जन्मदिवस विशेष | 143वीं जयंती
25 साल की उम्र में फांसी के फंदे तक पहुंचा वो नौजवान, जिसका जन्म हुआ था एक बेहद संपन्न परिवार में
18 सितंबर 1883 को अमृतसर में जन्मे मदन लाल ढींगरा का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन क्रांतिकारियों में लिया जाता है, जिनकी जिंदगी भले ही बहुत छोटी रही, लेकिन जिनकी कहानी इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। एक संपन्न और ब्रिटिश शासन के समर्थक परिवार में जन्मे ढींगरा आगे चलकर उसी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ खड़े हो गए।
1906 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लंदन पहुंचे मदन लाल का जीवन वहां पूरी तरह बदल गया। भारतीय राष्ट्रवादी विचारों से उनका संपर्क बढ़ा और धीरे-धीरे वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए।
फिर आया 1 जुलाई 1909 का वह दिन, जब लंदन में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी। गिरफ्तारी के बाद भी उनका रुख नहीं बदला। मुकदमे के दौरान उन्होंने ब्रिटिश अदालत की वैधता स्वीकार करने से इनकार किया और अपने कृत्य को भारत की गुलामी के संदर्भ में उचित ठहराया।
17 अगस्त 1909 को पेंटनविल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र महज 25 साल थी।
उनकी 143वीं जयंती पर आइए जानते हैं मदन लाल ढींगरा की जिंदगी से जुड़े उन पहलुओं को, जो बताते हैं कि आखिर एक संपन्न परिवार में जन्मा नौजवान किस तरह ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ क्रांतिकारी बन गया।
ब्रिटिश समर्थक परिवार में हुआ था जन्म
मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को अमृतसर के एक प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉ. दित्तामल ढींगरा अमृतसर के सिविल सर्जन थे और ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार माने जाते थे।
परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत था। ऐसे माहौल में पले-बढ़े मदन लाल के लिए आराम और सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी।
लेकिन आगे चलकर उन्होंने जिस रास्ते को चुना, वह उनके परिवार की सोच से बिल्कुल अलग था।
यही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक थी—जिस परिवार को ब्रिटिश सत्ता से सम्मान और प्रतिष्ठा मिली थी, उसी परिवार का एक बेटा आगे चलकर उसी सत्ता के खिलाफ खड़ा हो गया।
लाहौर में पढ़ाई के दौरान बदलने लगी सोच
अमृतसर में शुरुआती शिक्षा के बाद मदन लाल आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर गए। यहीं उनके सामने देश की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की तस्वीर और स्पष्ट हुई।
भारत में गरीबी और आर्थिक असमानता ने उन्हें प्रभावित किया। खुद एक संपन्न परिवार से आने के बावजूद वह आम भारतीयों की स्थिति को लेकर सोचने लगे।
उनका झुकाव धीरे-धीरे राष्ट्रवादी विचारों की तरफ बढ़ने लगा।
और फिर कॉलेज में हुई एक घटना ने उनके जीवन को एक नया मोड़ दे दिया।
विदेशी कपड़े का विरोध पड़ा भारी
लाहौर में पढ़ाई के दौरान कॉलेज में ब्रिटेन से आयात किए गए कपड़े से ब्लेजर बनवाने की व्यवस्था का उन्होंने विरोध किया।
मदन लाल ने इसका विरोध किया तो कॉलेज प्रशासन ने उनसे माफी मांगने को कहा। लेकिन उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया।
नतीजा यह हुआ कि उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया।
इसके बाद उनकी जिंदगी का एक ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने अलग-अलग जगहों पर काम किया। कुछ विवरणों में उनके मजदूर के रूप में काम करने और आम लोगों की जिंदगी को करीब से देखने का भी उल्लेख मिलता है।
एक संपन्न परिवार का युवक अब अपनी जिंदगी खुद के दम पर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा था।
1906 में इंजीनियरिंग पढ़ने लंदन पहुंचे
