पुण्यतिथि विशेष: 13 अक्टूबर 2004 को दुनिया को अलविदा कह गईं निरूपा रॉय। कभी पौराणिक फिल्मों में देवी बनकर दर्शकों के दिलों में उतरीं, तो कभी अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की मां बनकर हिंदी सिनेमा में ममता, त्याग और संघर्ष की अमिट पहचान छोड़ गईं।
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके नाम से आगे बढ़कर एक भावना बन जाती है। निरूपा रॉय ऐसी ही अभिनेत्री थीं। पर्दे पर उन्हें देखते ही दर्शकों के मन में एक संघर्षशील, ममतामयी और अपने बच्चों के लिए हर कठिनाई सहने वाली मां की छवि उभर आती थी। उनकी आंखों में आंसू, चेहरे पर चिंता और संवादों में दिखाई देने वाली भावनात्मक गहराई ने उन्हें हिंदी फिल्मों की सबसे यादगार अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया।
13 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें याद करना उस कलाकार को याद करना है, जिसने दशकों तक अपने अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया। हालांकि, निरूपा रॉय का सफर केवल मां की भूमिकाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत गुजराती और हिंदी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाते हुए की थी और पौराणिक फिल्मों में देवी के रूप में भी खास पहचान बनाई थी।
कोकिला बलसारा से बनीं निरूपा रॉय
निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात के वलसाड में हुआ था। उनका मूल नाम कोकिला किशोरचंद्र बलसारा था। कम उम्र में ही उनका विवाह कमल रॉय से हो गया और विवाह के बाद वह मुंबई आ गईं। उस दौर में फिल्मों में काम करना आज की तरह सामान्य सामाजिक विकल्प नहीं था, लेकिन परिस्थितियों और अवसरों ने उन्हें फिल्म जगत तक पहुंचा दिया।

वर्ष 1946 में उन्होंने गुजराती फिल्म ‘राणकदेवी’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। इसी वर्ष वह हिंदी फिल्म ‘अमर राज’ में भी नजर आईं। शुरुआती दौर में निरूपा रॉय ने अलग-अलग प्रकार की भूमिकाएं निभाईं और धीरे-धीरे दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई।
उनकी अभिनय शैली में सहजता और भावनाओं की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। वह अपने किरदार को केवल संवादों के सहारे नहीं, बल्कि चेहरे के भाव, आंखों की भाषा और शारीरिक हाव-भाव से भी जीवंत बनाती थीं। यही विशेषता आगे चलकर उनके लंबे फिल्मी करियर की सबसे बड़ी ताकत बनी।
पौराणिक फिल्मों में देवी बनकर मिली पहचान
निरूपा रॉय के करियर का शुरुआती दौर पौराणिक फिल्मों के लिए खास तौर पर याद किया जाता है। वर्ष 1950 में आई फिल्म ‘हर हर महादेव’ में उन्होंने देवी पार्वती की भूमिका निभाई। इस फिल्म में त्रिलोक कपूर भगवान शिव के किरदार में थे।
फिल्म की लोकप्रियता के साथ निरूपा रॉय की छवि दर्शकों के बीच ऐसी बनी कि कई लोग उन्हें देवी के रूप में देखने लगे। उनके चेहरे की गंभीरता, सादगी और अभिनय की शैली पौराणिक किरदारों के अनुकूल मानी जाती थी।

उस दौर में भारतीय सिनेमा में धार्मिक और पौराणिक विषयों पर आधारित फिल्मों का महत्वपूर्ण स्थान था। इन फिल्मों के माध्यम से कलाकारों को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिलता था। निरूपा रॉय ने इस दौर में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया और धीरे-धीरे सामाजिक तथा पारिवारिक फिल्मों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं हासिल कीं।
उनकी यह शुरुआती पहचान इस बात का प्रमाण है कि उनका अभिनय केवल मां के किरदारों तक सीमित नहीं था। बाद के वर्षों में जिस छवि ने उन्हें सबसे अधिक लोकप्रियता दिलाई, उससे पहले वह कई अलग-अलग प्रकार की भूमिकाओं में दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर चुकी थीं।
‘दो बीघा जमीन’ से अभिनय की गंभीरता सामने आई
वर्ष 1953 में आई बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ हिंदी सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है। फिल्म में बलराज साहनी मुख्य भूमिका में थे और निरूपा रॉय ने पारिवारिक संघर्ष से जुड़े किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया।
फिल्म की कहानी गरीबी, जमीन, कर्ज और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों के इर्द-गिर्द घूमती है। इसने सामाजिक यथार्थ को पर्दे पर प्रस्तुत करने की दिशा में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया।

