ऋग्वेद के पितृ सूक्त से लेकर महाभारत, उपनिषद और धर्मशास्त्रों तक पूर्वजों के सम्मान की परंपरा; जानिए श्राद्ध की शुरुआत की कथा, तर्पण-पिंडदान का अर्थ, 15 तिथियों का महत्व और 2026 में कब से शुरू होगा पितृ पक्ष
विशेष आलेख
हम जिस परिवार में जन्म लेते हैं, उसकी कहानी हमसे शुरू नहीं होती। हमारे पीछे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और उनसे भी पहले की कई पीढ़ियां खड़ी हैं। भारतीय चिंतन ने इसी रिश्ते को केवल भावनात्मक नहीं माना, बल्कि इसे कर्तव्य और ऋण से जोड़ा।
यही वजह है कि साल में एक ऐसा पक्ष रखा गया, जब मनुष्य अपने पूर्वजों को विशेष रूप से याद करे, उनके नाम से जल-अन्न अर्पित करे और अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे।
इसी परंपरा को आज हम पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष के नाम से जानते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इसकी शुरुआत कैसे हुई? सबसे पहले किसने श्राद्ध किया? वेदों में पितरों के बारे में क्या कहा गया है और आखिर पिंडदान व तर्पण का अर्थ क्या है?
पहले समझिए—पितृ पक्ष क्या है और कब होता है?
‘पितृ’ का अर्थ है पूर्वज, जबकि ‘पक्ष’ चंद्र मास के एक हिस्से को कहा जाता है। सामान्य रूप से आश्विन कृष्ण पक्ष को पितृ पक्ष कहा जाता है। इस दौरान दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य पूर्वजों के लिए उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि पितरों के सम्मान की परंपरा केवल आज के पितृ पक्ष से शुरू नहीं हुई। पूर्वजों के लिए अर्पण और पितृयज्ञ की जड़ें वैदिक साहित्य तक जाती हैं। बाद में गृह्यसूत्र, धर्मशास्त्र और पुराणों में इसके अलग-अलग विधि-विधान और आख्यान विकसित हुए।
2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है और 27 सितंबर से आश्विन कृष्ण प्रतिपदा शुरू होती है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और तिथि के समय के कारण मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है।
श्राद्ध की शुरुआत की कथा—अत्रि से निमि तक कैसे पहुंची परंपरा?
पितृ पक्ष की परंपरा की शुरुआत को लेकर कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन महाभारत के अनुशासन पर्व में महर्षि निमि और अत्रि ऋषि का प्रसंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
कथा के अनुसार, महर्षि निमि के पुत्र की मृत्यु हो गई। पुत्र-वियोग से दुखी निमि ने उसके निमित्त पिंडदान और श्राद्ध किया। उन्हें लगा कि उन्होंने ऐसा कर्म किया है जिसे पहले ऋषियों ने इस रूप में नहीं किया था। इसी चिंता में उन्होंने अपने वंशप्रवर्तक महर्षि अत्रि का स्मरण किया।
अत्रि ऋषि वहां आए और निमि को श्राद्ध तथा पितृकर्म का विधान समझाया। महाभारत के अनुशासन पर्व के श्राद्ध संबंधी अध्याय में इसके बाद स्पष्ट कहा गया है कि निमि के श्राद्ध में प्रवृत्त होने के बाद अन्य महर्षियों ने भी विधि के अनुसार पितृयज्ञ करना शुरू किया।
महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है—
“तथा निमौ प्रवृत्ते तु सर्व एव महर्षयः। पितृयज्ञं तु कुर्वन्ति विधिदृष्टेन कर्मणा॥”
अर्थात, जब महर्षि निमि ने श्राद्ध का आरंभ किया, उसके बाद दूसरे महर्षि भी शास्त्र में बताए गए विधान के अनुसार पितृयज्ञ करने लगे।
यही वह प्रसंग है जिसकी वजह से अत्रि से निमि और फिर निमि से आगे ऋषि-मुनियों तक श्राद्ध परंपरा के विस्तार की कथा बताई जाती है।
अग्नि को भोजन का हिस्सा क्यों?
