राहुल के आरोप बनाम EC का जवाब: 14 आपत्तियां, SIR और वोटर डेटा पर पूरा विवाद समझिए
नई दिल्ली, 24 सितंबर 2026। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए और उनके इस्तीफे की मांग की।
राहुल गांधी ने दावा किया कि चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़े सवालों को नजरअंदाज किया गया।
राहुल गांधी के आरोप ऐसे समय आए हैं, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में मतदाता सूची, Form-6, चुनावी डेटा के सॉफ्टवेयर और कुछ अन्य प्रक्रियाओं से जुड़े मुद्दों का उल्लेख है।
इसके जवाब में चुनाव आयोग ने कहा कि अलग-अलग राय, टिप्पणियां और सुझाव किसी संस्थान की निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक पिछले एक साल में लिए गए फैसले, जिनमें SIR भी शामिल है, पूरे आयोग के सर्वसम्मत फैसले रहे हैं।
अब सवाल यह है कि विवाद आखिर है क्या? राहुल गांधी क्या पूछ रहे हैं और चुनाव आयोग का जवाब क्या है? इसे आसान भाषा में समझिए।
राहुल गांधी के मुख्य सवाल क्या हैं?
राहुल गांधी का सबसे बड़ा सवाल चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग मतदाता के वोट का संरक्षक है और यदि मतदाता सूची तथा वोट की प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसे का सवाल खड़ा होता है।

उन्होंने अपने आरोपों को पहले सामने रखे गए मतदाता सूची संबंधी दावों और अब सामने आई आयोग के भीतर की आपत्तियों से जोड़ा।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि वह केवल राजनीतिक बयान नहीं दे रहे हैं बल्कि उनके पास इसके समर्थन में जानकारी और सबूत हैं। उन्होंने भविष्य में और जानकारी सार्वजनिक करने की बात भी कही।
उनकी दूसरी बड़ी आपत्ति मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि जिन मुद्दों को वह पहले से उठाते रहे हैं, अब दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों से भी वे सवाल जुड़े दिखाई देते हैं। इसी आधार पर उन्होंने ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग की।
14 आपत्तियों में क्या था?
यह विवाद द इंडियन एक्सप्रेस की उस जांच रिपोर्ट के बाद तेज हुआ, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित तौर पर आपत्ति दर्ज की।
रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख है, उनमें मुख्य रूप से:
- नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़ा Form-6;
- मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया;
- मतदाता डेटा और उसके डिजिटल सिस्टम तक पहुंच;
- चुनावी रोल के सॉफ्टवेयर के संचालन और नियंत्रण;
- पश्चिम बंगाल में बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ दायर अपीलों से जुड़े सवाल;
- आयोग के भीतर कुछ प्रशासनिक और कार्य-विभाजन संबंधी फैसले शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की कुछ आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
Form-6 पर विवाद क्या है?
Form-6 वह आवेदन है, जिसका इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस फॉर्म में SIR से संबंधित एक नया सवाल जोड़ा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी और सुखबीर सिंह संधू ने भी उस पर सहमति जताई थी। बाद में संधू ने अगस्त में इस बदलाव को हटाने की मांग करते हुए इसे “unauthorised/illegal” बताया था।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रिपोर्ट में दर्ज अधिकारियों की आपत्ति है; इसे अदालत द्वारा अवैध घोषित किया गया फैसला समझना सही नहीं होगा।
मतदाता डेटा को लेकर क्या सवाल उठा?
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन से जुड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर चिंता जताई कि मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच कहीं सीमित तो नहीं हो रही। विवेक जोशी ने डेटाबेस के संभावित केंद्रीकरण को लेकर ऑडिट की जरूरत बताई थी, जबकि संधू ने भी बाद में राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच से संबंधित सवाल उठाए।
यही वह मुद्दा है जिसे राहुल गांधी और विपक्ष चुनावी पारदर्शिता के व्यापक सवाल से जोड़ रहे हैं।
फिर चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया?
चुनाव आयोग ने इस विवाद को बिल्कुल अलग तरीके से देखा है।
ECI का कहना है कि किसी संस्थान में अलग-अलग राय होना अपने आप में असामान्य या गलत बात नहीं है। आयोग के मुताबिक लिखित टिप्पणियां, सुझाव, तकनीकी आपत्तियां और आंतरिक जांच-पड़ताल निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
सबसे महत्वपूर्ण जवाब यह है कि आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं, जिसमें SIR और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े फैसले भी शामिल हैं। आयोग ने यह भी कहा कि केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखकर पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती, क्योंकि इस अवधि में आयोग ने बड़ी संख्या में फैसले, निर्देश और चुनावी सुधार भी किए हैं।
आयोग ने यह भी कहा कि सिर्फ तीन चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का कोई भी अधिकारी चुनाव प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए सुझाव दे सकता है।
लेकिन क्या आयोग ने 14 आपत्तियों को खारिज किया?
