विशेष लेख | 8 नवम्बर | इतिहास और समाजसेवा
8 नवम्बर 1992 की तारीख कुछ इतिहास-सूचियों में मदर टेरेसा को नई दिल्ली में ‘भारत की महान सुपुत्री’ सम्मान दिए जाने की घटना से जोड़ी जाती है। हालांकि इस विशिष्ट सम्मान के आयोजन और तारीख की स्वतंत्र पुष्टि करने वाला आधिकारिक अभिलेख उपलब्ध नहीं मिला। इसके बावजूद मदर टेरेसा का जीवन, उनकी संस्था मिशनरीज ऑफ चैरिटी और 1979 का नोबेल शांति पुरस्कार मानव सेवा के इतिहास में उनकी व्यापक पहचान के प्रमाण हैं।
मदर टेरेसा का नाम बीसवीं सदी में गरीबों, बीमारों, अनाथों और समाज के सबसे उपेक्षित लोगों की सेवा से जुड़ा रहा। उनका जन्म 26 अगस्त 1910 को उस्कुब में हुआ था, जो आज उत्तर मैसेडोनिया की राजधानी स्कोप्जे है। उनका जन्मनाम एग्नेस गोंझा बोयाजियू था। अठारह वर्ष की आयु में उन्होंने आयरलैंड की लोरेटो धार्मिक संस्था में प्रवेश लिया और 1929 में भारत पहुंचीं। आगे चलकर कोलकाता उनकी कर्मभूमि बना और यहीं से उनका सेवा अभियान विश्वव्यापी पहचान तक पहुंचा।
8 नवम्बर 1992 को ‘भारत की महान सुपुत्री’ सम्मान दिए जाने का उल्लेख कुछ ऑनलाइन इतिहास-सूचियों में मिलता है। लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय प्राथमिक स्रोतों—जैसे भारत सरकार की आधिकारिक पुरस्कार सूचनाओं, राष्ट्रपति सचिवालय के विवरण और नोबेल संस्थान के जीवन-वृत्त—में इस खास नाम वाले सम्मान तथा नई दिल्ली में उस दिन हुए समारोह का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला। इसलिए इस घटना को पुष्ट सरकारी सम्मान की तरह लिखना उचित नहीं होगा। इसे प्रचलित ऐतिहासिक उल्लेख के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

स्कोप्जे से भारत तक का सफर
एग्नेस गोंझा बोयाजियू का जन्म अल्बानियाई मूल के परिवार में हुआ था। बचपन से ही धार्मिक जीवन और जरूरतमंदों की सहायता के प्रति उनका झुकाव बताया जाता है। 1928 में उन्होंने अपना घर छोड़ा और लोरेटो समुदाय से जुड़ने के लिए आयरलैंड गईं। कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद उन्हें भारत भेजा गया। 6 जनवरी 1929 को वह कोलकाता पहुंचीं। उन्होंने लोरेटो संस्था के स्कूल में शिक्षण कार्य किया और कई वर्षों तक छात्राओं को पढ़ाया।
1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें, उनके अपने शब्दों में, ‘कॉल विदिन अ कॉल’ यानी एक विशेष आंतरिक आह्वान का अनुभव हुआ। इसके बाद उन्होंने convent के सुरक्षित जीवन से बाहर निकलकर गरीबों और बीमारों के बीच काम करने की अनुमति मांगी। 1948 में उन्हें यह अनुमति मिली। उन्होंने नर्सिंग का बुनियादी प्रशिक्षण लिया और कोलकाता की झुग्गी-बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने, बीमारों की देखभाल करने तथा जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचने का काम शुरू किया।
मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना
7 अक्टूबर 1950 को कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी को धार्मिक संस्था के रूप में औपचारिक मान्यता मिली। इसका उद्देश्य उन लोगों की देखभाल करना था जिन्हें समाज में अक्सर सबसे अधिक उपेक्षा झेलनी पड़ती थी—बेघर, बीमार, अनाथ, दिव्यांग, कुष्ठ रोग से प्रभावित और जीवन के अंतिम चरण में पहुंचे असहाय लोग। संस्था ने धीरे-धीरे भारत के अन्य शहरों और फिर विदेशों में भी अपनी सेवाओं का विस्तार किया।
मदर टेरेसा के काम का एक प्रमुख पक्ष यह था कि वह सेवा को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं मानती थीं। उनके विचार में जरूरतमंद व्यक्ति को सम्मान, अपनापन और मानवीय गरिमा देना भी उतना ही आवश्यक था। मिशनरीज ऑफ चैरिटी की गतिविधियों में आश्रय गृह, अनाथ बच्चों की देखभाल, बीमारों के लिए सेवाएं और जरूरतमंदों को भोजन तथा सहारा देना शामिल रहा। संस्था की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य उन लोगों तक पहुंचना था जिनकी देखभाल के लिए बहुत कम लोग आगे आते थे।

