पुण्यतिथि विशेष | 7 नवंबर | चिकित्सा, स्वतंत्रता संग्राम और राजनीति
भारत के सार्वजनिक जीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हुए जिन्होंने चिकित्सा, स्वतंत्रता आंदोलन और शासन-प्रशासन—तीनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। डॉ. जीवराज नारायण मेहता ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व थे। वे अपने समय के प्रतिष्ठित चिकित्सक और चिकित्सा-शिक्षा के समर्थक थे, महात्मा गांधी के उपचार से जुड़े रहे, स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे और आजादी के बाद प्रशासनिक तथा राजनीतिक जिम्मेदारियां निभाईं। 1 मई 1960 को गुजरात राज्य के गठन के बाद वे उसके पहले मुख्यमंत्री बने। 7 नवंबर 1978 को उनका निधन हुआ।
अमरेली में जन्म और संघर्षपूर्ण शिक्षा
डॉ. जीवराज नारायण मेहता का जन्म 29 अगस्त 1887 को तत्कालीन बंबई प्रेसीडेंसी के सौराष्ट्र क्षेत्र में अमरेली में हुआ था। उनका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न नहीं था। सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने शिक्षा जारी रखी और चिकित्सा को अपना जीवन-लक्ष्य बनाया। अमरेली के एक चिकित्सक डॉ. एडुलजी रुस्तमजी दादाचंदजी से प्रेरित होकर उन्होंने डॉक्टर बनने का निश्चय किया।
उन्होंने मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज और सर जे.जे. अस्पताल में प्रवेश लिया। अपनी पढ़ाई के दौरान वे मेधावी विद्यार्थियों में गिने गए और कई पुरस्कार प्राप्त किए। उनकी उच्च शिक्षा के लिए टाटा एजुकेशन फाउंडेशन की छात्रवृत्ति महत्वपूर्ण साबित हुई। 1909 में वे आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गए। वहां उन्होंने चिकित्सा में एम.डी. की डिग्री प्राप्त की और रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियन्स से जुड़ी योग्यताएं हासिल कीं। उनके चिकित्सा प्रशिक्षण ने उन्हें आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और अस्पताल प्रशासन की गहरी समझ दी।

महात्मा गांधी के चिकित्सक और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
लंदन में अध्ययन के दौरान जीवराज मेहता का संपर्क भारतीय विद्यार्थियों और राष्ट्रवादी गतिविधियों से हुआ। इसी अवधि में उनकी महात्मा गांधी से भी भेंट हुई। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लंदन में डॉ. जीवराज मेहता से चिकित्सा सलाह लेने का उल्लेख किया है। भारत लौटने के बाद भी वे गांधीजी और उनके सहयोगियों को कई अवसरों पर चिकित्सा सेवा देते रहे। इस संबंध के कारण उन्हें गांधीजी के निजी चिकित्सक के रूप में भी याद किया जाता है।
1915 में भारत लौटकर उन्होंने चिकित्सा अभ्यास शुरू किया। लेकिन उनका जीवन केवल निजी चिकित्सा-व्यवसाय तक सीमित नहीं रहा। वे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े और महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में सक्रिय रहे। ब्रिटिश शासन ने उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें अलग-अलग अवसरों पर जेल में रखा। उनका स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव इस बात का उदाहरण था कि चिकित्सा पेशे के लोग भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।
चिकित्सा सेवा और KEM अस्पताल में संस्थागत योगदान
भारत लौटने के बाद जीवराज मेहता ने मुंबई में चिकित्सा सेवा दी। वे टाटा परिवार और बड़ौदा राज्य से जुड़े चिकित्सकीय कार्यों में भी रहे। 1925 में उन्हें मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (KEM) अस्पताल और उससे जुड़े चिकित्सा महाविद्यालय का पहला डीन नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने चिकित्सा शिक्षा, अस्पताल व्यवस्था और अनुसंधान को मजबूत करने के प्रयास किए।
उनकी सोच थी कि चिकित्सा संस्थान केवल रोगियों के उपचार तक सीमित न रहें, बल्कि चिकित्सा अनुसंधान, प्रशिक्षित चिकित्सकों के निर्माण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के विकास में भी योगदान दें। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संस्थागत गुणवत्ता पर जोर दिया। आगे चलकर वे भारतीय चिकित्सा जगत के प्रमुख संगठनों से जुड़े और चिकित्सा समुदाय में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।

