120 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए चाहिए 61 सीटें; एग्जिट पोल से मिलेंगे शुरुआती संकेत, सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति की भूमिका और गठबंधन की बातचीत होगी अहम
यरुशलम/नई दिल्ली। इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को हो रहे संसदीय चुनाव के बाद देश की राजनीतिक तस्वीर केवल वोटों की गिनती से तय नहीं होगी। मतदान केंद्रों के बंद होने और एग्जिट पोल सामने आने के बाद सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि कौन-सा राजनीतिक दल या गठबंधन संसद में बहुमत जुटाने की स्थिति में पहुंचता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से भी यह चुनाव महत्वपूर्ण है। हालांकि, शुरुआती रुझानों या एग्जिट पोल को अंतिम परिणाम मानना जल्दबाजी होगी।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल में मतदान स्थानीय समयानुसार सुबह सात बजे से रात दस बजे तक निर्धारित है। मतदान समाप्त होने के बाद टेलीविजन चैनलों के एग्जिट पोल से शुरुआती संकेत मिल सकते हैं। वोटों की गिनती के दौरान तस्वीर स्पष्ट होने में कुछ घंटे लग सकते हैं, लेकिन यदि किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिलता है, तो सरकार गठन का सवाल कई दिनों या सप्ताह तक अनिश्चित रह सकता है। अंतिम मतगणना 30 अक्टूबर तक पूरी होने की उम्मीद है, जबकि आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को प्रकाशित किए जाने हैं।
नेतन्याहू के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चुनाव?
यह चुनाव 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल में हो रहा पहला संसदीय चुनाव है। उस हमले और उसके बाद गाजा में जारी सैन्य अभियान तथा क्षेत्रीय संघर्षों ने इजरायल की राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है।

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके सहयोगी दल सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट से जुड़े विपक्षी गठबंधन और अन्य विरोधी दल राजनीतिक बदलाव की संभावना तलाश रहे हैं। चुनाव के दौरान सुरक्षा, युद्ध के बाद की स्थिति, सरकार के नेतृत्व और देश की राजनीतिक दिशा जैसे मुद्दे चर्चा में रहे हैं।
हालांकि, किसी एक दल का सबसे अधिक सीटें हासिल करना अपने आप में प्रधानमंत्री पद सुनिश्चित नहीं करता। इजरायल की संसदीय व्यवस्था में सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों का समर्थन जुटाना भी महत्वपूर्ण है। इसीलिए चुनाव परिणामों के बाद केवल सबसे बड़ी पार्टी का नाम देखने के बजाय संसद में संभावित गठबंधनों का गणित समझना जरूरी होगा।
120 सीटों वाली संसद में 61 का आंकड़ा क्यों अहम?
इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। किसी गठबंधन को पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए सामान्य तौर पर कम से कम 61 सीटों का समर्थन चाहिए।
इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनते। वे राजनीतिक दलों की राष्ट्रीय सूची के लिए मतदान करते हैं। प्राप्त मतों के अनुपात के आधार पर संसद की सीटें बांटी जाती हैं। किसी पार्टी को नेसेट में प्रतिनिधित्व पाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करना होता है।

यह व्यवस्था चुनाव के बाद सरकार गठन को जटिल बना सकती है। यदि कई दल संसद में पहुंचते हैं और कोई एक राजनीतिक धड़ा 61 सीटों तक नहीं पहुंच पाता, तो उसे अन्य पार्टियों के साथ बातचीत करनी पड़ती है। इस दौरान छोटे दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उनकी कुछ सीटें किसी गठबंधन को बहुमत तक पहुंचाने या उससे दूर रखने में निर्णायक साबित हो सकती हैं।
इसलिए मत प्रतिशत और सीटों के बीच का अंतर समझना जरूरी है। किसी दल को अपेक्षाकृत अधिक वोट मिलने के बावजूद यह जरूरी नहीं कि वह अकेले सरकार बना सके। दूसरी ओर, अलग-अलग दलों के बीच समझौता होने पर कई पार्टियों का संयुक्त गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में आ सकता है।
एग्जिट पोल से कितनी स्पष्ट होगी तस्वीर?
मतदान समाप्त होने के बाद एग्जिट पोल चुनावी नतीजों का पहला संकेत दे सकते हैं। इन सर्वेक्षणों में मतदान कर चुके लोगों से मिली जानकारी के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि किस दल को कितनी सीटें मिल सकती हैं।
लेकिन एग्जिट पोल और आधिकारिक नतीजों में अंतर हो सकता है। वास्तविक परिणाम मतगणना, वैध मतों और सीटों के आधिकारिक आवंटन पर निर्भर करेंगे। यदि छोटे दलों को मिले मत 3.25 प्रतिशत की सीमा के आसपास रहते हैं, तो उनका संसद में प्रवेश और सीटों का बंटवारा गठबंधन के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