यहां विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग ने इन आंतरिक नोट्स के अस्तित्व को सीधे नकारा नहीं है। उसने इन्हें निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का कहना है कि आयोग के जवाब में उन सभी विशिष्ट आपत्तियों पर यह विस्तार से नहीं बताया गया कि उन्हें कैसे सुलझाया गया।
यानी यहां दो अलग-अलग दावे हैं—
राहुल गांधी/विपक्ष का सवाल: अगर दो चुनाव आयुक्तों ने बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं, तो इन आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई और किस स्तर पर फैसला हुआ?
चुनाव आयोग का जवाब: अलग-अलग टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न है।
SIR क्या है और विवाद क्यों बढ़ा?
SIR यानी Special Intensive Revision, मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और उसमें जरूरी सुधार करना है।
इस प्रक्रिया को लेकर विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम जुड़ना या हटना सीधे उसके मतदान के अधिकार से जुड़ा है। इसलिए राजनीतिक दलों की आपत्तियों के साथ-साथ यह प्रशासनिक और संवैधानिक सवाल भी बन जाता है कि सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, सत्यापन योग्य और जवाबदेह है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार SIR से जुड़े विवाद में 13 करोड़ से अधिक नामों के ड्राफ्ट रोल से हटने का उल्लेख किया गया है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची से नाम हटना अंतिम रूप से मतदान का अधिकार समाप्त होना नहीं माना जा सकता, क्योंकि दावे-आपत्तियों और सुधार की प्रक्रिया अलग होती है।
कानून क्या कहता है?
इस विवाद को समझने के लिए एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है।
इंडियन एक्सप्रेस ने 2023 के कानून की धारा 18 का हवाला देते हुए बताया कि चुनाव आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो कानून में बहुमत के आधार पर निर्णय का प्रावधान है।
इसका अर्थ यह है कि किसी चुनाव आयुक्त की आपत्ति अपने आप में यह साबित नहीं करती कि अंतिम निर्णय अवैध था। लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि आपत्ति दर्ज होने के बाद निर्णय प्रक्रिया क्या रही और उसका रिकॉर्ड क्या कहता है।
जनता के लिए असली सवाल क्या है?
इस पूरे विवाद को केवल राहुल गांधी बनाम चुनाव आयोग की राजनीतिक लड़ाई के रूप में देखना अधूरा होगा।
जनता के लिए तीन सवाल सबसे महत्वपूर्ण हैं:
पहला— मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?
दूसरा— अगर आयोग के अंदर किसी निर्णय पर आपत्ति दर्ज हुई, तो उस आपत्ति का निपटारा कैसे किया गया?
तीसरा— चुनावी डेटा और सॉफ्टवेयर पर किस स्तर के अधिकारियों की वैधानिक पहुंच है और उसमें बदलाव का पूरा ऑडिट ट्रेल उपलब्ध है या नहीं?
इन सवालों के जवाब दस्तावेजों, नियमों और आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलना ज्यादा महत्वपूर्ण है, बजाय इसके कि केवल राजनीतिक आरोप और राजनीतिक बचाव को अंतिम सत्य मान लिया जाए।
विवाद का असली केंद्र ‘किसने क्या कहा’ नहीं ‘रिकॉर्ड में क्या है ये जरूरी है
इस पूरे विवाद में दो स्तर अलग-अलग रखना जरूरी है।
एक तरफ राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं और CEC के इस्तीफे की मांग की है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताया है और आंतरिक टिप्पणियों को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है।
दूसरी तरफ, 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट में जो मुद्दे सामने आए हैं—Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटा तक पहुंच, अपीलों की प्रक्रिया और प्रशासनिक अधिकार—वे ऐसे विषय हैं जिन्हें केवल राजनीतिक बयान के आधार पर नहीं, बल्कि मूल दस्तावेजों और कार्रवाई के रिकॉर्ड के आधार पर परखा जाना चाहिए।
इसलिए फिलहाल सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां सामने आई हैं, आयोग ने उनके अस्तित्व को सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया है और अंतिम फैसलों को सर्वसम्मत कहा है; जबकि राहुल गांधी इन आपत्तियों को चुनावी प्रक्रिया पर अपने पुराने आरोपों के समर्थन के रूप में पेश कर रहे हैं।
इन आरोपों से चुनावी गड़बड़ी कानूनी रूप से सिद्ध हो गई है—ऐसा कहना अभी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। उसी तरह, केवल आयोग के सर्वसम्मति वाले बयान से यह भी तय नहीं हो जाता कि हर उठाई गई आपत्ति का निपटारा किस तरह हुआ। इसका जवाब विस्तृत रिकॉर्ड और संबंधित प्रक्रियाओं की स्वतंत्र जांच से ही स्पष्ट होगा।
यही वजह है कि इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल किसी एक नेता या संस्था का पक्ष लेना नहीं, बल्कि यह देखना है कि भारत की मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, सत्यापन योग्य और जवाबदेह है।