पुण्यतिथि विशेष | 7 नवंबर | भारतीय क्रिकेट
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में पॉली उमरीगर का नाम उस पीढ़ी के प्रतिनिधि बल्लेबाज के रूप में दर्ज है जिसने स्वतंत्रता के बाद देश की टेस्ट क्रिकेट पहचान को मजबूत किया। दमदार बल्लेबाजी, मजबूत कद-काठी, लंबे समय तक क्रीज पर टिकने की क्षमता और जरूरत पड़ने पर गेंद से योगदान देने वाले उमरीगर ने 1948 से 1962 के बीच भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया। वे भारत के कप्तान भी रहे और टेस्ट क्रिकेट में भारत की ओर से पहला दोहरा शतक बनाने का गौरव हासिल किया।
सोलापुर में जन्म और क्रिकेट की शुरुआत
पॉली उमरीगर का पूरा नाम पहलन रतनजी उमरीगर (Pahlan Ratanji Umrigar) था। उनका जन्म 28 मार्च 1926 को महाराष्ट्र के सोलापुर में एक पारसी परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्हें खेलों में रुचि थी। क्रिकेट के साथ वे हॉकी और फुटबॉल भी पसंद करते थे। परिवार के मुंबई चले आने के बाद उनकी पढ़ाई सेंट जेवियर्स कॉलेज में हुई। कॉलेज क्रिकेट और स्थानीय प्रतियोगिताओं में उनके प्रदर्शन ने उन्हें मुंबई के क्रिकेट जगत में पहचान दिलाई।
उन्होंने 1944 में पारसी टीम की ओर से प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया। बाद में वे बॉम्बे की मजबूत घरेलू टीम का हिस्सा बने। उनकी बल्लेबाजी में ताकत और तकनीक का मेल था। वे तेज गेंदबाजों के खिलाफ आक्रामक ड्राइव और हुक शॉट खेलने के लिए जाने जाते थे। उनकी लंबाई और ताकत के कारण उन्हें ‘पाम ट्री हिटर’ (Palm Tree Hitter) का लोकप्रिय उपनाम भी मिला।

1948 में टेस्ट पदार्पण और भारतीय टीम में स्थान
पॉली उमरीगर ने दिसंबर 1948 में मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में वेस्टइंडीज के खिलाफ अपना टेस्ट पदार्पण किया। उस समय भारतीय टीम अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी जगह बना रही थी। उमरीगर ने धीरे-धीरे मध्यक्रम में स्थायी स्थान बनाया और अगले दशक में टीम के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाजों में शामिल हो गए। वे दाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे और आवश्यकता पड़ने पर ऑफ-स्पिन तथा मध्यम गति की गेंदबाजी भी कर सकते थे।
1950 के दशक में भारत के विदेशी दौरों और घरेलू टेस्ट श्रृंखलाओं में उनका प्रदर्शन महत्वपूर्ण रहा। वे कठिन परिस्थितियों में लंबी पारी खेलने की क्षमता रखते थे। इंग्लैंड, वेस्टइंडीज, ऑस्ट्रेलिया और पाकिस्तान जैसी टीमों के विरुद्ध उन्होंने उल्लेखनीय पारियां खेलीं। उनकी बल्लेबाजी में आक्रामकता थी, लेकिन वे पारी को संभालने और टीम की जरूरत के अनुसार खेलने में भी सक्षम थे।
टेस्ट क्रिकेट में भारत का पहला दोहरा शतक
उमरीगर की सबसे ऐतिहासिक उपलब्धियों में भारत की ओर से टेस्ट क्रिकेट में पहला दोहरा शतक बनाना शामिल है। उन्होंने 1955 में हैदराबाद में न्यूजीलैंड के विरुद्ध 223 रन की शानदार पारी खेली। यह भारतीय टेस्ट क्रिकेट के इतिहास का पहला दोहरा शतक था। इस पारी ने उन्हें देश के प्रमुख बल्लेबाजों की श्रेणी में स्थापित कर दिया।
उनका टेस्ट करियर आंकड़ों के लिहाज से भी प्रभावशाली रहा। उन्होंने 59 टेस्ट मैचों की 94 पारियों में 3,631 रन बनाए। उनका बल्लेबाजी औसत 42.22 रहा, जिसमें 12 शतक और 14 अर्धशतक शामिल थे। 223 रन उनका सर्वोच्च टेस्ट स्कोर रहा। 1962 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदाई के समय वे भारत के लिए सर्वाधिक टेस्ट मैच खेलने, सर्वाधिक रन बनाने और सर्वाधिक टेस्ट शतक लगाने वाले बल्लेबाज थे। उनके ये रिकॉर्ड कई वर्षों तक कायम रहे और बाद में सुनील गावस्कर ने उन्हें पीछे छोड़ा।