रॉयटर्स के अनुसार, लगभग एक दर्जन दलों के इस सीमा को पार करने की संभावना के कारण अंतिम सीट आवंटन पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। ऐसे में चुनाव की रात शुरुआती संकेत मिल जाने के बावजूद सत्ता की अंतिम तस्वीर तुरंत साफ हो, यह जरूरी नहीं है।
राष्ट्रपति की भूमिका से तय होगी सरकार गठन की अगली प्रक्रिया
आधिकारिक नतीजे प्रकाशित होने के बाद इजरायल के राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करेंगे। इसके बाद वह उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देंगे, जिसके पास गठबंधन तैयार करने और संसद का समर्थन हासिल करने की सबसे अधिक संभावना मानी जाएगी।
यह जरूरी नहीं कि सबसे बड़ी पार्टी का नेता ही स्वतः सरकार बनाने का पहला अवसर प्राप्त करे। राष्ट्रपति का निर्णय इस बात पर भी निर्भर करेगा कि कौन-सा उम्मीदवार अन्य दलों का पर्याप्त समर्थन जुटा सकता है।
सरकार बनाने का अवसर मिलने के बाद उम्मीदवार को संभावित सहयोगियों से बातचीत करनी होगी। इस बातचीत में नीतिगत प्राथमिकताओं, मंत्रालयों के बंटवारे और सरकार के कार्यक्रम जैसे विषय शामिल हो सकते हैं। राष्ट्रपति की ओर से निर्धारित प्रक्रिया के तहत उम्मीदवार को सरकार बनाने के लिए अधिकतम 42 दिन तक का समय मिल सकता है।

यदि इस अवधि में सहमति बन जाती है, तो प्रस्तावित सरकार को नेसेट में विश्वास मत हासिल करना होगा। इसके बाद ही नई सरकार औपचारिक रूप से कामकाज संभाल सकेगी।
अगर कोई गठबंधन बहुमत नहीं जुटा पाया तो?
यदि पहले उम्मीदवार को सरकार बनाने में सफलता नहीं मिलती, तो दूसरे उम्मीदवार को अवसर दिया जा सकता है। इसके बाद भी समाधान नहीं निकलने पर कानून में निर्धारित अन्य प्रक्रियाएं लागू हो सकती हैं। अंततः सरकार गठन के प्रयास विफल रहने पर नए चुनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।
ऐसी स्थिति में मौजूदा सरकार नई सरकार के कार्यभार संभालने तक कार्यवाहक सरकार के रूप में काम करती रह सकती है। इसका अर्थ है कि चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर भी प्रधानमंत्री तत्काल पद छोड़ने के लिए बाध्य हों, ऐसा जरूरी नहीं है।
इजरायल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि गठबंधन बनाने में कठिनाई आने पर चुनावी प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। वर्ष 2019 से 2022 के बीच देश में बार-बार चुनाव हुए थे, क्योंकि राजनीतिक दल स्थिर सरकार बनाने और उसे बनाए रखने को लेकर सहमति नहीं बना पा रहे थे।

चुनाव के बाद किन बातों पर रहेगी नजर?
इस चुनाव के बाद तीन सवाल सबसे महत्वपूर्ण होंगे। पहला, कौन-से दल 3.25 प्रतिशत की चुनावी सीमा पार कर संसद में पहुंचते हैं। दूसरा, नेतन्याहू के समर्थक दल और विपक्षी समूह कुल कितनी सीटें हासिल करते हैं। तीसरा, क्या कोई पक्ष सहयोगी दलों के साथ मिलकर 61 सीटों का समर्थन जुटा पाता है।
इन सवालों के जवाब ही यह समझने में मदद करेंगे कि अगली सरकार किस दिशा में जा सकती है। केवल चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने से सरकार गठन की गारंटी नहीं मिलती। इसके लिए राजनीतिक सहमति और संसद में पर्याप्त समर्थन भी जरूरी है।
इजरायल के चुनाव का असर केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। देश की सुरक्षा नीति, गाजा को लेकर रणनीति, क्षेत्रीय संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े फैसलों पर भी अगली सरकार की प्राथमिकताओं का प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, चुनाव के बाद किसी नीति में बदलाव होगा या नहीं, इसका आकलन नई सरकार के गठन और उसके घोषित कार्यक्रम के आधार पर ही किया जा सकेगा।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मतदान समाप्त होना चुनावी प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि सरकार गठन के अगले चरण की शुरुआत है। अंतिम नतीजे, संसद में सीटों का बंटवारा और गठबंधन वार्ताएं मिलकर तय करेंगी कि इजरायल की अगली सरकार का नेतृत्व कौन करेगा।

संपादकीय नोट: यह खबर उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है। मतदान के अंतिम परिणाम और आधिकारिक सीट आवंटन की घोषणा से पहले किसी भी दल की जीत या हार को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए।
