्यक्तित्व की एक अलग तस्वीर सामने लाता है। वह बेटी की मां थीं, लेकिन उसकी गलतियों पर पर्दा डालने वाली मां नहीं। उन्हें लगा कि रानी को अभी और मेहनत की जरूरत है, तो उन्होंने वही बात सामने रख दी। शायद यही साफगोई बाद में रानी के अभिनय सफर की मजबूती का हिस्सा बनी।
खुद भी संगीत की दुनिया से थीं जुड़ी
कृष्णा मुखर्जी एक पूर्व प्लेबैक सिंगर (पार्श्व गायिका) थीं, जिन्हें हिंदी और बंगाली सिनेमा में उनके योगदान के लिए जाना जाता है। उनका जन्म 1951 के आसपास हुआ था और वे बंगाली सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री देबाश्री रॉय की बड़ी बहन थीं।
कृष्णा जी का विवाह प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक और ‘फ़िल्मालय स्टूडियोज’ के सह-संस्थापक राम मुखर्जी से हुआ था। उन्होंने 21 मार्च 1978 को मुंबई में अपनी बेटी रानी मुखर्जी को जन्म दिया, जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित अभिनेत्रियों में से एक बनीं। रानी के अलावा उनका एक बेटा भी है, जिनका नाम राजा मुखर्जी है और वे एक फिल्म निर्माता हैं।
एक गायिका के रूप में, कृष्णा मुखर्जी ने कई फिल्मों के लिए गाने गाए। उन्होंने मुख्य रूप से संगीत निर्देशक बप्पी लाहिड़ी के निर्देशन में बनी फिल्म हैवान (1977) में “जाने ना जाने ना दिल लेना दिल लेना” और अमित कुमार के साथ “मान ना मान मैं तेरी मेहमान” जैसे गीतों में अपनी आवाज़ दी थी।
इसके अलावा उन्होंने तीसरी आँख (1982) और बंगाली फिल्म तोमार रक्ते आमार सोहाग (1993) जैसी फिल्मों के लिए भी प्लेबैक सिंगिंग की। रानी मुखर्जी ने अक्सर अपने साक्षात्कारों में यह साझा किया था कि वे खुद कभी अभिनेत्री नहीं बनना चाहती थीं, लेकिन यह उनकी माँ कृष्णा मुखर्जी की ही इच्छा और प्रेरणा थी जिसके कारण उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा और अपार सफलता पाई।
बेटी की कामयाबी के पीछे मां की छाया
रानी मुखर्जी ने आगे चलकर हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन इस सफर की शुरुआत में कृष्णा मुखर्जी की भूमिका केवल एक मां की नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक की भी रही। उन्होंने बेटी को आगे बढ़ने का अवसर दिया, लेकिन साथ ही उसकी कमियों को भी उसी स्पष्टता से बताया।
मां-बेटी के रिश्ते की यही तस्वीर शायद सबसे ज्यादा भावुक करती है—एक तरफ बेटी के सपने को पंख देने वाली मां और दूसरी तरफ उसी सपने को लेकर पहली परीक्षा में कठोर सच बोल देने वाली मां। कृष्णा ने रानी को केवल यह नहीं सिखाया कि मंच पर कैसे खड़ा होना है, बल्कि यह भी समझाया कि अपने काम को ईमानदारी से देखना कितना जरूरी है।
शायद आज के बाद, रानी मुखर्जी ने अपने करियर में जो अपार सफलता हासिल की है, उसके पीछे मिलने वाली दर्शकों की तालियाँ, सम्मान और प्रशंसा के बीच उनकी माँ की वह हौसला बढ़ाने वाली आवाज़ प्रत्यक्ष (साक्षी) रूप से मौजूद न हो; लेकिन उनकी माँ का प्यार, उनकी दी हुई शिक्षा और यादें हमेशा रानी के दिल और यादों में जीवित रहेंगी और उनका मार्गदर्शन करती रहेंगी।”
परिवार ने इस शोक की घड़ी में लोगों से निजता बनाए रखने की अपील की है। कृष्णा मुखर्जी की आवाज भले अब सुनाई न दे, लेकिन उनका असर उनकी बेटी के जीवन और सिनेमा के सफर में सदा के लिए दर्ज रहेगा।