इसी महाभारतीय कथा के अगले प्रसंग में कहा गया है कि श्राद्ध का अन्न ग्रहण करते-करते पितृ और देवता तृप्त तो हुए, लेकिन उन्हें अजीर्ण की समस्या हुई। तब वे ब्रह्मा के पास गए।
कथा में आगे अग्नि को श्राद्ध के अर्पण का भाग देने का विधान बताया गया, ताकि अग्नि के माध्यम से अर्पण की प्रक्रिया पूरी हो। इसी धार्मिक मान्यता से श्राद्ध में अग्नि को अर्पण करने की परंपरा को जोड़ा जाता है।
वेदों में पितरों का सबसे पुराना उल्लेख कहां मिलता है?
पितृ परंपरा को समझने के लिए महाभारत से भी पीछे जाना होगा। ऋग्वेद के दशम मंडल का 15वां सूक्त पितृ सूक्त के रूप में प्रसिद्ध है। इसमें पितरों का आह्वान और उनके प्रति सम्मान का भाव मिलता है।
ऋग्वेद का मंत्र है—
“उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः। असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥” — ऋग्वेद 10.15.1
सरल शब्दों में भाव है—हम उन पितरों का आह्वान करते हैं जो हमसे पहले जा चुके हैं; वे हमारे आह्वान को स्वीकार करें और हमारा कल्याण करें।
अगली ऋचा में कहा गया है—
“इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः।”
अर्थात आज उन पितरों को नमन है जो हमसे पहले इस संसार से जा चुके हैं।
इससे साफ होता है कि पूर्वजों का स्मरण भारतीय धार्मिक परंपरा में बहुत पुराना विचार है।
श्राद्ध में ‘श्रद्धा’ क्यों सबसे जरूरी मानी गई?
‘श्राद्ध’ शब्द को सामान्यतः श्रद्धा से जोड़ा जाता है। यानी यह केवल भोजन, पिंड या जल चढ़ाने की क्रिया नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद भाव को भी महत्व देता है।
ऋग्वेद के श्रद्धा सूक्त में कहा गया है—
“श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः। श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि॥” — ऋग्वेद 10.151.1
अर्थात श्रद्धा से अग्नि प्रज्वलित होती है और श्रद्धा से ही हवि अर्पित की जाती है।
यही बात पितृकर्म के मूल भाव को समझाती है—विधि जरूरी है, लेकिन उसके पीछे श्रद्धा और कृतज्ञता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
उपनिषद भी कहते हैं—पितृकार्य की उपेक्षा मत करो
तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली में गुरु अपने शिष्य को जीवन के महत्वपूर्ण कर्तव्यों की शिक्षा देते हुए कहते हैं—
“देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।”
अर्थात देवताओं और पितरों से जुड़े कर्तव्यों में लापरवाही नहीं करनी चाहिए। माता को देवतुल्य मानो और पिता को देवतुल्य मानो।
इसी उपदेश में आगे आता है—
“श्रद्धया देयम्।”
अर्थात जो भी अर्पित या दान करो, श्रद्धा के साथ करो।
इसलिए पितृ पक्ष को केवल मृत्यु के बाद का कर्मकांड समझना इसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देना होगा।
ज्योतिषाचार्य राम कैलास तिवारी बताते हैं—यह ‘पितृ ऋण’ को याद करने का समय है
ज्योतिषाचार्य, साहित्याचार्य एवं हिंदी और संस्कृत में डबल एमए राम कैलास तिवारी के अनुसार, पितृ पक्ष का मूल भाव पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता है।
वे बताते हैं कि मनुष्य को जो जीवन, संस्कार, परिवार और परंपरा मिली है, उसके पीछे पिछली पीढ़ियों का योगदान है। इसलिए पितृ ऋण का अर्थ केवल कोई आर्थिक कर्ज नहीं है। अपने माता-पिता का सम्मान करना, परिवार की अच्छी परंपराओं को आगे बढ़ाना और पूर्वजों को स्मरण करना भी इसी भाव से जुड़ा है।
यानी पितृ पक्ष हमें केवल यह नहीं बताता कि जो चले गए उन्हें याद करो, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि जो आज हमारे साथ हैं, उनके प्रति हमारा कर्तव्य क्या है।
तर्पण क्या होता है और जल ही क्यों दिया जाता है?
पितृ पक्ष में आपने लोगों को जल में तिल डालकर पूर्वजों के नाम से जल अर्पित करते देखा होगा। इसे तर्पण कहा जाता है।
सरल भाषा में तर्पण का अर्थ है—तृप्ति के भाव से अर्पण करना।
जल जीवन का आधार है। इसलिए जल अर्पित करना पूर्वजों के प्रति स्मरण और सम्मान का प्रतीक बन गया। तर्पण में आम तौर पर पितरों का नाम और गोत्र स्मरण करके जल अर्पित किया जाता है।
महाभारत में भी पिंडदान के बाद तीर्थ के जल से पितरों के तर्पण का उल्लेख मिलता है।
पिंडदान क्या है और पिंड क्यों बनाया जाता है?