आजादी के बाद प्रशासनिक जिम्मेदारियां
1947 में स्वतंत्रता के बाद देश को स्वास्थ्य सेवाओं और प्रशासनिक संस्थाओं के पुनर्गठन की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। जीवराज मेहता को केंद्र सरकार में स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक और स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव जैसी जिम्मेदारियां मिलीं। विभाजन के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था को व्यवस्थित करने और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत बनाने में उनका अनुभव उपयोगी रहा।
1948 में वे स्वतंत्र भारत की बड़ौदा रियासत के दीवान नियुक्त हुए। इस पद पर उन्होंने रियासत के प्रशासनिक संक्रमण और शासन व्यवस्था में भूमिका निभाई। बाद में वे तत्कालीन बंबई राज्य की सरकार में लोक निर्माण, वित्त, उद्योग और निषेध जैसे विभागों से जुड़े मंत्री रहे। संविधान सभा में भी उन्होंने बंबई से प्रतिनिधित्व किया। इस प्रकार चिकित्सा क्षेत्र से निकलकर वे स्वतंत्र भारत के नीति-निर्माण और प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बने।
गुजरात के प्रथम मुख्यमंत्री
भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप 1 मई 1960 को गुजरात राज्य अस्तित्व में आया। राज्य के गठन के समय डॉ. जीवराज मेहता को उसका पहला मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने 1960 से 1963 तक इस पद पर कार्य किया। नए राज्य के सामने प्रशासनिक संस्थाओं के निर्माण, सरकारी ढांचे के विकास, क्षेत्रीय संतुलन, शिक्षा, उद्योग, कृषि तथा सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत करने जैसी अनेक चुनौतियां थीं।
पहले मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्य केवल सरकार चलाने तक सीमित नहीं था; उन्हें नए राज्य की प्रशासनिक पहचान और संस्थागत आधार तैयार करने में भी योगदान देना था। उनके चिकित्सा और प्रशासनिक अनुभव ने स्वास्थ्य तथा सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्र में उनकी प्राथमिकताओं को प्रभावित किया। गुजरात के प्रारंभिक शासन-इतिहास में उनका कार्यकाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसी दौर में नवगठित राज्य की शासन-व्यवस्था आकार ले रही थी।

भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद की स्थापना में भूमिका
डॉ. जीवराज मेहता का योगदान शिक्षा और संस्थान-निर्माण तक भी फैला हुआ था। वे 1961 में स्थापित भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद (IIMA) के शुरुआती विकास से जुड़े। वे संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के पहले अध्यक्ष बने और आरंभिक वर्षों में संस्थान को जमीन तथा प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि देश के विकास के लिए आधुनिक प्रबंधन शिक्षा और सक्षम संस्थानों की आवश्यकता है।
मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद 1963 में उन्हें यूनाइटेड किंगडम में भारत का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया। उन्होंने 1963 से 1966 तक इस पद पर कार्य किया। इस दौरान उन्होंने भारत और ब्रिटेन के बीच राजनयिक संबंधों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
व्यक्तिगत जीवन और हंसा मेहता के साथ सार्वजनिक विरासत
डॉ. जीवराज मेहता का विवाह हंसा मेहता से हुआ, जो स्वयं स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद् और महिला अधिकारों की प्रमुख समर्थक थीं। हंसा मेहता ने संविधान सभा में महिलाओं की समानता और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा विश्वविद्यालय प्रशासन में भी नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभाईं। दोनों का सार्वजनिक जीवन शिक्षा, सामाजिक सुधार, राष्ट्रनिर्माण और संस्थागत विकास के प्रति साझा प्रतिबद्धता से जुड़ा था।
7 नवंबर 1978 को निधन
चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी, प्रशासक और गुजरात के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में लंबा सार्वजनिक जीवन जीने वाले डॉ. जीवराज नारायण मेहता का निधन 7 नवंबर 1978 को हुआ। उनके निधन के साथ भारतीय चिकित्सा जगत और गुजरात ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खोया जिसने औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों तक कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।

डॉ. जीवराज मेहता की ऐतिहासिक विरासत
डॉ. जीवराज मेहता की विरासत को केवल गुजरात के पहले मुख्यमंत्री के रूप में देखना उनके योगदान को सीमित करना होगा। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और अस्पताल प्रशासन को मजबूत करने, स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने, आजादी के बाद स्वास्थ्य प्रशासन को दिशा देने, बड़ौदा राज्य के दीवान के रूप में काम करने और नए गुजरात राज्य की नींव रखने में भूमिका निभाई। गांधीजी के उपचार से उनका जुड़ाव उनके जीवन का एक विशिष्ट पक्ष था, जबकि KEM अस्पताल और IIMA जैसे संस्थानों के शुरुआती विकास में उनका योगदान संस्थान-निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
7 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस पीढ़ी के राष्ट्रनिर्माताओं को सम्मान देना है जिसने पेशेवर दक्षता को सार्वजनिक सेवा और राष्ट्रीय जिम्मेदारी से जोड़ा। डॉ. जीवराज नारायण मेहता का जीवन इस बात का प्रमाण है कि चिकित्सा का ज्ञान, लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और दूरदर्शी प्रशासन मिलकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में स्थायी योगदान दे सकते हैं।
