पुण्यतिथि विशेष | 7 नवंबर | कृषि, राजनीति और राष्ट्रनिर्माण
भारत की खाद्य सुरक्षा का इतिहास केवल खेतों में हुए वैज्ञानिक प्रयोगों और नई बीज किस्मों की कहानी नहीं है। इसके पीछे वैज्ञानिक अनुसंधान, किसानों की मेहनत, प्रशासनिक तैयारी और निर्णायक राजनीतिक नेतृत्व का साझा योगदान रहा। सी. सुब्रह्मण्यम इसी ऐतिहासिक परिवर्तन के प्रमुख राजनीतिक शिल्पकारों में थे। केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने उच्च उपज वाली गेहूं की किस्मों को अपनाने, उर्वरकों के उपयोग, बीज आयात और कृषि नीति में बदलाव के लिए राजनीतिक समर्थन तथा प्रशासनिक व्यवस्था तैयार की। उन्हें भारत में हरित क्रांति का राजनीतिक वास्तुकार कहा जाना अधिक सटीक है। वहीं कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन को भारतीय हरित क्रांति का वैज्ञानिक जनक माना जाता है।
जन्म, शिक्षा और शुरुआती जीवन
चिदंबरम सुब्रह्मण्यम, जिन्हें सार्वजनिक जीवन में सी. सुब्रह्मण्यम के नाम से जाना गया, का जन्म 30 जनवरी 1910 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के कोयंबटूर जिले के पोल्लाची में एक कृषक परिवार में हुआ था। ग्रामीण कृषि परिवेश में बचपन बिताने के कारण वे खेती और किसानों की चुनौतियों से परिचित थे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पोल्लाची में प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए मद्रास गए।
उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से भौतिकी में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और मद्रास लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल की। 1932 में कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन इसी समय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनकी सक्रियता भी बढ़ती गई। 1936 में कोयंबटूर में वकालत शुरू करने तक वे कांग्रेस की गतिविधियों से जुड़ चुके थे।

स्वतंत्रता संग्राम और संविधान सभा में भूमिका
सी. सुब्रह्मण्यम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय रहे। वे कोयंबटूर जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष और प्रांतीय कांग्रेस समिति की कार्यकारिणी के सदस्य बने। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 1932, 1941 और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनकी गिरफ्तारी का उल्लेख जीवनी-स्रोतों में मिलता है।
1946 में वे संविधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में उन्होंने भाग लिया और स्वतंत्र भारत की संस्थागत तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े विमर्शों में योगदान दिया। संविधान सभा के बाद वे अंतरिम संसद के सदस्य रहे। स्वतंत्रता के बाद उनका राजनीतिक सफर मद्रास राज्य की राजनीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा।
मद्रास राज्य में शिक्षा और प्रशासनिक कार्य
1952 में वे मद्रास राज्य की विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और राज्य मंत्रिमंडल में शामिल हुए। उन्होंने वित्त, शिक्षा और कानून जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाला। वे लगभग एक दशक तक विधानसभा में सदन के नेता भी रहे। उनके कार्यकाल में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार और गरीब विद्यार्थियों के लिए मध्याह्न भोजन कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में भूमिका रही।
शिक्षा को सामाजिक विकास का आधार मानते हुए उन्होंने विद्यालयों तक बच्चों की पहुंच बढ़ाने और वंचित परिवारों के विद्यार्थियों को पढ़ाई से जोड़ने पर जोर दिया। मद्रास राज्य में शिक्षा और सामाजिक कल्याण की नीतियों में उनका योगदान उनके प्रशासनिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण पक्ष था।

केंद्रीय कृषि मंत्री और हरित क्रांति की पृष्ठभूमि
1960 के दशक के मध्य में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था। लगातार सूखे, कम कृषि उत्पादकता और बढ़ती जनसंख्या के कारण देश को विदेशों से अनाज आयात करना पड़ता था। खाद्य सुरक्षा राष्ट्रीय नीति की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल थी। 1962 में लोकसभा पहुंचने के बाद सी. सुब्रह्मण्यम को केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी मिली। वे 1964 से 1967 तक खाद्य एवं कृषि मंत्री रहे।
इस दौर में उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नई रणनीति अपनाने का समर्थन किया। इसमें उच्च उपज वाली किस्मों (High-Yielding Varieties), सिंचाई, उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि अनुसंधान और किसानों तक वैज्ञानिक तकनीक पहुंचाने की समन्वित नीति शामिल थी। मैक्सिको में विकसित बौनी गेहूं की किस्मों को भारत में बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए उन्होंने राजनीतिक सहमति और प्रशासनिक समर्थन जुटाया। 1966 में मैक्सिकन गेहूं के बीजों का बड़ा आयात और भारतीय परिस्थितियों में उनका विस्तार इस बदलाव का निर्णायक चरण बना।
सी. सुब्रह्मण्यम और डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन: भूमिकाओं का सही अंतर
हरित क्रांति की उपलब्धि किसी एक व्यक्ति का अकेला काम नहीं थी। इसमें कृषि वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, कृषि विश्वविद्यालयों, अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों, किसानों और सरकारी अधिकारियों का संयुक्त योगदान था। इस इतिहास में सी. सुब्रह्मण्यम और डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन की भूमिकाएं एक-दूसरे की पूरक थीं, लेकिन समान नहीं।
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने पौध प्रजनन, गेहूं की उन्नत किस्मों और कृषि विज्ञान के क्षेत्र में वैज्ञानिक नेतृत्व दिया। उन्हें भारत की हरित क्रांति का वैज्ञानिक जनक या Father of the Indian Green Revolution कहा जाता है। दूसरी ओर, सी. सुब्रह्मण्यम ने कृषि मंत्री के रूप में वैज्ञानिक सिफारिशों को राष्ट्रीय नीति में बदलने, नई तकनीक को अपनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटाने, बीज और उर्वरक उपलब्ध कराने तथा किसानों तक कार्यक्रम पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