पिंड सामान्यतः चावल या अन्न से बनाया जाता है। इसे पूर्वजों के निमित्त अर्पित किया जाता है। महाभारत के निमि प्रसंग में पुत्र के लिए पिंडदान का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
धार्मिक दृष्टि से पिंड अन्न, शरीर और जीवन-परंपरा का प्रतीक माना जाता है। जिस अन्न से शरीर का पोषण होता है, उसी से पिंड बनाकर पूर्वजों को अर्पित करने का भाव यह है कि व्यक्ति अपनी जीवन-श्रृंखला और पूर्वजों के योगदान को स्वीकार कर रहा है।
इसीलिए पितृकर्म में पिता, पितामह और प्रपितामह जैसी पीढ़ियों का स्मरण विशेष रूप से मिलता है। हालांकि अलग-अलग परंपराओं में विधि और अर्पण की प्रक्रिया अलग हो सकती है।
15 तिथियां ही क्यों और हर दिन श्राद्ध क्यों नहीं होता?
पितृ पक्ष मूल रूप से कृष्ण पक्ष की 15 तिथियों से जुड़ा है। यह जरूरी नहीं कि ये 15 अलग-अलग कैलेंडर तारीखें हों, क्योंकि एक ही दिन दो तिथियां भी आ सकती हैं।
जिस पूर्वज की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, सामान्य परंपरा में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या किसी कारण निर्धारित तिथि पर श्राद्ध न हो पाए, तो सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है।
2026 में यह अमावस्या 10 अक्टूबर को है।
कर्ण की कथा क्या बताती है?
पितृ पक्ष से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में महाभारत के कर्ण की कथा भी है। लोकप्रचलित कथा के अनुसार, कर्ण ने जीवन भर बहुत दान किया, लेकिन अपने पूर्वजों के लिए अन्न का दान नहीं किया था। परलोक में उन्हें भोजन के बजाय सोना-रत्न मिलने लगे।
कथा के अनुसार उन्हें तब समझ आया कि दान केवल धन देने तक सीमित नहीं है; पूर्वजों के प्रति कर्तव्य भी जरूरी है। इसके बाद उन्हें पृथ्वी पर लौटकर पितरों के लिए अन्न-जल अर्पित करने का अवसर मिला।
यह कथा पितृ पक्ष के महत्व को समझाने वाली लोकप्रिय धार्मिक कथा है। इसे पितृ पक्ष की ऐतिहासिक शुरुआत का एकमात्र प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
आखिर पितृ पक्ष हमें क्या सिखाता है?
पितृ पक्ष का सबसे गहरा संदेश शायद यही है कि मनुष्य अकेला नहीं है। उसके पीछे कई पीढ़ियों का जीवन, संघर्ष और संस्कार खड़े हैं।
श्राद्ध उस स्मृति को जीवित रखने का माध्यम है। तर्पण उस स्मृति को जल के माध्यम से व्यक्त करने की परंपरा है। पिंडदान अन्न के माध्यम से पूर्वजों के प्रति अर्पण का प्रतीक है। और दान इस भावना को आगे समाज तक पहुंचाने का माध्यम बनता है।
वेदों में पितरों का स्मरण है, महाभारत में निमि और अत्रि की कथा है, उपनिषद पितृकार्य की उपेक्षा न करने की शिक्षा देता है और गीता भी पितृव्रत का उल्लेख करती है—
“यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः।” — भगवद्गीता 9.25
पितृ पक्ष मृत्यु का उत्सव नहीं, स्मृति का संस्कार है।
यह हमें बताता है कि आधुनिक होने का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। जिस पीढ़ी ने हमें जन्म दिया, उसे याद करना अतीत में लौटना नहीं; बल्कि यह समझना है कि हम स्वयं किस लंबी कहानी की एक कड़ी हैं। और शायद इसी वजह से पितृ पक्ष हर साल लौटता है—
ताकि हम कुछ दिनों के लिए ही सही, अपने वर्तमान से पीछे मुड़कर उस अतीत को देख सकें, जिसकी नींव पर हमारा आज खड़ा है।