आखिरकार 1906 में मदन लाल ढींगरा इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लंदन पहुंचे। उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में पढ़ाई शुरू की।
लेकिन लंदन उनके लिए सिर्फ शिक्षा हासिल करने की जगह नहीं रहा।
उस समय वहां भारतीय विद्यार्थियों और राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के बीच ब्रिटिश शासन और भारत की आजादी को लेकर लगातार चर्चा होती थी। इसी माहौल में मदन लाल का संपर्क भारतीय राष्ट्रवादी गतिविधियों से बढ़ता गया।
इंडिया हाउस में मिली क्रांतिकारी विचारों की दुनिया
लंदन में मदन लाल की मुलाकात श्यामजी कृष्ण वर्मा और विनायक दामोदर सावरकर जैसे राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं से हुई।
उस समय इंडिया हाउस भारतीय विद्यार्थियों और ब्रिटिश शासन के विरोधी राष्ट्रवादी विचार रखने वाले लोगों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
मदन लाल वहां होने वाली बैठकों में शामिल होने लगे। कुछ समय बाद वह सावरकर के करीब आए और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ते चले गए।
यहीं से उनकी जिंदगी ने एक निर्णायक मोड़ लिया।
अब वह सिर्फ ब्रिटिश शासन के विरोधी विचार रखने वाले छात्र नहीं थे। वह उस क्रांतिकारी धारा का हिस्सा बन चुके थे, जो भारत की आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष को भी एक रास्ता मानती थी।
जब पिता ने बेटे से कर लिया किनारा
मदन लाल की राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी उनके परिवार तक भी पहुंची।
उनके पिता ब्रिटिश शासन के समर्थक थे और बेटे के क्रांतिकारी रास्ते से बेहद नाराज थे। परिवार की ओर से सार्वजनिक रूप से उनसे संबंध तोड़ने की घोषणा तक की गई।
यह मदन लाल के जीवन का बेहद कठिन दौर था।
एक तरफ वह परिवार था, जिसमें उनका जन्म हुआ था। दूसरी तरफ वह रास्ता था, जिसे उन्होंने अपने विश्वास के आधार पर चुना था।
धीरे-धीरे परिवार और मदन लाल के रास्ते पूरी तरह अलग हो गए।
1 जुलाई 1909: लंदन में हुआ वो घटनाक्रम जिसने इतिहास बदल दिया
1 जुलाई 1909 को लंदन के इंपीरियल इंस्टीट्यूट में नेशनल इंडियन एसोसिएशन का एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
मदन लाल ढींगरा भी वहां पहुंचे थे।
कार्यक्रम में ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली भी मौजूद थे। भारतीय मामलों से जुड़े वायली की गतिविधियों और भारतीय विद्यार्थियों पर नजर रखने की भूमिका के कारण वह उस समय राष्ट्रवादी हलकों के लिए परिचित व्यक्ति थे।
कार्यक्रम खत्म होने के दौरान मदन लाल ढींगरा ने वायली पर गोलियां चला दीं।
वायली की मौके पर ही मौत हो गई।
जब पारसी डॉक्टर डॉ. कावस ललकाका ने बीच-बचाव करने की कोशिश की तो उन्हें भी गोली लगी और उनकी मृत्यु हो गई।
मदन लाल ढींगरा ने घटनास्थल से भागने की कोशिश नहीं की। उन्हें वहीं गिरफ्तार कर लिया गया।
यह घटना ब्रिटेन की धरती पर भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों का एक बेहद चर्चित अध्याय बन गई।
गिरफ्तार हुए, लेकिन अपने विचारों से पीछे नहीं हटे
मदन लाल ढींगरा पर मुकदमा चला।
लेकिन उन्होंने ब्रिटिश अदालत की वैधता को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपना बचाव करने के लिए वकील की मदद लेने से इनकार कर दिया और अदालत की कार्यवाही में भी उसी तरह सहयोग नहीं किया, जैसा सामान्य आरोपी करते हैं।
उनका कहना था कि भारत पर ब्रिटिश शासन स्वयं एक राजनीतिक और औपनिवेशिक व्यवस्था थी और उन्होंने जो किया, उसे वह अपने देश के प्रति कर्तव्य के रूप में देखते थे।
उनका मुकदमा बेहद छोटा रहा और उन्होंने अदालत को अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने के मंच के तौर पर इस्तेमाल किया।
उनके बयान में भारत की गुलामी, ब्रिटिश शासन और भारतीयों पर हुए दमन के खिलाफ उनका विरोध साफ दिखाई देता था।
मौत की सजा सुनाई गई तो भी नहीं मांगी दया