निरूपा रॉय की अभिनय यात्रा में ऐसी फिल्मों का उल्लेख जरूरी है, क्योंकि इससे पता चलता है कि वह केवल भावुक दृश्यों तक सीमित अभिनेत्री नहीं थीं। सामाजिक परिस्थितियों से जूझते सामान्य लोगों के जीवन को पर्दे पर प्रस्तुत करने में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई।
उनके अभिनय की विशेषता यह थी कि वह पात्रों की परिस्थितियों को समझकर उनके अनुरूप भाव व्यक्त करती थीं। यही कारण था कि दर्शकों को उनके किरदार बनावटी नहीं लगते थे।
जब निरूपा रॉय बन गईं हिंदी सिनेमा की मां
1950 के दशक में ही निरूपा रॉय ने मां की भूमिकाएं निभानी शुरू कर दी थीं। वर्ष 1955 की फिल्म ‘मुनीमजी’ में उन्होंने देव आनंद की मां की भूमिका निभाई। इसके बाद धीरे-धीरे उनके पास ऐसी भूमिकाएं आने लगीं, जिनमें परिवार, त्याग, संघर्ष और मातृत्व प्रमुख तत्व थे।
1970 और 1980 के दशक में यह पहचान और मजबूत हुई। हिंदी सिनेमा में उस समय ऐसी कहानियां लोकप्रिय थीं, जिनमें नायक अन्याय, गरीबी, अपराध या सामाजिक असमानता से संघर्ष करता था। कई फिल्मों में मां का किरदार उस संघर्ष की भावनात्मक धुरी बन जाता था।

निरूपा रॉय ने इन भूमिकाओं में केवल दुख सहने वाली महिला का चित्रण नहीं किया। उनके किरदारों में आत्मसम्मान, नैतिक दृढ़ता, अपने बच्चों के लिए चिंता और गलत परिस्थितियों के सामने खड़े होने का साहस भी दिखाई देता था।
यही वजह थी कि दर्शक उन्हें पर्दे पर मां के रूप में देखकर भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे। उनकी लोकप्रियता ने उन्हें हिंदी सिनेमा की सबसे पहचानी जाने वाली चरित्र अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया।
‘दीवार’ और ‘मेरे पास मां है’ का अमर संवाद
निरूपा रॉय के करियर का सबसे चर्चित पड़ाव वर्ष 1975 में आई फिल्म ‘दीवार’ रही। यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं। निरूपा रॉय ने सुमित्रा देवी नाम की मां का किरदार निभाया।
फिल्म में दो भाइयों के जीवन और उनके नैतिक निर्णयों के बीच संघर्ष दिखाया गया है। मां का किरदार इस संघर्ष के केंद्र में रहता है। वह अपने दोनों बेटों से प्रेम करती है, लेकिन उनके रास्तों और फैसलों के बीच नैतिक अंतर को भी महसूस करती है।

फिल्म का संवाद ‘मेरे पास मां है’ हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित संवादों में शामिल हो गया। यह संवाद शशि कपूर के किरदार द्वारा अमिताभ बच्चन के किरदार को दिया गया जवाब था, लेकिन इसकी भावनात्मक शक्ति का बड़ा आधार निरूपा रॉय द्वारा निभाई गई मां की भूमिका थी।
इस संवाद की लोकप्रियता दशकों बाद भी बनी हुई है। यह केवल एक फिल्मी पंक्ति नहीं रह गई, बल्कि लोकप्रिय संस्कृति में मां के प्रेम, भावनात्मक सहारे और पारिवारिक रिश्तों का प्रतीक बन गई।
‘दीवार’ में निरूपा रॉय का अभिनय इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि उन्होंने मां को केवल भावुक पात्र नहीं बनाया। उनके किरदार में नैतिक निर्णय लेने की क्षमता थी। वह अपने बेटे से प्रेम करती हैं, लेकिन उसके हर निर्णय का समर्थन नहीं करतीं। इसी जटिलता ने उनके अभिनय को प्रभावशाली बनाया।
‘अमर अकबर एंथनी’ और दूसरी यादगार फिल्में
वर्ष 1977 में रिलीज हुई फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ में निरूपा रॉय ने एक ऐसी मां का किरदार निभाया, जिसके जीवन में बिछड़ने और दोबारा मिलने की भावनात्मक कहानी प्रमुख है। फिल्म में विनोद खन्ना, ऋषि कपूर और अमिताभ बच्चन ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं।

