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बिहार में जमीन सर्वे पर सरकार सख्त, 15 दिन का अल्टीमेटम, हर सोमवार खुलेगा मौजावार प्रगति का हिसाब

प्रशांत कुमार
Last updated: सितम्बर 24, 2026 8:02 अपराह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 19 घंटे पहले
बिहार भूमि सर्वे पर सरकार सख्त, 15 दिन का अल्टीमेटम
बिहार भूमि सर्वे पर सरकार सख्त, 15 दिन का अल्टीमेटम
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पटना, 24 सितंबर 2026। बिहार में जमीन के रिकॉर्ड को दुरुस्त करने के लिए चल रहे विशेष भूमि सर्वेक्षण की धीमी रफ्तार पर अब राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने सख्त रुख अपनाया है।

विभागीय समीक्षा में राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने साफ कर दिया कि सिर्फ लक्ष्य पूरा करने के लिए जल्दबाजी नहीं होगी, लेकिन अनावश्यक देरी भी स्वीकार नहीं की जाएगी। कम प्रगति वाले जिलों और अंचलों की अलग से समीक्षा होगी और उन्हें अगले 15 दिनों की विशेष कार्ययोजना देनी होगी।

सरकार का फोकस अब सिर्फ यह देखने पर नहीं है कि कितना सर्वे पूरा हुआ, बल्कि इस बात पर भी है कि किस मौजा में काम किस चरण पर अटका है, क्यों अटका है और उसके लिए जिम्मेदार कौन है।

बिहार भूमि सर्वे पर सरकार सख्त
बिहार भूमि सर्वे पर सरकार सख्त

यही वजह है कि हर सोमवार नोडल अधिकारी मौजावार प्रगति की रिपोर्ट देंगे। इसमें सर्वे के अलग-अलग चरणों की स्थिति सामने रखी जाएगी। लगातार खराब प्रदर्शन करने वाले पदाधिकारी और कर्मियों की जवाबदेही तय करने और आवश्यक कार्रवाई की बात भी कही गई है।

जमीन की नापी भर नहीं, मालिकाना हक के रिकॉर्ड को सही करने की कवायद

विशेष भूमि सर्वेक्षण को अक्सर केवल जमीन की नापी समझ लिया जाता है, जबकि इसका मकसद इससे कहीं बड़ा है। सर्वे के जरिए जमीन से जुड़े रिकॉर्ड को व्यवस्थित और अद्यतन करने की कोशिश की जा रही है।

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मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल ने समीक्षा में कहा कि सर्वे में सही रैयत, सही खेसरा, सही रकबा और सही भूमि अभिलेख सुनिश्चित करना जरूरी है।

बिहार में विशेष भूमि सर्वेक्षण की समीक्षा करते अधिकारी
बिहार में विशेष भूमि सर्वेक्षण की समीक्षा करते अधिकारी

इसका सीधा मतलब है कि जमीन के रिकॉर्ड में नाम, खेसरा संख्या, रकबा, चौहद्दी और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच में गलती न हो। क्योंकि रिकॉर्ड में हुई छोटी गलती आगे चलकर आपसी विवाद, दाखिल-खारिज की समस्या या न्यायिक विवाद का कारण बन सकती है।

यानी सरकार के सामने चुनौती दोहरी है—सर्वे की रफ्तार भी बढ़े और रिकॉर्ड की शुद्धता भी बनी रहे।

15 दिन की डेडलाइन क्यों अहम है ?

कम प्रगति वाले जिलों और अंचलों को अगले 15 दिनों की विशेष कार्ययोजना देने को कहा गया है। इस कार्ययोजना में सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि काम धीमा है, बल्कि यह स्पष्ट करना होगा कि देरी की वजह क्या है और उसे दूर करने के लिए आगे क्या किया जाएगा।

इसके जरिए विभाग यह पता करना चाहता है कि समस्या कर्मचारियों की कमी, तकनीकी दिक्कत, दस्तावेजों की उपलब्धता, दावा-आपत्ति या किसी दूसरे प्रशासनिक कारण से है।

लगातार खराब प्रदर्शन और उचित कारण नहीं होने की स्थिति में पदाधिकारी-कर्मियों की जवाबदेही तय करने की बात कही गई है। वहीं बेहतर काम करने वालों को प्रोत्साहित करने का निर्देश दिया गया है।

हर सोमवार सामने आएगा ‘मौजा का रिपोर्ट कार्ड’

सर्वेक्षण की निगरानी के लिए अब साप्ताहिक मौजावार रिपोर्टिंग की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।

नोडल अधिकारी प्रत्येक सोमवार सभी जिलों की प्रगति उपलब्ध कराएंगे। रिपोर्ट में यह देखा जाएगा कि कोई मौजा किस चरण में है और वहां कितना काम पूरा हुआ है।

बिहार में विशेष भूमि सर्वेक्षण की समीक्षा करते अधिकारी
बिहार में विशेष भूमि सर्वेक्षण की समीक्षा करते अधिकारी

सर्वे की प्रक्रिया में प्रमुख रूप से ये चरण शामिल हैं—

स्वघोषणा → खानापुरी → नक्शा → प्रारूप प्रकाशन → दावा-आपत्ति → अंतिम प्रकाशन

इस व्यवस्था का महत्व इसलिए है क्योंकि जिला स्तर पर कुल प्रतिशत देखकर यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि वास्तविक समस्या कहां है। मौजावार निगरानी से यह पता चल सकेगा कि किस गांव या मौजे में काम रुका है और किस चरण में रुका है।

तेजी के चक्कर में रिकॉर्ड गलत हुआ तो बढ़ सकता है विवाद

भूमि सर्वेक्षण में तेजी जरूरी है, लेकिन सरकार ने इसी के साथ रिकॉर्ड की शुद्धता से समझौता नहीं करने की चेतावनी भी दी है।

मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि रैयत का नाम, खेसरा, रकबा, चौहद्दी और उपलब्ध दस्तावेजों का सावधानीपूर्वक सत्यापन किया जाए।

यह बिंदु बेहद महत्वपूर्ण है। अगर किसी जमीन का गलत रकबा दर्ज हो जाए, मालिक का नाम गलत दर्ज हो जाए या चौहद्दी में गलती रह जाए, तो सर्वे पूरा होने के बाद भी विवाद खत्म होने के बजाय नया विवाद पैदा हो सकता है।

इसलिए विशेष भूमि सर्वेक्षण की सफलता का पैमाना सिर्फ “कितने मौजे पूरे हुए” नहीं हो सकता। असली कसौटी यह भी होगी कि कितने रिकॉर्ड सही और विवाद से बचाने लायक तैयार हुए।

दावा-आपत्ति लंबित रही तो सर्वे का मकसद अधूरा

भूमि सर्वेक्षण में रैयतों को अपने दावे और आपत्तियां रखने का अवसर मिलता है। ऐसे में लंबित दावा-आपत्तियों का समय पर निपटारा बेहद महत्वपूर्ण है।

विभागीय सचिव जय सिंह ने समीक्षा के दौरान सभी जिलों के बंदोबस्त अधिकारियों से डेटा के आधार पर बात की और लंबित मामलों को समय-सीमा में पूरा करने पर जोर दिया।

पुराने लंबित मामलों की अधिकारीवार सूची तैयार कर प्राथमिकता के आधार पर उनका निष्पादन करने को कहा गया है।

इसका अर्थ यह है कि अब सिर्फ कुल लंबित मामलों की संख्या नहीं देखी जाएगी, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि किस अधिकारी के पास कितने मामले लंबित हैं और कितने समय से लंबित हैं।

डैशबोर्ड बताएगा—कहां काम हुआ, कहां रुका

विभाग ने निगरानी को डिजिटल तरीके से मजबूत करने पर भी जोर दिया है। डैशबोर्ड के जरिए जिला और अंचलवार लक्ष्य, उपलब्धि, लंबित मामले और देरी के कारण दर्ज किए जाएंगे।

लापरवाह कर्मियों की जानकारी भी इसमें शामिल करने का निर्देश दिया गया है।

इससे समीक्षा सिर्फ बैठक और कागजी रिपोर्ट तक सीमित रहने के बजाय डेटा आधारित बनाने की कोशिश है।

अगर किसी जिले की प्रगति लगातार कम रहती है तो विभाग के पास यह देखने के लिए रिकॉर्ड होगा कि समस्या किस स्तर पर और कितने समय से बनी हुई है।

अधिकारी-कर्मचारी फील्ड में रहें, मौजा में लगे शिविर

सिर्फ कार्यालय से सर्वे की निगरानी करने के बजाय फील्ड में मौजूदगी सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया गया है।

अधिकारियों और कर्मचारियों को फील्ड में उपस्थित रहने तथा मौजा में शिविर लगाकर लोगों की समस्याओं के समाधान का निर्देश दिया गया है।

इसका सीधा फायदा उन रैयतों को मिल सकता है जिन्हें अपने जमीन के रिकॉर्ड, दावे या आपत्ति से संबंधित समस्या के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

जमीन का सही रिकॉर्ड क्यों इतना महत्वपूर्ण है ?

बिहार में जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक सुरक्षा और कई मामलों में पीढ़ियों से जुड़े अधिकार का आधार है। इसलिए भूमि रिकॉर्ड में गलती का असर केवल कागज तक सीमित नहीं रहता।

किसी जमीन पर मालिकाना दावा, विरासत, खरीद-बिक्री, दाखिल-खारिज या दूसरे राजस्व मामलों में रिकॉर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

इसी वजह से विशेष भूमि सर्वेक्षण में गति और शुद्धता के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती है।

अगर सर्वे बहुत धीमा चलता है तो पुराने विवाद और अस्पष्ट रिकॉर्ड लंबे समय तक बने रह सकते हैं। लेकिन अगर लक्ष्य पूरा करने की जल्दबाजी में गलत रिकॉर्ड तैयार हो गए, तो भविष्य में नए विवाद खड़े होने की आशंका रहेगी।

इसलिए विभाग का मौजावार रिपोर्टिंग, लंबित दावा-आपत्तियों की अधिकारीवार निगरानी, डिजिटल डैशबोर्ड और फील्ड कैंप पर जोर इसी समस्या को दो स्तरों पर हल करने की कोशिश दिखाई देता है—काम की रफ्तार और रिकॉर्ड की गुणवत्ता।

अब असली परीक्षा अमल की

सरकार ने समीक्षा में स्पष्ट निर्देश दे दिए हैं—कम प्रगति वाले क्षेत्रों की पहचान, 15 दिन की कार्ययोजना, हर सोमवार मौजावार रिपोर्ट, लंबित मामलों की अधिकारीवार निगरानी और लगातार खराब प्रदर्शन पर जवाबदेही।

अब महत्वपूर्ण यह होगा कि ये निर्देश जमीन पर किस गति से लागू होते हैं।

क्योंकि विशेष भूमि सर्वेक्षण की पूरी प्रक्रिया का अंतिम उद्देश्य केवल आंकड़ों में सर्वे का प्रतिशत बढ़ाना नहीं है। लक्ष्य ऐसा भूमि रिकॉर्ड तैयार करना है जिस पर रैयत भरोसा कर सके और जिसमें भविष्य के विवादों की गुंजाइश कम हो।

यानी अब सर्वे की रफ्तार का हिसाब भी होगा और रिकॉर्ड की शुद्धता का भी।

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