अदालत ने मदन लाल ढींगरा को दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई।
उन्होंने दया की अपील नहीं की।
उनके मुकदमे से जुड़े विवरण बताते हैं कि उन्होंने अपने कृत्य को लेकर पछतावा व्यक्त करने के बजाय अपने राजनीतिक विश्वास पर कायम रहना चुना।
उनके लिए यह मुकदमा सिर्फ अपनी सजा का मामला नहीं था। वह इसे भारत की आजादी के सवाल को सामने रखने के अवसर के रूप में देख रहे थे।
25 साल की उम्र में चढ़ गए फांसी के फंदे पर
17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटनविल जेल में मदन लाल ढींगरा को फांसी दे दी गई।
उस समय उनकी उम्र सिर्फ 25 साल थी।
18 सितंबर 1883 को जन्मा यह नौजवान अपना 26वां जन्मदिन देखने से ठीक एक महीने पहले दुनिया से चला गया।
भारत से हजारों किलोमीटर दूर ब्रिटेन की धरती पर उसकी जिंदगी खत्म हुई, लेकिन उसकी कहानी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।
मौत के बाद भी वतन की मिट्टी नसीब नहीं हुई
मदन लाल ढींगरा की मृत्यु के बाद उनका शव परिवार को नहीं सौंपा गया। उन्हें लंदन में ही दफना दिया गया।
उनके परिवार से भी उस समय उनके शव को स्वीकार करने की बात सामने नहीं आई।
एक ऐसा नौजवान जिसने अपने जीवन में अपने परिवार से दूरी झेली, उसकी मृत्यु के बाद भी उसके और उसके वतन के बीच दूरी बनी रही।
लेकिन यह दूरी हमेशा के लिए नहीं रही।
67 साल बाद भारत लौटे मदन लाल ढींगरा
करीब 67 साल तक मदन लाल ढींगरा के अवशेष ब्रिटेन में रहे।
1976 में उनके अवशेष भारत वापस लाए गए। इसके बाद अमृतसर में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
जिस शहर में उनका जन्म हुआ था, उसी शहर की मिट्टी में दशकों बाद उनकी अंतिम यात्रा पूरी हुई।
एक क्रांतिकारी की वह कहानी, जो लंदन की जेल में खत्म हुई थी, आखिरकार उसके अपने शहर में वापस आकर पूरी हुई।
उनकी कहानी को लेकर उस दौर में भी थीं अलग-अलग राय
मदन लाल ढींगरा की कार्रवाई को लेकर उस समय भारतीय समाज और स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर भी एक जैसी राय नहीं थी।
कई नेताओं और संगठनों ने उनकी हिंसक कार्रवाई की निंदा की, जबकि क्रांतिकारी धारा से जुड़े लोगों ने उन्हें ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाले युवा के रूप में देखा।
इसलिए मदन लाल ढींगरा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस दौर के स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर मौजूद अलग-अलग विचारों और रास्तों को भी सामने लाती है।
उनकी कहानी को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि आजादी की लड़ाई में सभी लोग एक ही रणनीति या विचारधारा पर सहमत नहीं थे।
मदन लाल ढींगरा नहीं रहे, मगर उनकी कहानी आज भी जिंदा है
मदन लाल ढींगरा की जिंदगी सिर्फ 25 साल की थी।
एक संपन्न परिवार में जन्मा यह युवक इंजीनियरिंग पढ़ने लंदन गया था। लेकिन वहां पहुंचकर उसका जीवन ऐसी दिशा में मुड़ गया, जिसकी शायद उसके परिवार ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
अमृतसर से लाहौर, लाहौर से लंदन और फिर लंदन की जेल तक का उनका सफर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक अलग अध्याय बन गया।
उन्होंने जो रास्ता चुना, उसकी हिंसक कार्रवाई को लेकर इतिहास में अलग-अलग विचार रहे हैं। लेकिन यह तथ्य है कि उन्होंने अपने मुकदमे को भी अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया और महज 25 वर्ष की उम्र में फांसी पर चढ़ गए।
आज उनकी 143वीं जयंती पर मदन लाल ढींगरा को याद करना उस दौर को याद करना है, जब भारत की आजादी के लिए अलग-अलग विचारों और रास्तों पर चलने वाले नौजवान अपने-अपने तरीके से संघर्ष कर रहे थे।
उनकी जिंदगी छोटी थी, लेकिन उनकी कहानी बहुत लंबी है।
अमृतसर में जन्मा वह नौजवान ब्रिटेन की धरती पर मारा गया, लेकिन उनका नाम आज भी और हमेशा हर भारतीय के दिल में गौरव बनकर ज़िंदा रहेगा।”