फिल्म की कहानी में परिवार, पहचान, अलगाव और पुनर्मिलन जैसे तत्वों को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया गया। निरूपा रॉय के किरदार ने इस कहानी को भावनात्मक आधार दिया।
इसके बाद ‘सुहाग’ और ‘मर्द’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने मां की भूमिकाएं निभाईं। इन फिल्मों में उनके पात्रों का भावनात्मक प्रभाव कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में सामने आया।
निरूपा रॉय की खासियत यह थी कि वह अपने किरदार को कहानी के अनुरूप ढालती थीं। कहीं उनका पात्र असहाय और दुखी दिखाई देता था, तो कहीं वह अपने बच्चों के लिए मजबूत निर्णय लेने वाली महिला के रूप में सामने आता था।
उनकी फिल्में आज भी पुराने हिंदी सिनेमा के दर्शकों के बीच चर्चा में रहती हैं। टेलीविजन प्रसारण, फिल्मी संवादों और लोकप्रिय संस्कृति के माध्यम से उनकी अभिनय विरासत नई पीढ़ियों तक पहुंचती रही है।

अभिनय के लिए मिले सम्मान
निरूपा रॉय को उनके अभिनय के लिए फिल्मफेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्होंने ‘मुनीमजी’, ‘छाया’ और ‘शहनाई’ में अपने अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।
वर्ष 2004 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी प्रदान किया गया। यह सम्मान उनके लंबे फिल्मी सफर और हिंदी सिनेमा में योगदान की पहचान के रूप में देखा जाता है।
उनका करियर पांच दशकों से अधिक समय तक फैला रहा। अलग-अलग स्रोतों में उनकी फिल्मों की कुल संख्या के बारे में अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने बड़ी संख्या में फिल्मों में काम किया और हिंदी सिनेमा में अपनी विशिष्ट जगह बनाई।
13 अक्टूबर 2004 को हुआ निधन
निरूपा रॉय का निधन 13 अक्टूबर 2004 को मुंबई में हृदयाघात के बाद हुआ। वह 73 वर्ष की थीं। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद फिल्म जगत में शोक व्यक्त किया गया।

उनके जाने के साथ हिंदी सिनेमा ने ऐसी अभिनेत्री को खो दिया, जिसने कई पीढ़ियों के दर्शकों के सामने मां के किरदार को एक अलग पहचान दी थी।
हालांकि, किसी कलाकार की विरासत केवल उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं होती। निरूपा रॉय के मामले में यह बात विशेष रूप से दिखाई देती है। उनकी फिल्मों के दृश्य और संवाद आज भी याद किए जाते हैं। ‘दीवार’ का ‘मेरे पास मां है’ संवाद इसका सबसे चर्चित उदाहरण है।
उनकी अभिनय शैली ने हिंदी फिल्मों में मां के किरदारों को भावनात्मक गहराई देने में महत्वपूर्ण योगदान किया। बाद के वर्षों में कई अभिनेत्रियों ने मां की भूमिकाएं निभाईं, लेकिन निरूपा रॉय की छवि अपने समय की विशिष्ट सिनेमाई पहचान बन गई।
पुण्यतिथि पर याद आती है उनकी अभिनय विरासत
निरूपा रॉय को केवल ‘बॉलीवुड की मां’ कहकर याद करना उनके व्यापक अभिनय करियर को सीमित कर सकता है। उन्होंने पौराणिक फिल्मों में देवी के रूप में पहचान बनाई, सामाजिक फिल्मों में संघर्षरत महिलाओं के किरदार निभाए और बाद के वर्षों में मां की भूमिकाओं से दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह बनाई।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह पर्दे पर भावनाओं को सहज तरीके से व्यक्त करती थीं। उनके किरदारों में ममता के साथ-साथ आत्मसम्मान, नैतिकता और कठिन परिस्थितियों से जूझने की क्षमता भी दिखाई देती थी।
13 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना हिंदी सिनेमा के उस दौर को याद करना है, जब पारिवारिक संबंध और सामाजिक संघर्ष अनेक फिल्मों की कहानियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे। निरूपा रॉय ने इन कहानियों को अपने अभिनय से ऐसी पहचान दी, जो समय बीतने के बाद भी बनी हुई है।
वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्मों के दृश्य, उनकी आंखों में दिखाई देने वाला भाव और ‘मेरे पास मां है’ जैसे संवाद उन्हें दर्शकों की स्मृतियों में जीवित रखते हैं। यही किसी कलाकार की स्थायी विरासत है—उसका अभिनय पीढ़ियों तक लोगों को प्रभावित करता रहे।