नोबेल शांति पुरस्कार और भारत रत्न
मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। नोबेल समिति ने उन्हें यह सम्मान पीड़ित मानवता की सहायता के लिए किए गए कार्यों के लिए दिया। पुरस्कार ने कोलकाता में उनके सेवा अभियान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर व्यापक पहचान दिलाई। नोबेल पुरस्कार के आधिकारिक विवरण में उनके द्वारा गरीबों, अनाथों और गंभीर रूप से बीमार लोगों के लिए स्थापित सेवाओं का उल्लेख है।
भारत ने भी उनकी सेवाओं को मान्यता दी। 1962 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया और 1980 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। भारत सरकार के राजपत्र में 26 जनवरी 1980 की अधिसूचना के तहत ‘मदर मैरी टेरेसा बोजाक्शियू’ का नाम भारत रत्न पाने वालों में दर्ज है। राष्ट्रपति सचिवालय ने 2016 में जारी संदेश में भी स्पष्ट किया कि देश ने उनकी निःस्वार्थ और समर्पित सेवाओं के सम्मान में 1980 में उन्हें भारत रत्न प्रदान किया था।
इन प्रमाणित सम्मानों के बीच 8 नवम्बर 1992 के ‘भारत की महान सुपुत्री’ सम्मान का उल्लेख सावधानी से समझने की जरूरत है। कुछ दिन-विशेष इतिहास-सूचियां इसे उस तारीख की घटना बताती हैं, लेकिन अभी उपलब्ध स्रोतों से सम्मान प्रदान करने वाली संस्था, चयन प्रक्रिया, समारोह स्थल और पुरस्कार के स्वरूप की पुष्टि नहीं होती। इतिहास लेखन में किसी लोकप्रिय सूची के उल्लेख और आधिकारिक रूप से प्रमाणित पुरस्कार के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
सम्मान के साथ आलोचनाएं भी
मदर टेरेसा की वैश्विक प्रतिष्ठा के साथ उनके कार्यों और संस्था के तौर-तरीकों पर आलोचनाएं भी हुईं। कुछ लेखकों और चिकित्सकीय टिप्पणीकारों ने उनके आश्रय गृहों में चिकित्सा सुविधाओं, दर्द निवारण और उपचार के मानकों पर सवाल उठाए। उनके धार्मिक विचारों और गर्भपात पर रूढ़िवादी रुख की भी आलोचना हुई। दूसरी ओर, उनके समर्थकों ने सीमित संसाधनों के बीच उपेक्षित लोगों को आश्रय, देखभाल और सम्मान देने के उनके प्रयासों को रेखांकित किया।

किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते समय सम्मान और आलोचना—दोनों को संदर्भ सहित देखना चाहिए। मदर टेरेसा के काम ने विश्वभर में स्वयंसेवा और परोपकार की प्रेरणा दी, लेकिन उनके संस्थानों और सेवा पद्धति पर उठे प्रश्न भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं। संतुलित इतिहास इन पहलुओं को छिपाता नहीं, बल्कि प्रमाण और संदर्भ के साथ सामने रखता है।
अंतिम वर्षों और विरासत
उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बावजूद मदर टेरेसा ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी के काम को आगे बढ़ाया। 1990 के दशक में उनका स्वास्थ्य कमजोर होने लगा। 5 सितम्बर 1997 को कोलकाता में उनका निधन हुआ। भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी। 2003 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें धन्य घोषित किया और 4 सितम्बर 2016 को पोप फ्रांसिस ने वेटिकन में उन्हें संत घोषित किया।
उनकी विरासत का सबसे बड़ा हिस्सा उन संस्थाओं और स्वयंसेवकों के काम में दिखाई देता है जो जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास करते हैं। उनके जीवन से जुड़ी तारीखें और सम्मान यह याद दिलाते हैं कि सार्वजनिक स्मृति में किसी व्यक्ति की पहचान कई घटनाओं से बनती है, लेकिन उन घटनाओं की पुष्टि करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
8 नवम्बर 1992 को ‘भारत की महान सुपुत्री’ सम्मान दिए जाने का उल्लेख मदर टेरेसा से जुड़ी कुछ ऐतिहासिक सूचियों में दर्ज है। जब तक इस आयोजन का प्राथमिक दस्तावेज उपलब्ध न हो, इसे पुष्ट तथ्य के बजाय अपुष्ट ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में प्रस्तुत करना अधिक जिम्मेदार होगा। वहीं 1979 का नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 का भारत रत्न उनके जीवन के ऐसे सम्मान हैं जिनकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध है।

