विशेष लेख | 7 नवंबर | पुण्यतिथि विशेष | विज्ञान एवं प्रकृति
विज्ञान के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जिनका योगदान किसी एक खोज तक सीमित नहीं रहता। ब्रिटिश प्रकृतिवादी, अन्वेषक और जीवविज्ञानी अल्फ्रेड रसेल वॉलेस (Alfred Russel Wallace) ऐसे ही बहुआयामी वैज्ञानिक थे। चार्ल्स डार्विन के साथ उनका नाम प्राकृतिक चयन (Natural Selection) के सिद्धांत के स्वतंत्र सह-प्रतिपादक के रूप में जुड़ा है। लेकिन वॉलेस की पहचान केवल विकासवाद तक सीमित नहीं थी। अमेज़न और मलय द्वीपसमूह की यात्राओं, जीव-जंतुओं के भौगोलिक वितरण पर उनके अध्ययन और जैव-विविधता को समझने में उनके योगदान ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के अग्रणी प्रकृतिविदों में स्थान दिलाया। 7 नवंबर 1913 को उनका निधन हुआ था।
जिज्ञासा से शुरू हुई वैज्ञानिक यात्रा
अल्फ्रेड रसेल वॉलेस का जन्म 8 जनवरी 1823 को वेल्स के उस्क (Usk) क्षेत्र में हुआ था। औपचारिक शिक्षा सीमित रहने के बावजूद प्रकृति, भूगोल और जीव-जंतुओं के प्रति उनकी जिज्ञासा लगातार बढ़ती रही। युवावस्था में उन्होंने सर्वेक्षण और निर्माण से जुड़े काम किए तथा बाद में लीसेस्टर में अध्यापन किया। यहीं उनकी मुलाकात प्रकृतिवादी हेनरी वॉल्टर बेट्स से हुई। कीटों, विशेषकर भृंगों के संग्रह और अध्ययन ने वॉलेस की वैज्ञानिक रुचि को ठोस दिशा दी।
1848 में वॉलेस और बेट्स दक्षिण अमेरिका के अमेज़न क्षेत्र की खोज-यात्रा पर निकले। इस अभियान में उन्होंने अनेक जीव-जंतुओं और पौधों के नमूने जुटाए तथा प्रजातियों के प्राकृतिक परिवेश को समझने का प्रयास किया। 1852 में इंग्लैंड लौटते समय जहाज में आग लगने से उनके संग्रह का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया। इस कठिन अनुभव के बावजूद प्रकृति-अध्ययन के प्रति उनका उत्साह कम नहीं हुआ।

मलय द्वीपसमूह की यात्रा और वॉलेस रेखा
1854 में वॉलेस दक्षिण-पूर्व एशिया के मलय द्वीपसमूह की लंबी यात्रा पर निकले। लगभग आठ वर्षों तक उन्होंने आज के इंडोनेशिया, मलेशिया और आसपास के द्वीपों में जीव-जंतुओं का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने असाधारण संख्या में नमूने एकत्र किए और अनेक ऐसी प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया जो उस समय पश्चिमी विज्ञान के लिए नई थीं। प्राकृतिक इतिहास के अध्ययन में स्थानीय सहयोगियों और मार्गदर्शकों की भूमिका भी इस यात्रा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थी।
इस क्षेत्र में वॉलेस ने जीव-जंतुओं के वितरण का एक उल्लेखनीय भौगोलिक पैटर्न पहचाना। बाली और लोम्बोक सहित कुछ द्वीपों के बीच उन्होंने ऐसी सीमा देखी जिसके एक ओर एशियाई विशेषताओं वाले जीव अधिक मिलते थे, जबकि दूसरी ओर ऑस्ट्रेलियाई क्षेत्र से जुड़े जीव-जगत का प्रभाव दिखाई देता था। आगे चलकर यह काल्पनिक जैव-भौगोलिक सीमा ‘वॉलेस रेखा’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस अवधारणा ने यह समझने में मदद की कि द्वीपों, समुद्री अवरोधों और भूगर्भीय इतिहास का प्रजातियों के वितरण पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।
प्राकृतिक चयन का विचार: डार्विन से स्वतंत्र निष्कर्ष
वॉलेस का सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक योगदान प्राकृतिक चयन के सिद्धांत से जुड़ा है। इस विचार के अनुसार किसी आबादी में ऐसे वंशानुगत गुण रखने वाले जीव, जो उनके पर्यावरण में जीवित रहने और प्रजनन करने में लाभ देते हैं, अगली पीढ़ियों में उन गुणों को अधिक प्रसारित कर सकते हैं। अनेक पीढ़ियों के दौरान इससे आबादी की विशेषताओं में बदलाव आ सकता है। यह विकास की प्रक्रिया को समझाने वाला एक केंद्रीय वैज्ञानिक सिद्धांत बना।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वॉलेस इस निष्कर्ष तक चार्ल्स डार्विन से स्वतंत्र रूप से पहुँचे थे। फरवरी 1858 के आसपास इंडोनेशिया के टर्नेट क्षेत्र में बीमारी के दौरान विचार करते हुए उन्होंने प्रजातियों में परिवर्तन और पर्यावरणीय दबाव के संबंध को स्पष्ट रूप से समझा। उन्होंने अपने विचारों को निबंध On the Tendency of Varieties to Depart Indefinitely From the Original Type में लिखा और डार्विन को भेजा, क्योंकि वे जानते थे कि डार्विन भी प्रजातियों के परिवर्तन पर काम कर रहे हैं।

