नई दिल्ली: टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने संगठन की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में भारत की जरूरतों के अनुरूप काम करने की अपनी प्राथमिकता दोहराई है। उनका संदेश—‘Do What India Needs’ यानी ‘भारत को जिसकी जरूरत है, वही करें’—स्वास्थ्य सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मजबूत संस्थानों और परोपकारी खर्च से वास्तविक सामाजिक बदलाव लाने पर केंद्रित है।
रिपोर्ट में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका को केवल परियोजनाओं या सहायता कार्यक्रमों के वित्तपोषण तक सीमित रखने के बजाय ऐसे संस्थान विकसित करने की दिशा में देखने पर जोर है, जो लंबे समय तक समाज की सेवा कर सकें। इस दृष्टिकोण में उपलब्धियों का आकलन केवल कितने लोगों तक सहायता पहुंची, इससे नहीं बल्कि इस बात से होना चाहिए कि लोगों के जीवन में कितना ठोस और टिकाऊ सुधार आया।
खर्च से आगे, सामाजिक प्रभाव पर जोर
नोएल टाटा के अनुसार, सामाजिक क्षेत्र में किसी कार्यक्रम की सफलता को केवल लाभार्थियों की संख्या या खर्च की गई राशि से नहीं मापा जाना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि किसी पहल से स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका या जीवन की गुणवत्ता में क्या बदलाव आया। इस तरह का आकलन संस्थाओं को संसाधनों का अधिक जिम्मेदार और प्रभावी उपयोग करने में मदद कर सकता है।
यह रुख परोपकार में जवाबदेही को मजबूत करने की जरूरत को सामने लाता है। दान और अनुदान का उद्देश्य केवल गतिविधियां चलाना नहीं, बल्कि ऐसे परिणाम हासिल करना होना चाहिए जिनकी समीक्षा की जा सके और जिनसे भविष्य की योजनाओं को बेहतर बनाया जा सके।

सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं
स्वास्थ्य सेवा टाटा ट्रस्ट्स की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। रिपोर्ट और संगठन की घोषित दिशा में गैर-लाभकारी अस्पतालों तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास पर ध्यान दिया गया है, ताकि इलाज की गुणवत्ता और उसकी सामर्थ्य के बीच संतुलन बनाया जा सके। असम सरकार के साथ साझेदारी में कैंसर देखभाल सुविधाओं के विकास का काम इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
नोएल टाटा ने पहले अपनी सार्वजनिक टिप्पणियों में देशभर में 40 से 50 गैर-लाभकारी सामान्य अस्पतालों की संभावित योजना का भी उल्लेख किया था। प्रस्तावित क्रॉस-सब्सिडी मॉडल में भुगतान करने में सक्षम मरीजों से मिलने वाली आय के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को सहायता देने की परिकल्पना है। इसका मूल विचार यह है कि मरीज की आर्थिक स्थिति के कारण डॉक्टरों, दवाओं या उपचार की गुणवत्ता में अंतर नहीं होना चाहिए। किसी भी प्रस्ताव की वास्तविक पहुंच और प्रभाव उसके क्रियान्वयन, वित्तीय व्यवस्था और स्थानीय जरूरतों पर निर्भर करेंगे।
शिक्षा और भारत में संस्थान निर्माण
शिक्षा दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है। नोएल टाटा ने भारत में विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा संस्थानों की क्षमता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है, ताकि प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए विदेश जाने की मजबूरी कम हो। इस सोच का लक्ष्य केवल अधिक सीटें उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे संस्थान तैयार करना है जो शिक्षा, शोध और कौशल विकास में दीर्घकालिक योगदान दे सकें।
टाटा समूह और उससे जुड़े ट्रस्टों की परंपरा में भारतीय विज्ञान संस्थान, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और टाटा मेमोरियल अस्पताल जैसे संस्थानों का उल्लेख अक्सर किया जाता है। नए संस्थान बनाने और मौजूदा व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर इसी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

वार्षिक रिपोर्ट का व्यापक संदेश
टाटा ट्रस्ट्स की रिपोर्ट का केंद्रीय संदेश यह है कि सामाजिक निवेश की सफलता को दीर्घकालिक परिणामों से जोड़ा जाना चाहिए। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों पर काम करते हुए स्थानीय समुदायों, सरकारों और गैर-लाभकारी संगठनों के साथ सहयोग भी महत्वपूर्ण है। ऐसे सहयोग से योजनाओं को जमीनी जरूरतों के अनुरूप बनाने और उनके प्रभाव का बेहतर मूल्यांकन करने में मदद मिल सकती है।
नोएल टाटा का ‘भारत को जिसकी जरूरत है’ वाला दृष्टिकोण कारोबार और परोपकार को व्यापक सामाजिक उद्देश्य से जोड़ता है। इसके तहत संस्थाओं की सफलता केवल उनके आकार या खर्च से नहीं, बल्कि इस बात से आंकी जानी चाहिए कि वे लोगों के जीवन में कितना सार्थक और टिकाऊ बदलाव ला पाती हैं।