भारतीय टीम के कप्तान के रूप में
पॉली उमरीगर ने 1955 से 1959 के बीच आठ टेस्ट मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी की। उनके नेतृत्व में भारत ने दो टेस्ट जीते और दो में हार का सामना किया; शेष मैच ड्रॉ रहे। उस दौर में भारतीय टीम के पास सीमित संसाधन और अपेक्षाकृत कम अंतरराष्ट्रीय अनुभव था। ऐसे समय में कप्तानी करना चुनौतीपूर्ण था। उमरीगर मैदान पर रणनीतिक समझ और व्यक्तिगत प्रदर्शन दोनों के लिए जाने जाते थे।
1958-59 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मद्रास टेस्ट के बाद चयनकर्ताओं के साथ मतभेद और कप्तानी को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि में उन्होंने कप्तानी छोड़ दी। यह प्रसंग भारतीय क्रिकेट प्रशासन और टीम चयन की उस दौर की जटिलताओं को भी दर्शाता है। कप्तानी छोड़ने के बाद भी वे टीम के महत्वपूर्ण बल्लेबाज बने रहे और 1962 तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते रहे।
बल्लेबाजी के साथ गेंदबाजी और ऑलराउंड योगदान
उमरीगर को मुख्यतः मध्यक्रम के बल्लेबाज के रूप में याद किया जाता है, लेकिन वे उपयोगी गेंदबाज भी थे। उन्होंने अपने टेस्ट करियर में 35 विकेट लिए। उनका सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी प्रदर्शन 6 विकेट पर 74 रन था। वे ऑफ-स्पिन के साथ मध्यम गति की गेंदबाजी भी कर सकते थे। 1962 में वेस्टइंडीज के खिलाफ पोर्ट ऑफ स्पेन टेस्ट में उन्होंने शतक बनाने के साथ एक पारी में पांच विकेट लेने का दुर्लभ ऑलराउंड प्रदर्शन किया।
उनका प्रथम श्रेणी करियर भी लंबा और उल्लेखनीय रहा। उन्होंने बॉम्बे सहित विभिन्न टीमों के लिए खेलते हुए 16 हजार से अधिक रन बनाए और 300 से अधिक विकेट लिए। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उनका सर्वोच्च स्कोर 252 नाबाद था। यह आंकड़ा उनकी निरंतरता और बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है।

खेल से संन्यास के बाद भारतीय क्रिकेट की सेवा
1962 में टेस्ट क्रिकेट से विदाई के बाद उमरीगर भारतीय क्रिकेट से अलग नहीं हुए। उन्होंने प्रशासनिक और चयन संबंधी भूमिकाओं में योगदान दिया। वे भारतीय टीम के विदेशी दौरों पर मैनेजर रहे, राष्ट्रीय चयन समिति के अध्यक्ष बने और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के प्रशासनिक कार्यों से भी जुड़े। मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मुख्य क्यूरेटर के रूप में उनकी भूमिका का भी उल्लेख मिलता है।
खिलाड़ियों, चयनकर्ताओं और प्रशासकों के बीच उनके अनुभव का सम्मान था। उन्होंने अपने लंबे खेल जीवन से अर्जित समझ का उपयोग नई पीढ़ी के क्रिकेटरों और भारतीय क्रिकेट व्यवस्था को दिशा देने में किया। उनके नाम पर BCCI ने अंडर-15 राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिता के लिए पॉली उमरीगर ट्रॉफी शुरू की। बाद में भारत के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर ऑफ द ईयर को दिए जाने वाले सम्मान का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।
सम्मान और विरासत
भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान के लिए उन्हें 1962 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 1998 में BCCI ने उन्हें सी. के. नायडू लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया। ये सम्मान उनके खेल कौशल के साथ-साथ भारतीय क्रिकेट के विकास में दीर्घकालिक योगदान की मान्यता थे।
पॉली उमरीगर का निधन 7 नवंबर 2006 को मुंबई में कैंसर से हुआ। वे 80 वर्ष के थे। उनके निधन पर भारतीय क्रिकेट जगत ने एक ऐसे खिलाड़ी को याद किया जिसने कठिन दौर में टीम को स्थिरता, आत्मविश्वास और बड़े स्कोर बनाने की क्षमता दी।

भारतीय क्रिकेट इतिहास में पॉली उमरीगर का स्थान
पॉली उमरीगर की उपलब्धियों को केवल 3,631 टेस्ट रन या 12 शतकों तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे उस दौर के प्रतीक थे जब भारतीय क्रिकेट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहा था। पहला भारतीय टेस्ट दोहरा शतक, आठ टेस्ट में कप्तानी, उपयोगी गेंदबाजी और संन्यास के बाद क्रिकेट प्रशासन में सक्रिय योगदान—इन सभी ने उन्हें भारतीय क्रिकेट के इतिहास में विशिष्ट स्थान दिया।
7 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस खिलाड़ी को सम्मान देना है जिसने अपने खेल, नेतृत्व और क्रिकेट के प्रति आजीवन समर्पण से आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया। पॉली उमरीगर भारतीय क्रिकेट की उस मजबूत नींव का हिस्सा थे जिस पर आगे चलकर देश की बल्लेबाजी परंपरा और अंतरराष्ट्रीय सफलता की इमारत खड़ी हुई।