डार्विन अपने सिद्धांत पर पहले से लगभग दो दशक काम कर रहे थे, लेकिन उन्होंने अपनी पुस्तक प्रकाशित नहीं की थी। वॉलेस का निबंध मिलने के बाद डार्विन के सहयोगियों चार्ल्स लायल और जोसेफ हूकर की पहल पर दोनों वैज्ञानिकों के लेख 1 जुलाई 1858 को लंदन की लिनियन सोसायटी की बैठक में संयुक्त रूप से पढ़े गए। ये लेख उसी वर्ष सोसायटी की पत्रिका में प्रकाशित हुए। इस ऐतिहासिक प्रस्तुति ने दोनों के स्वतंत्र योगदान को वैज्ञानिक समुदाय के सामने रखा।
अगले वर्ष 1859 में डार्विन की पुस्तक On the Origin of Species प्रकाशित हुई और विकासवाद पर व्यापक चर्चा शुरू हुई। समय के साथ प्राकृतिक चयन का सिद्धांत अधिकतर डार्विन के नाम से लोकप्रिय हुआ, लेकिन वॉलेस की स्वतंत्र खोज और संयुक्त वैज्ञानिक योगदान को इतिहास में समान रूप से महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
वॉलेस और डार्विन: सहमति के साथ वैचारिक अंतर
वॉलेस और डार्विन के बीच वैज्ञानिक सम्मान और पत्राचार का संबंध था, लेकिन वे हर विषय पर एकमत नहीं थे। विशेष रूप से मानव मस्तिष्क, बुद्धि और चेतना के विकास को लेकर वॉलेस के विचार डार्विन से अलग थे। वॉलेस का मानना था कि मानव की कुछ मानसिक क्षमताओं को प्राकृतिक चयन से पूरी तरह समझाना कठिन है। बाद के वर्षों में उनका अध्यात्मवाद (Spiritualism) की ओर झुकाव भी वैज्ञानिक समुदाय में बहस का विषय बना।
इन मतभेदों के बावजूद वॉलेस ने प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का समर्थन और प्रचार जारी रखा। उन्होंने विकासवाद, प्रजातियों के वितरण, संरक्षण, मानव समाज और सार्वजनिक नीति जैसे विषयों पर व्यापक लेखन किया। उनकी बौद्धिक रुचि प्रयोगशाला या संग्रहालय तक सीमित नहीं थी; वे सामाजिक प्रश्नों और भूमि-सुधार जैसे मुद्दों पर भी सक्रिय विचार रखते थे।

प्रमुख पुस्तकें और वैज्ञानिक विरासत
वॉलेस की प्रमुख पुस्तकों में The Malay Archipelago (1869), The Geographical Distribution of Animals (1876), Island Life (1880) और Darwinism (1889) उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों में यात्रा-वृत्तांत, प्रजातियों के वितरण, द्वीपों की जैव-विविधता और प्राकृतिक चयन की व्याख्या मिलती है। उनका लेखन वैज्ञानिक जानकारी को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने में भी प्रभावशाली रहा।
वॉलेस को अपने जीवनकाल में कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक सम्मान मिले। वे 1893 में रॉयल सोसायटी के फेलो चुने गए और 1910 में ब्रिटेन के ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित हुए। उन्हें जीव-भूगोल के संस्थापक अग्रदूतों में गिना जाता है। आज भी वॉलेस रेखा, द्वीपीय जैव-विविधता और विकासवादी जीवविज्ञान के अध्ययन में उनका काम प्रासंगिक है।
7 नवंबर 1913: एक असाधारण प्रकृतिविद् का निधन
अल्फ्रेड रसेल वॉलेस का निधन 7 नवंबर 1913 को इंग्लैंड के डॉर्सेट स्थित ब्रॉडस्टोन में हुआ। वे लगभग 90 वर्ष के थे। उनके निधन के बाद विज्ञान-जगत ने एक ऐसे प्रकृतिविद् को खोया जिसने दूर-दराज के क्षेत्रों में वर्षों तक प्रकृति का प्रत्यक्ष अध्ययन किया और जीव-जगत की विविधता को समझने के लिए नए प्रश्न और दृष्टिकोण दिए।
वॉलेस की विरासत हमें याद दिलाती है कि वैज्ञानिक खोजें अक्सर जिज्ञासा, धैर्य, सूक्ष्म अवलोकन और प्रमाणों के आधार पर विकसित होती हैं। प्राकृतिक चयन के सिद्धांत में उनकी स्वतंत्र भूमिका, मलय द्वीपसमूह का उनका व्यापक अध्ययन और वॉलेस रेखा की अवधारणा उन्हें विज्ञान के इतिहास में विशिष्ट स्थान दिलाती है। चार्ल्स डार्विन के साथ उनका नाम इसलिए जुड़ा है कि दोनों ने स्वतंत्र रूप से एक ऐसे विचार को विकसित किया जिसने जीवन की विविधता और उसके परिवर्तन को समझने का तरीका बदल दिया।

