कोलकाता: TMC नाम-चिह्न विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को चुनाव आयोग के सामने जवाबी हलफनामा और संबंधित दस्तावेज दाखिल करने के लिए 10 दिन का अतिरिक्त समय दिया है। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को भी ऋतब्रत गुट के दस्तावेजों पर अपना जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन मिलेंगे। इस आदेश के साथ तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक ‘घास-फूल’ चुनाव चिह्न पर चल रही कानूनी लड़ाई का अगला चरण तय हो गया है।
TMC नाम-चिह्न विवाद में अब 20 दिनों की प्रक्रिया
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से हलफनामे दाखिल करने की समयसीमा पर चर्चा हुई। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कल्याण बनर्जी ने ऋतब्रत बनर्जी गुट को अतिरिक्त समय दिए जाने पर आपत्ति जताई। दूसरी ओर, ऋतब्रत गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने अदालत को बताया कि कुछ आवश्यक दस्तावेज तैयार करने के लिए गैर-न्यायिक स्टांप पेपर उपलब्ध कराने में दुर्गापूजा के कारण दिक्कत हुई। गुट की ओर से दो सप्ताह की अतिरिक्त मोहलत मांगी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह की मांग को पूरी तरह स्वीकार करने के बजाय 10 दिन का समय दिया। अदालत ने साथ ही व्यवस्था की कि ऋतब्रत गुट के हलफनामे और अन्य दस्तावेज दाखिल होने के बाद ममता गुट को भी जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए अगले 10 दिन मिलेंगे। दोनों पक्षों को दूसरे खेमे की ओर से पेश किए जाने वाले दस्तावेजों की स्वीकार्यता पर आपत्ति दर्ज कराने की स्वतंत्रता भी दी गई है।
जोड़ाफूल चुनाव चिह्न को लेकर क्यों है विवाद?
मामला केवल नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि तृणमूल कांग्रेस की आधिकारिक राजनीतिक पहचान पर दावा किस गुट का माना जाएगा। चुनाव आयोग के समक्ष दोनों पक्ष अपने संगठनात्मक समर्थन और दस्तावेजों के आधार पर दावा पेश कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही चुनाव आयोग को इस विवाद का निपटारा तय समयसीमा में करने का निर्देश दे चुका है।

सितंबर में चुनाव आयोग ने अंतिम निर्णय होने तक दोनों पक्षों को मूल ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम और पारंपरिक ‘घास-फूल’ चिह्न के इस्तेमाल से रोकते हुए अलग-अलग अंतरिम नाम और प्रतीक आवंटित किए थे। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ प्रतीक दिया गया, जबकि ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस नाम और ‘लिफाफा’ प्रतीक मिला। यह व्यवस्था अंतिम निर्णय तक के लिए है।
कल्याण बनर्जी ने अतिरिक्त समय पर जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान कल्याण बनर्जी ने ऋतब्रत गुट को और समय देने के अनुरोध का विरोध किया। उनका पक्ष था कि जब निर्धारित समयसीमा में दस्तावेज दाखिल करने की प्रक्रिया चल रही है, तब अतिरिक्त मोहलत देने से कार्यवाही आगे खिंच सकती है। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों को क्रमशः दस्तावेज और जवाब दाखिल करने का अवसर देकर प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ किया।
इस बीच तृणमूल कांग्रेस नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने भी ऋतब्रत गुट की ओर से अतिरिक्त समय मांगे जाने की आलोचना की और इसे समय बढ़ाने की एक और कोशिश बताया। उनके आरोपों पर भी राजनीतिक विवाद जारी है। दूसरी ओर, ऋतब्रत गुट का कहना है कि उसे जरूरी दस्तावेज तैयार करने और जमा करने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत थी।
दस्तावेज ले जा रहे ट्रक को रोकने का आरोप
कानूनी विवाद के बीच ऋतब्रत बनर्जी ने एक अलग गंभीर आरोप भी लगाया है। उनका दावा है कि उनके गुट के हलफनामे और दस्तावेज लेकर सड़क मार्ग से दिल्ली जा रहे एक ट्रक को रास्ते में रोका गया और दस्तावेज छीनने की कोशिश की गई। ऋतब्रत के अनुसार, उनके समर्थकों ने कथित प्रयास को विफल कर दिया।

यह आरोप अभी ऋतब्रत बनर्जी के दावे के रूप में सामने आया है। इसकी स्वतंत्र पुष्टि सभी पहलुओं से नहीं हुई है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के खेमे की ओर से इस आरोप को खारिज किया गया है। ऐसे में इस घटनाक्रम को लेकर अंतिम निष्कर्ष संबंधित पक्षों और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही निकाला जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आगे क्या?
अब प्रक्रिया का अगला चरण स्पष्ट है। पहले डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को 10 दिनों के भीतर अपना काउंटर-एफिडेविट और संबंधित दस्तावेज चुनाव आयोग के समक्ष रखने होंगे। इसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को अगले 10 दिनों में जवाबी हलफनामा दाखिल करने का अवसर मिलेगा। दोनों पक्ष एक-दूसरे के दस्तावेजों की स्वीकार्यता पर भी सवाल उठा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले चुनाव आयोग को इस विवाद का फैसला करने के लिए समयसीमा तय की थी। 28 सितंबर के आदेश में अदालत ने आयोग को चार महीने के भीतर विवाद का निपटारा करने का निर्देश दिया था, जबकि दोनों पक्षों की प्रारंभिक pleadings पूरी करने के लिए अलग समयसीमा तय की गई थी। अब अतिरिक्त 20 दिनों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव आयोग के सामने मामले की सुनवाई और दस्तावेजों की जांच का रास्ता आगे बढ़ेगा।
फिलहाल, जोड़ाफूल चुनाव चिह्न और तृणमूल कांग्रेस के नाम पर अधिकार को लेकर दोनों खेमों के बीच कानूनी और राजनीतिक टकराव जारी है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश ने किसी पक्ष के दावे को सही या गलत घोषित नहीं किया है, बल्कि दोनों पक्षों को अपने-अपने दस्तावेज और जवाब रखने का अवसर दिया है। इसलिए अंतिम तस्वीर चुनाव आयोग के समक्ष होने वाली आगे की कार्यवाही और उसके बाद आने वाले फैसले से ही साफ होगी।

