इतिहास | 7 नवंबर | बिहार | भारतीय राजनीति
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश से आए युवाओं तथा श्रमिकों पर हमलों के विरोध में जनता दल (यूनाइटेड) के पांच लोकसभा सांसदों ने 7 नवंबर 2008 को संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने का कदम उठाया। जॉर्ज फर्नांडिस, प्रभुनाथ सिंह, राजीव रंजन सिंह ‘ललन’, कैलाश बैठा और मीना सिंह ने अपने त्यागपत्र लोकसभा के महासचिव पी. डी. टी. आचार्य को सौंपे। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी उस समय अस्पताल में भर्ती थे। अध्यक्ष ने 11 नवंबर को इस्तीफे स्वीकार किए और वे उसी तारीख से प्रभावी हुए।
महाराष्ट्र में क्षेत्रीय तनाव और उत्तर भारतीयों पर हमले
2008 में महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता और स्थानीय लोगों के रोजगार के मुद्दे पर राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ था। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के नेता राज ठाकरे ने कई मौकों पर उत्तर भारतीयों के महाराष्ट्र में रोजगार और मौजूदगी को लेकर तीखी बयानबाजी की थी। इस माहौल में उत्तर प्रदेश और बिहार से आए लोगों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आईं। फरवरी 2008 में भी मनसे कार्यकर्ताओं पर उत्तर भारतीयों पर हमले के आरोप लगे थे। अक्टूबर में रेलवे भर्ती की परीक्षा देने मुंबई और आसपास के केंद्रों पर पहुंचे अभ्यर्थियों पर हमलों ने विवाद को फिर तेज कर दिया।
19 अक्टूबर 2008 को रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा के दौरान मुंबई और ठाणे क्षेत्र के कई केंद्रों पर उत्तर भारतीय उम्मीदवारों के साथ मारपीट, धमकी और परीक्षा में बाधा डालने की खबरें आईं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने 22 अक्टूबर को मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी किया। आयोग ने रेलवे की नौकरियों के लिए आए उत्तर भारतीय अभ्यर्थियों पर हमले और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर राज्य सरकार से जवाब मांगा।

इन घटनाओं ने केवल महाराष्ट्र में रह रहे प्रवासियों की सुरक्षा का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि भारतीय संघवाद, देश के किसी भी हिस्से में नागरिकों के आवागमन और रोजगार के अधिकार तथा क्षेत्रीय पहचान की राजनीति पर भी बहस छेड़ दी। बिहार में राजनीतिक दलों ने इसे राज्य के लोगों की गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बनाया।
बिहार में सर्वदलीय पहल और प्रधानमंत्री से मुलाकात
घटनाओं के बाद बिहार में राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हुई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में विभिन्न दलों के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल 27 अक्टूबर 2008 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला। प्रतिनिधिमंडल ने महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमलों को रोकने, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और बिहार के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र के हस्तक्षेप की मांग की। प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को कानून-व्यवस्था और सभी नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन दिया।
इस प्रतिनिधिमंडल में बिहार के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता शामिल थे। इसका उद्देश्य राज्य की राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर केंद्र के सामने एक साझा चिंता रखना था। हालांकि, इसके बाद भी जदयू नेतृत्व का मानना था कि अपेक्षित ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पार्टी ने महाराष्ट्र सरकार की भूमिका और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए।
जदयू ने इस्तीफे का फैसला क्यों किया?
जनता दल (यूनाइटेड) ने अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में संकेत दिया था कि यदि उत्तर भारतीयों पर हमले नहीं रुके और केंद्र सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए तो उसके लोकसभा सांसद इस्तीफा देंगे। पार्टी नेतृत्व ने इस कदम को विरोध और दबाव बनाने के संसदीय तरीके के रूप में पेश किया। 6 नवंबर 2008 को पार्टी ने घोषणा की कि बिहार से उसके पांच लोकसभा सदस्य अगले दिन त्यागपत्र देंगे।

