बोलने में लगने वाला थोड़ा अतिरिक्त समय किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता, योग्यता या विचारों की गुणवत्ता का पैमाना नहीं है। हकलाने वाले लोगों को अक्सर बातचीत, पढ़ाई, काम और सार्वजनिक जीवन में गलत धारणाओं या अधीरता का सामना करना पड़ता है। इसी सोच को बदलने और समाज में समझ, सम्मान तथा समावेश बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल 22 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय हकलाना जागरूकता दिवस (International Stuttering Awareness Day—ISAD) मनाया जाता है।
कब शुरू हुआ यह दिवस?
अंतरराष्ट्रीय हकलाना जागरूकता दिवस 1998 से हर साल 22 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य हकलाने के बारे में विश्वसनीय जानकारी फैलाना, इससे जुड़े सामाजिक पूर्वाग्रहों को चुनौती देना और हकलाने वाले लोगों, उनके परिवारों, विशेषज्ञों तथा शोधकर्ताओं के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना है। दुनिया भर में इस अवसर पर जागरूकता कार्यक्रम, व्यक्तिगत अनुभवों की साझेदारी और ऑनलाइन चर्चाएं आयोजित की जाती हैं।
क्या है हकलाना?
हकलाना बोलने के प्रवाह से जुड़ी एक स्थिति है। इसमें व्यक्ति कुछ ध्वनियों या शब्दांशों को दोहरा सकता है, किसी ध्वनि को खींच सकता है या बोलते समय क्षणिक रुकावट महसूस कर सकता है। इसका अनुभव हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। कई बच्चों में यह बोलना और भाषा सीखने के शुरुआती वर्षों में दिखाई देता है; कुछ लोगों में यह आगे भी बना रह सकता है।
हकलाने का कारण केवल घबराहट, आत्मविश्वास की कमी या खराब परवरिश मानना सही नहीं है। इसके पीछे जटिल विकासात्मक और जैविक कारक हो सकते हैं। तनाव या दबाव कुछ परिस्थितियों में बोलने के अनुभव को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हकलाना व्यक्ति की गलती है।

भ्रांतियों से बाहर निकलना जरूरी
- भ्रांति: हकलाने वाला व्यक्ति जानता नहीं कि क्या कहना है। सच्चाई: अक्सर व्यक्ति को अपने शब्द पता होते हैं, लेकिन उन्हें सहज प्रवाह में बोलने में कठिनाई हो सकती है।
- भ्रांति: हकलाना बुद्धिमत्ता या क्षमता की कमी का संकेत है। सच्चाई: हकलाना किसी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता, प्रतिभा या पेशेवर योग्यता का माप नहीं है।
- भ्रांति: व्यक्ति को बस शांत होकर या अधिक कोशिश करके बोलना चाहिए। सच्चाई: ऐसा कहना अनजाने में दबाव बढ़ा सकता है; सम्मानजनक माहौल और जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ सहायता अधिक उपयोगी हैं।
- भ्रांति: हर व्यक्ति का अनुभव एक जैसा होता है। सच्चाई: हकलाने की प्रकृति, परिस्थितियां और व्यक्ति की प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
हम कैसे बनाएं अधिक संवेदनशील समाज?
- व्यक्ति की बात ध्यान से सुनें और उसे अपनी गति से बोलने का समय दें।
- उसके वाक्य पूरे न करें और बिना पूछे बोलने का तरीका सुधारने की कोशिश न करें।
- बातचीत के दौरान सामान्य, सहज नजर-संपर्क और सम्मान बनाए रखें; असहजता या दया का प्रदर्शन न करें।
- स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थल पर मजाक, नकल या भेदभाव को रोकें और सभी को भागीदारी का समान अवसर दें।
- यदि कोई व्यक्ति अपनी जरूरत या पसंद बताए, तो उसी के अनुरूप संवाद करें। हर व्यक्ति से एक ही तरह की मदद की अपेक्षा न रखें।
विशेषज्ञ सहायता कब उपयोगी हो सकती है?
यदि हकलाना व्यक्ति की रोजमर्रा की बातचीत, पढ़ाई, काम या सामाजिक भागीदारी को प्रभावित कर रहा हो, या बच्चा बोलने को लेकर परेशान हो, तो स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट (वाक् एवं भाषा विशेषज्ञ) से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है। विशेषज्ञ व्यक्ति की जरूरत और उम्र के अनुसार आकलन करके उपयुक्त सहायता के विकल्प समझा सकते हैं। बच्चों में हकलाने को लेकर चिंता होने पर केवल इंतजार करने के बजाय बाल रोग विशेषज्ञ या संबंधित विशेषज्ञ से चर्चा करना उचित है। सहायता का उद्देश्य हर व्यक्ति को एक ही ढंग से बोलने के लिए मजबूर करना नहीं, बल्कि संवाद और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है।
जागरूकता एक दिन नहीं, रोज की जिम्मेदारी
अंतरराष्ट्रीय हकलाना जागरूकता दिवस हमें याद दिलाता है कि प्रभावी संवाद केवल धाराप्रवाह बोलने का नाम नहीं है; इसमें सुनने वाले का धैर्य, सम्मान और समझ भी शामिल हैं। हकलाने वाले लोगों की कहानियों को सुनना, उनके अनुभवों को गंभीरता से लेना और उन्हें अपनी शर्तों पर भाग लेने का अवसर देना, जागरूकता को वास्तविक बदलाव में बदल सकता है।
संदेश साफ है: किसी व्यक्ति को उसकी बोलने की गति से नहीं, उसकी बात और व्यक्तित्व से पहचानें। जब हम बीच में टोकने के बजाय सुनते हैं और निर्णय देने के बजाय समझने की कोशिश करते हैं, तभी एक अधिक समावेशी समाज बनता है।