इसलिए सी. सुब्रह्मण्यम को सीधे वैज्ञानिक अर्थ में ‘हरित क्रांति का जनक’ कहना भूमिकाओं को मिला देना होगा। उन्हें हरित क्रांति का प्रमुख राजनीतिक वास्तुकार, नीति-निर्माता और प्रशासनिक नेतृत्वकर्ता कहना ऐतिहासिक रूप से अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत है। महाराष्ट्र के राजभवन की आधिकारिक जीवनी भी कृषि नीति में उनके योगदान और 1964–67 के दौरान उनके राजनीतिक नेतृत्व को रेखांकित करती है।
हरित क्रांति के परिणाम और चुनौतियां
नई कृषि रणनीति के परिणामस्वरूप विशेषकर गेहूं के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक और कृषि मशीनरी के इस्तेमाल ने उत्पादन को तेज गति दी। भारत धीरे-धीरे खाद्यान्न आयात पर निर्भरता कम करने और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ा। 1970 के दशक की शुरुआत तक गेहूं उत्पादन में आई वृद्धि को हरित क्रांति की प्रमुख उपलब्धि माना गया।
हालांकि इस परिवर्तन के लाभ सभी क्षेत्रों और किसानों तक समान रूप से नहीं पहुंचे। सिंचाई और संसाधनों की उपलब्धता वाले क्षेत्रों को अधिक लाभ मिला। बाद के दशकों में भूजल दोहन, मिट्टी की गुणवत्ता, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता और फसल विविधता में कमी जैसी चुनौतियां भी सामने आईं। हरित क्रांति के इतिहास का संतुलित मूल्यांकन इन उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाओं को भी स्वीकार करता है।
वित्त मंत्री, अन्य केंद्रीय जिम्मेदारियां और महाराष्ट्र के राज्यपाल
कृषि मंत्रालय के बाद सी. सुब्रह्मण्यम ने केंद्र में कई महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाला। वे इस्पात एवं भारी उद्योग, योजना, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और रक्षा जैसे क्षेत्रों से जुड़े। अक्टूबर 1974 से मार्च 1977 तक उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में काम किया। उनके राजनीतिक जीवन में यह महत्वपूर्ण दौर था, जब देश आर्थिक दबावों और बदलती राष्ट्रीय परिस्थितियों का सामना कर रहा था।

1990 में उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने 1990 से 1993 तक इस पद पर कार्य किया। वे भारतीय विद्या भवन से भी लंबे समय तक जुड़े रहे और उसके अध्यक्ष तथा अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों के प्रमुख संरक्षकों में शामिल हुए। शिक्षा, संस्कृति और संस्थान निर्माण में उनकी रुचि राजनीति से परे भी बनी रही।
भारत रत्न और अन्य सम्मान
कृषि और राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान के सम्मान में भारत सरकार ने 1998 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया। उन्हें कृषि विकास और सार्वजनिक जीवन में योगदान के लिए अन्य राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले। उन्होंने The New Strategy in Indian Agriculture, War on Poverty और The India of My Dreams जैसी पुस्तकें भी लिखीं।
7 नवंबर 2000 को निधन
सी. सुब्रह्मण्यम का निधन 7 नवंबर 2000 को चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में हुआ। वे 90 वर्ष के थे। कुछ समकालीन समाचार और बाद के लेख 8 नवंबर को निधन की तारीख बताते हैं, जबकि संविधान-इतिहास संबंधी जीवनी, जमनालाल बजाज फाउंडेशन तथा डाक विभाग से जुड़ी स्मारक सामग्री 7 नवंबर 2000 दर्ज करती है। इस लेख में पुण्यतिथि के संदर्भ में 7 नवंबर की तारीख दी गई है और स्रोतों में उपलब्ध अंतर को ध्यान में रखा गया है।
सी. सुब्रह्मण्यम की विरासत
सी. सुब्रह्मण्यम का ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि उन्होंने वैज्ञानिक उपलब्धियों को राष्ट्रीय कृषि नीति और व्यापक किसान कार्यक्रम में बदलने के लिए आवश्यक राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया। भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता के निर्माण में उनका योगदान निर्णायक था। डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन और अन्य वैज्ञानिकों के अनुसंधान को नीति, संसाधन और प्रशासनिक समर्थन दिलाने में उनकी भूमिका ने हरित क्रांति को गति दी।

7 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना भारत के उस दौर को समझना है जब देश ने खाद्यान्न संकट से उबरने के लिए विज्ञान, नीति और किसान शक्ति को एक साथ जोड़ा। सी. सुब्रह्मण्यम की विरासत हमें बताती है कि बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन के लिए वैज्ञानिक ज्ञान जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है दूरदर्शी राजनीतिक नेतृत्व, संस्थागत क्षमता और किसानों के साथ भरोसेमंद साझेदारी।