जदयू के संसदीय दल के नेता प्रभुनाथ सिंह ने कहा कि पार्टी के पास विरोध दर्ज कराने के लिए इस्तीफे के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। पार्टी की मांगों में महाराष्ट्र में कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करना, हमलों के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई, राज ठाकरे के खिलाफ लंबित मामलों में तेजी और कुछ हिंसक घटनाओं की जांच शामिल थी। जदयू नेताओं ने केंद्र पर निष्क्रियता का आरोप लगाया; ये उस समय पार्टी की ओर से लगाए गए राजनीतिक आरोप थे, जिन्हें सरकार की आधिकारिक स्वीकारोक्ति नहीं माना जाना चाहिए।
इस फैसले का बिहार की आंतरिक राजनीति से भी संबंध था। उस समय राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता लालू प्रसाद और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के रामविलास पासवान भी केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। राजद ने भी महाराष्ट्र की घटनाओं के विरोध में अपने सांसदों और विधायकों के इस्तीफे का दबाव बनाया था। जदयू के कदम को कुछ राजनीतिक विश्लेषकों और प्रतिद्वंद्वी दलों ने बिहार में उत्तर भारतीयों के मुद्दे पर राजनीतिक बढ़त हासिल करने की प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा। जदयू ने इसे नागरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न बताया। दोनों पहलुओं को उस समय की राजनीतिक परिस्थिति के हिस्से के रूप में समझना जरूरी है।
7 नवंबर 2008: पांच सांसदों ने सौंपे त्यागपत्र
7 नवंबर को जदयू के पांचों सांसद संसद भवन पहुंचे। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी 5 नवंबर से सीने की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती थे। इसलिए सांसदों ने अपने इस्तीफे सीधे अध्यक्ष को देने के बजाय लोकसभा के महासचिव पी. डी. टी. आचार्य को सौंपे। समकालीन समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सांसदों ने दोपहर के आसपास त्यागपत्र दिए और इसके बाद पार्टी नेताओं ने मीडिया से बात की।
इस्तीफा देने वाले पांच सांसदों के नाम और उनके निर्वाचन क्षेत्र इस प्रकार थे:

- प्रभुनाथ सिंह — महाराजगंज, बिहार
- जॉर्ज फर्नांडिस — मुजफ्फरपुर, बिहार
- राजीव रंजन सिंह ‘ललन’ — बेगूसराय, बिहार
- कैलाश बैठा — बगहा, बिहार
- मीना सिंह — बिक्रमगंज, बिहार
लोकसभा के आधिकारिक संसदीय अभिलेख में इन पांचों के त्यागपत्रों के पत्रों की तारीख 7 नवंबर 2008 दर्ज है। उसी अभिलेख में यह भी स्पष्ट है कि अध्यक्ष ने उन्हें 11 नवंबर 2008 से प्रभावी मानते हुए स्वीकार किया। इसलिए 7 नवंबर को इस्तीफे सौंपने और 11 नवंबर को उनके औपचारिक रूप से स्वीकार होकर प्रभावी होने के बीच अंतर करना आवश्यक है।
जॉर्ज फर्नांडिस और अन्य नेताओं की भूमिका
इन पांच सांसदों में जॉर्ज फर्नांडिस का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय था। वे राष्ट्रीय राजनीति के वरिष्ठ नेता, पूर्व रक्षा मंत्री और ट्रेड यूनियन आंदोलन से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व थे। मुजफ्फरपुर से लोकसभा सदस्य के रूप में उनका इस्तीफा इस विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर अतिरिक्त राजनीतिक महत्व देता था। प्रभुनाथ सिंह जदयू संसदीय दल के नेता थे और उन्होंने इस्तीफे के बाद पार्टी का पक्ष सार्वजनिक रूप से रखा। राजीव रंजन सिंह ‘ललन’ बिहार में पार्टी के प्रमुख नेताओं में थे। कैलाश बैठा और मीना सिंह ने भी सामूहिक निर्णय के तहत अपने पद छोड़े।
इन सांसदों का कदम व्यक्तिगत असहमति के बजाय पार्टी के संसदीय निर्णय के रूप में सामने आया। जदयू ने यह भी कहा कि राज्यसभा के उसके सदस्य अलग रणनीति के तहत संसद में मुद्दा उठाएंगे। इस प्रकार इस्तीफे का निर्णय लोकसभा के पांच सदस्यों तक सीमित रहा, न कि पार्टी के सभी सांसदों या बिहार के सभी जनप्रतिनिधियों का सामूहिक त्यागपत्र।
लोकसभा अध्यक्ष ने 11 नवंबर को स्वीकार किए इस्तीफे
सोमनाथ चटर्जी के अस्पताल से लौटने के बाद त्यागपत्रों पर औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ी। 11 नवंबर 2008 को अध्यक्ष ने पांचों सांसदों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए। लोकसभा में अध्यक्ष की ओर से दी गई सूचना में उनके निर्वाचन क्षेत्र और त्यागपत्र पत्रों की तारीख दर्ज की गई। आधिकारिक संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार, इस्तीफे 11 नवंबर से प्रभावी हुए। इस प्रकार राजनीतिक घोषणा और त्यागपत्र सौंपने के चार दिन बाद संवैधानिक-संसदीय प्रक्रिया पूरी हुई।

लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना सांसद का व्यक्तिगत संवैधानिक कदम होता है, लेकिन उसकी स्वीकृति अध्यक्ष द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होती है। इस प्रकरण में अध्यक्ष की अनुपस्थिति के कारण पत्र महासचिव को सौंपे गए और बाद में अध्यक्ष ने उन्हें स्वीकार किया। यह प्रक्रिया इस बात का उदाहरण है कि संसद में राजनीतिक विरोध के साथ औपचारिक संवैधानिक नियमों का पालन भी जरूरी है।
विरोध, राजनीतिक संदेश और व्यापक बहस
जदयू सांसदों के इस्तीफे ने उत्तर भारतीयों की सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में फिर प्रमुखता से उठाया। इसने यह सवाल भी सामने रखा कि रोजगार और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति किस सीमा तक जा सकती है और क्या किसी राज्य में दूसरे राज्यों से आए नागरिकों को भाषा या मूल स्थान के आधार पर डराया या रोका जा सकता है। भारतीय संविधान नागरिकों को देशभर में आवागमन, निवास और वैध पेशा या रोजगार करने के अधिकार देता है; इन अधिकारों के साथ सार्वजनिक व्यवस्था और कानून का पालन भी जुड़ा है।
इस्तीफे के राजनीतिक प्रभाव पर उस समय मतभेद थे। जदयू ने इसे केंद्र और महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बनाने तथा बिहार के लोगों के प्रति एकजुटता दिखाने का कदम बताया। आलोचकों ने इसे प्रतीकात्मक राजनीति और बिहार में राजद-जदयू के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा कहा। यह भी तथ्य है कि इस्तीफे स्वीकार होने के बाद सांसदों की संसदीय सदस्यता समाप्त हुई, लेकिन महाराष्ट्र में क्षेत्रीय तनाव और प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न केवल इस कदम से समाप्त नहीं हुआ।
7 नवंबर 2008 की घटना का ऐतिहासिक महत्व
जदयू के पांच सांसदों का इस्तीफा भारतीय संसदीय इतिहास में एक ऐसा प्रसंग है, जिसमें राज्य से बाहर रह रहे नागरिकों पर हमलों के विरोध को संसद की सदस्यता छोड़ने के फैसले से जोड़ा गया। इसने बिहार की राजनीति, महाराष्ट्र की क्षेत्रीय राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों को एक ही राष्ट्रीय बहस में ला दिया। घटना का सही कालक्रम—27 अक्टूबर को प्रधानमंत्री से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात, 6 नवंबर को इस्तीफे की घोषणा, 7 नवंबर को महासचिव को पत्र सौंपना और 11 नवंबर को अध्यक्ष द्वारा स्वीकृति—इसे समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

इस घटना की स्मृति केवल पांच सांसदों के त्यागपत्र तक सीमित नहीं है। यह देश के भीतर नागरिकों की सुरक्षा, रोजगार में समान अवसर, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक जवाबदेही जैसे प्रश्नों को सामने लाती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना शासन तथा कानून-व्यवस्था की मूल जिम्मेदारी है।
